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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

१४।९ ] बुद्धवग्गो [ ८५
अनुवाद--क्षमा है परम तप, और तितिक्षा बुद्ध निर्वाणको परम
(=उत्तम ) बतलाते हैं; दूसरेका घात करनेवाला, दूसरे-
को पीडित करनेवाला प्रव्रजित (=गृहत्यागी ), श्रमण
(=संन्यासी ) नहीं हो सकता । निन्दा न करना, घात न
करना, प्रातिमोक्ष (=भिक्षु-नियम, आचार-नियम ) द्वारा
अपनेको सुरक्षित रखना, परिमाण जानकर भोजन करना,
एकान्तमें सोना-बैठना (=शयनासन=निवासगृह ), चित्तको
योगमें लगाना, यह बुद्धोंकी शिक्षा है ।
जेतवन ( उदास भिक्षु )
१८६-न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति ।
अप्पस्सादा दुखा कामा इति विञ्ञाय पण्डितो ॥८॥
( न कार्षापणवर्षेण तृप्तिः कामेषु विद्यते ।
अल्पास्वादा दुःखाः कामा इति विज्ञाय पण्डितः ॥८॥ )
१८७-अपि दिब्बेसु कामेसु रतिं सो नाधिगच्छति ।
तण्हक्खयरतो होति सम्मासम्बुद्धसावको ॥६॥
( अपि दिव्येषु कामेषु रतिं स नाऽधिगच्छति ।
तृष्णाक्षयरतो भवति सम्यक्संबुद्धश्रावकः ॥९॥ )
अनुवाद-यदि रुपयों (=कहापण ) की वर्षा हो, तो भी (मनुष्य की)
कामो( =भोगों ) से तृप्ति नहीं हो सकती । ( सभी ) काम
(=भोग ) अल्प-स्वाद, ( और ) दुःखद हैं, ऐसा जानकर
पंडित देवताओंके भोगोंमें भी रति नहीं करता; और
सम्यक्संबुद्ध (=बुद्ध )का श्रावक (=अनुयायी ) तृष्णा-
को नाश करनेमें लगता है ।