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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

७६ ] धम्मपदं [ १२।१०
( आत्मनैव कृतं पापं आत्मना संक्लिश्यति ।
आत्मनाऽकृतं पापं आत्मनैव विशुध्यति ।
शुद्धयशुद्धी प्रत्यात्मं नाऽन्योऽन्यं विशोधयेत् ॥९॥ )
अनुवाद—अपनेसे किया पाप अपनेको ही मलिन करता है, अपने
पाप न करे तो अपने ही शुद्ध रहता है; शुद्धिअशुद्धि प्रत्येक
( आदमी )की अलग अलग है; दूसरा ( आदमी )दूसरेको
शुद्ध नहीं कर सकता ।
जेतवन अत्तदत्थ ( थेर )
१६६—अत्तदत्थं परत्थेन बहुनाऽपि न हापये ।
अत्तदत्थमभिञ्ञाय सदत्थपसुतो सिया ॥१०॥
(आत्मनोऽर्थं परार्थेन बहुनाऽपि न हापयेत् ।
आत्मनोऽर्थमभिज्ञाय सदर्थप्रसितः स्यात् ॥१०॥)
अनुवाद—परायेके बहुत हितके लिये भी अपने हितकी हानि न करे;
अपने हितको जान कर सच्चे हितमें लगे ।
१२—आत्मवर्ग समाप्त