धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४।१५] बुद्धवग्गो [ ८७
(दुःखं दुःखसमुत्पादं दुःखस्य चातिक्रमम् ।
आर्याष्टांगिकं मार्गं दुःखोपशमगामिनम् ॥१३॥ )
१६२-एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुत्तमं ।
एतं सरणमासम्म सव्वदुक्खा पमुच्चति ॥१४॥
( एतत् खलु शरणं क्षेमं पतत् शरणमुत्तमम् ।
पतत् शरणमागम्य सर्वदुःखात् प्रमुच्यते ॥ १४ ॥ )
अनुवाद-जो बुद्ध (=परमज्ञानी), धर्म (=सत्यज्ञान) और संघ
(=परमज्ञानियोंके अनुयायियोंके समुदाय) की शरण
गया, जो चारों आर्यसत्यों* को प्रज्ञासे भलीप्रकार देखता
है। (वह चार सत्य हैं-) (१) दुःख, (२) दुःखकी उत्पत्ति,
(३) दुःखका अतिक्रमण, और (४, दुःख नाशक)
आर्य-अष्टांगिक मार्ग†-जो कि दुःखको शमनकरनेकी ओर
ले जाता है; ये हैं मंगलप्रद शरण, ये हैं उत्तम शरण, इन
शरणोंको पाकर (मनुष्य) सारे दुःखोंसे छूट जाता है।
जेतवन आनन्द (थेर) का प्रश्न
१९३-दुल्लभो पुरिसानञ्ञो न सो सव्वत्थ जायति ।
यत्थ सो जायती धीरो तं कुलं सुखमेधति ॥१५॥
- दुःख, उसका कारण, उसका नाश, और नाशका उपाय-यह बुद्ध
द्वारा आविष्कृत चार उत्तम सच्चाइयाँ हैं।
† आर्य-अष्टांगिक मार्ग है-ठीक धारणा, ठीक संकल्प, ठीक वचन, ठीक
कर्म, ठीक जीविका, ठीक उद्योग, ठीक स्मृति, और ठीक ध्यान ।