धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ ] धम्मपद [ १२।६
अनुवाद—(पुरुष) अपने ही अपना मालिक है, दूसरा कौन मालिक हो
सकता है, अपनेको भली प्रकार दमन कर लेने पर ( वह
एक ) दुर्लभ मालिकको पाता है ।
जेतवन महाकाल ( उपासक )
१६१-अत्तना'व कतं पापं अत्तजं अत्तसम्भवं ।
अभिमन्थति दुम्मेधं वजिरं 'व'स्ममयं मणिं ॥५॥
( आत्मनैव कृतं पापं आत्मजं आत्मसम्भवम् ।
अभिमथ्नाति दुर्मेधसं वज्रमिवाश्ममयं मणिम् ॥५॥ )
अनुवाद—अपनेसे जात, अपनेसे उत्पन्न, अपनेसे किया पापं, ( करने-
वाले ) दुर्बुद्धिको पाषाणमय वज्रमणीकी ( चोटकी ) भाँति
मन्थन (=पीडित ) करता है ।
जेतवन देवदत्त
१६२-यस्सच्चन्तदुस्सीव्यं मालुवा सालमिवोततं ।
करोति सो तयत्तानं यथा 'नं इच्छती दिसो ॥६॥
( यस्याऽत्यन्तदौःशील्यं मालुवा शालमिवाततम् ।
करोति स तथात्मानं यथैनमिच्छंति द्विपः ॥६॥ )
अनुवाद—मालुवालता १ से वेष्टित शाल ( वृक्ष ) की भाँति जिसका दुरा-
चार फैला हुआ है; वह अपनेको वैसा ही कर लेता है, जैसा
कि उसके शत्रु चाहते हैं ।
१ मालुवा एक लता है, जो जिस वृक्षपर चढ़ती है, वर्षा पानीके
मारसे उसे तोड़ डालती है ।