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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

७८ ] धम्मपदं [ १३।५
१६६-धम्मं चरे सुचरितं न तं दुच्चरितं चरे ।
धम्मचारी सुखं सेति अस्मिं लोके परम्हि च ॥३॥
( धर्मं चरेत् सुचरितं न तं दुश्चरितं चरेत् ।
धर्मचारी सुखं शेतेऽस्मिन् लोके परत्र च ॥३॥ )
अनुवाद—उत्साही बने, आलसी न बने, सुचरित धर्मका आचरण
करे, धर्मचारी (पुरुष) इस लोक और परलोकमें सुख-
पूर्वक सोता है। सुचरित धर्मका आचरण करे, दुश्चरित
कर्म (=धर्म) का सेवन न करे। धर्मचारी (पुरुष) ० ।
जेतवन पाँच सौ ज्ञानी (भिक्षु)
१७०-यथा बुब्बुळकं पस्से यथा पस्से मरीचिकं ।
एवं लोकं अवेक्खन्तं मच्चुराजा न पस्सति ॥४॥
( यथा बुद्बुदकं पश्येद् यथा पश्येत् मरीचिकाम् ।
एवं लोकमवेक्षमाणं मृत्युराजो न पश्यति ॥४॥ )
अनुवाद—जैसे बुलबुलेको देखता है, जैसे (मरु-)मरीचिकाको देखता
है, लोकको वैसे ही (जो पुरुष) देखता है, उसकी ओर
यमराज (आँख उठाकर) नहीं देख सकता।
राजगृह (वेणुवन) अभय राजकुमार
१७१-एथ पस्सथिमं लोकं चित्तं राजपथूपमं ।
यत्थ बाला विसीदन्ति, नत्थि सङ्गो विजानतं ॥५॥
( एत पश्यतेमं लोकं चित्रं राजपथोपगम् ।
यत्र बाला विषीदन्ति नास्ति संगो विजानताम् ॥५॥ )