धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
२१. पकिण्णकवग्गो (प्रकीर्णक वर्ग)
१५२ ] धम्मपद [ २४।१२
तस्मात् तृष्णां विनोदयेद्
भिक्षुराकांक्षी विरागमात्मनः ॥१०॥)
अनुवाद—तृष्णाके पीछे पड़े प्राणी बँधे खरगोशकी भाँति चक्कर
काटते हैं; इसलिए भिक्षुको चाहिए कि वह अपने वैराग्यकी
इच्छा रख, तृष्णाको दूर करे ।
वेणुवन विभन्तक (भिक्षु)
३४४—यो निब्बनथो वनाधिमुत्तो वनमुत्तो वनमेव धावति ।
तं पुग्गलमेव पस्सथ मुत्तो बन्धनमेव धावति ॥११॥
(यो निर्वाणार्थी वनाऽधिमुक्तो
वनमुक्तो वनमेव धावति ।
तं पुद्गलमेव पश्यत मुक्तो
बन्धनमेव धावति ॥११॥)
अनुवाद—जो निर्वाणकी इच्छा वाला (पुरुष) वन (=तृष्णा) से
मुक्त हो, वनसे सुमुक्त हो, फिर वन (=तृष्णा) ही
की ओर दौड़ता है, उस व्यक्तिको (वैसे ही) जानो
जैसे कोई (बन्धन) से मुक्त (पुरुष) फिर बन्धन ही
की ओर दौड़े ।
जेतवन बन्धनागार
३४५—न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा यदायसं दारुजं पब्बजञ्च ।
सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा ॥१२॥
(न तद् दृढं बन्धनमाहुर्धीरा
यद् आयसं दारुजं पार्वजं च ।
२४।१४ ] तण्हावग्गो [ १५३
सारवद्रत्ता मणिकुण्डलेसु
पुत्तेसु दारेसु च याऽपेक्षा ॥१२॥)
अनुवाद—( यह ) जो लोहे लकड़ी या रस्सीका बन्धन है, उसे बुद्धि-
मान ( जन ) दृढ़ बन्धन नहीं कहते, ( वस्तुतः दृढ़ बन्धन
है जो यह) धन (=सारवत्) में रक्त होना, या मणि, कुण्डल,
पुत्र स्त्रीमें इच्छाका होना है।
३४६-एतं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा
ओहारिनं सिथिलं दुप्पमुञ्चं ।
एतम्पि छेत्वान परिव्बजन्ति
अनपेक्खिनो कामसुखं पहाय ॥ १३॥
( एतद् दृढं बन्धनमाहुर्धीरा
अपहारि शिथिलं दुष्प्रमोचम् ।
एतदपि छित्त्वा परिव्रजन्त्य-
-नपेक्षिणः कामसुखं प्रहाय ॥ १३ ॥ )
अनुवाद—धीर पुरुष इसीको दृढ़ बन्धन, अपहारक शिथिल और
दुस्त्याज्य कहते हैं,, (वह) अपेक्षा रहित हो, तथा काम-सुखों-
को छोड़, इस (दृढ़) बन्धनको छिन्नकर, प्रव्रजित होते हैं।
राजगृह ( वेणुवन ) खेमा ( बिम्बसार-महिषी )
३४७-ये रागरत्तानुपतन्ति सोतं सयं कतं मक्कटको 'व जालं ।
एतम्पि छेत्वान बजन्ति धीरा
अनपेक्खिनो सब्बदुक्खं पहाय ॥ १४॥
१५४ ] धम्मपदं [ २४।१६
( ये रागरक्ता अनुपतन्ति स्रोतः
स्वयंस्कृतं मर्कटक इव जालम् ।
एतदपि छित्वा व्रजन्ति धीरा
अनपेक्षिणः सर्वदुःखं प्रहाय ॥१४॥)
अनुवाद—जो रागमें रक्त हैं, वह जैसे मकड़ी अपने बनाये जालमें
पड़ती है, (वैसे ही) अपने बनाये, स्रोतमें पड़ते हैं, धीर
(पुरुष) इस (स्रोत) को भी छेद कर सारे दुःखोंको
छोड़ आकांक्षा रहित हो चल देते हैं ।
राजगृह (वेणुवन) उग्गसेन (सेठ्ठी)
३४८-मुञ्च पुरे मुञ्च पच्छतो मज्झे मुञ्च भवस्स पारगू ।
सब्बत्थ विमुत्तमानसो न पुन जातिजरं उपेहिसि ॥१५॥
(मुंच पुरो मुंच पश्चात् मध्ये मुंच भवस्य पारगः ।
सर्वत्र विमुक्तमानसो न पुनः जातिजरे उपैषि ॥१५॥)
अनुवाद—आगे पीछे और मध्यकी (सभी वस्तुओंको) त्याग दो,
(और उन्हें छोड़) भव(सागर)के पार हो जाओ; जिसका
मन चारों ओरसे मुक्त हो गया, (वह) फिर जन्म और
जरा को प्राप्त नहीं होता ।
जेतवन (चुल्ल) धनुग्गह पडित
३४९-वितक्कपमथितस्स जन्तुनो तिव्वरागास्स सुभानुपस्सिनो ।
भिय्यो तण्हा पवड्ढति एसो खो दळ्हं करोति बन्धनं ॥१६॥
(वितर्क-प्रमथितस्य जन्तोः
