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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

८० ] धम्मपदं [ १३।११
अनुवाद—यह लोक अन्धे जैसा है, यहाँ देखनेवाले थोड़े ही हैं; जालमे
मुक्त पक्षीकी भाँति विरले ही स्वर्गको जाते हैं।
जेतवन तीस भिक्षु
१७५-हंसादिच्चपथे यन्ति आकासे यन्ति इद्धिया ।
नीयन्ति धीरा लोकमहा नेत्वा मारं सवाहिणिं ॥६॥
(हंसा आदित्यपथे यन्ति, आकाशे यन्ति ऋद्धिया।
नीयन्ते धीरा लोकात् जित्वा मारं सबाहिनीकम् ॥ ९ ॥ )
अनुवाद—हंस सूर्यपथ (=आकाश)में जाते हैं, (योगी) ऋद्धि(-बल)-
से आकाशमें जाते हैं, धीर (पुरुष) सेना-सहित मारको
पराजित कर लोकमे (निर्वाणको) ले जाये जाते हैं।
जेतवन चिंचा (माणविका)
१७६-एकं धम्मं अतीतस्स मुसावादिरस जन्तुनो ।
वितिएणपरलोकस्स नत्थि पापं अकारियं ॥१०॥
(एकं धर्ममतीतस्य मृषावादिनो जन्तोः।
वितीर्णपरलोकस्य नास्ति पापमकार्यम् ॥ १०॥)
अनुवाद—जो धर्मको अतिक्रमण कर चुका, जो प्राणी मृषावादी है,
जो परलोक(का ख्याल) छोड़ चुका है, उसके लिये कोई
पाप अकरणीय नहीं।
जेतवन (अयुक्त दान)
१७७-न [वे] कदरिया देवलोकं वजन्ति
बाला ह वे न प्पसंसन्ति दानं ।