तीव्ररागस्य शुभानुदर्शिनः ।
भूयः तृष्णा प्रवर्द्धते एष खलु दृढं करोति बन्धनम् ॥१६॥)
२४।१८ ] तण्हावग्गो [ १५५
अनुवाद—जो प्राणी सन्देहसे मथित, तीव्र रागसे युक्त, सुन्दर ही
सुन्दरको देखने वाला है, उसकी तृष्णा और भी अधिक
बढ़ती है, वह (अपनेलिए) और भी दृढ़ बन्धन तय्यार करता है।
३५०-वितक्कूपसमे च यो रतो असुभं भावयति सदा सतो ।
एस खो व्यन्तिकाद्दिनी एसच्छेज्जति मारबन्धनं ॥१७॥
( वितर्कौपशमे च यो रतो
ऽशुभंभावयते सदा स्मृतः।
एष खलु व्यन्तीकरिष्यति
एष छेत्स्यति मारबन्धनम् ॥१७॥)
अनुवाद—सन्देहके शान्त करनेमें जो रत है, सचेत रह (जो)
अशुभ (दुनियाके अन्धेरे पहलू) की भी सदा भावना
करता है। वह मारके बन्धनको छिन्न करेगा, विनाश
करेगा।
जेतवन मार
३५१-निट्ठङ्गतो असन्तासी वीततण्हो अनङ्गणो।
उच्छिन्दि भवसल्लानि अन्तिमोऽयं समुस्सयो ॥१८॥
(निष्ठांगतोऽसंत्रासी वीततृष्णोऽनंगणः।
उत्सृज्य भवशल्यानि, अन्तिमोऽयं समुच्छ्रयः ॥१८॥)
अनुवाद—जिसके (पाप-पुण्य) समाप्त हो गये; जो त्रास-उत्पादक
नहीं है, जो तृणारहित और मलरहित है, वह भवके
शल्योको उखाडेगा, यह उसका अंतिम देह है।
१५६ ] धम्मपदं [ २४।२०
३५२--वीततण्हो अनादानो निरुत्तिपदकोविदो ।
अक्खरानं सन्निपातं जञ्ञा पुव्वापरानि च ।
स वे अन्तिमसारीरो महापण्णो'ति वुच्चति ॥१६॥
( वीततृष्णोऽनादानो निरुक्तिपदकोविदो ।
अक्षराणां सन्निपातं जानाति पूर्वापराणि च ।
स वै अन्तिमशरीरो महाप्राज्ञ इत्युच्यते ॥१९॥)
अनुवाद—जो तृणारहित, परिग्रहरहित, भाषा और काव्यका जान-
कार है; और (जो) अक्षरोंके पहिले पीछे रखनेको जानता
है, यह निश्चय ही अन्तिम शरीर वाला तथा महाप्राज्ञ
कहा जाता है।
वाराणसीसे गयाके रास्तेमें उपक ( आजीवक )
३५३--सब्वाभिभू सव्वविदूहमस्मि
सव्वेसु धम्मेसु अनूपलित्तो ।
सब्बञ्जहो तण्हक्खये विमुत्तो
सयं अभिञ्ञाय कमुद्दिसेय्यं ॥२०॥
( सर्वाभिभूः सर्वविदहमस्मि सर्वेषु धर्मेष्वनुपलिप्तः ।
सर्वजहः तृष्णाक्षये विमुक्तः
स्वयमभिज्ञाय कमिहोद्दिशेयम् ॥ २० ॥)
अनुवाद—मैं (राग आदि) सभीका परास्त करनेवाला हूँ, (दुःखोंसे
मुक्ति पानेकी) सभी (बातों) का जानकार हूँ, सभी
धर्मों (-पदार्थों) में अलिप्त हूँ, सर्वत्यागी, तृष्णाके नाशसे
२७।२२ ] तण्हावग्गो [ ३५७
मुक्त हूँ, ( विमल ज्ञानको ) अपने ही जानकर ( मैं अब )
किसको ( अपना गुरु ) बतलाऊँ ?
जेतवन सक्क देवराज
३५४-सब्बदानं धम्मदानं जिनाति
सब्बं रसं धम्मरसो जिनाति ।
सब्बं रतिं धम्मरती जिनाति
तण्हक्खयो सब्बदुक्खं जिनाति ॥२१॥
( सर्वदानं धर्मदानं जयति
सर्वं रसं धर्मरसो जयति ।
सर्वां रतिं धर्मरतिर्जयति
तृष्णाक्षयः सर्वदुःखं जयति ॥ २१ ॥ )
अनुवाद—धर्मका दान सारे दानोंसे बढ़कर है, धर्मरस सारे रसोंसे
प्रबल है, धर्ममें रति सब रतियोंसे बढ़कर है, तृष्णाका
विनाश सारे दुःखोंको जीत लेता है ।
जेतवन ( अपुत्रक श्रेष्ठी )
३५५-हनन्ति भोगा दुम्मेधं नो चे पारगवेसिनो ।
भोगतण्हाय दुम्मेधो हन्ति अञ्ञे'व अत्तनं ॥२२॥
( घ्नन्ति भोगा दुर्मेधसं न चेत् पारगवेषिणः ।
भोगतृष्णाया दुर्मेधा हन्त्यन्य इवात्मनः ॥ २२ ॥ )
अनुवाद—( संसारको ) पार होनेकी कोशिश न करनेवाले दुर्बुद्धि
( पुरुष ) को भोग नष्ट करते हैं, भोगकी तृष्णामें पड़कर
(वह) दुर्बुद्धि परायेकी भाँति अपने हीको हनन करता है ।
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