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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

धम्मपदं [ १४।१८
(दुर्लभः पुरुषाजानेयो न स सर्वत्र जायते।
यत्र स जायते धीरः तत् कुलं सुखमेधते ॥ १५ ॥)
अनुवाद—उत्तम पुरुष दुर्लभ है, वह सर्वत्र उत्पन्न नहीं होता, वह
धीर (पुरुष) जहाँ उत्पन्न होता है, उस कुलमें सुखकी
वृद्धि होती है।
जेतवन बहुतसे भिक्षु
१६४—सुखो बुद्धानं उप्पादो सुखा सद्धम्मदेसना ।
सुखा संघस्स सामग्गी समग्गानं तपो सुखो ॥ १६॥
(सुखो बुद्धानां उत्पादः सुखा सद्धर्म-देशना।
सुखा संघस्य सामग्री समग्राणां तपः सुखम् ॥ १६॥)
अनुवाद—सुखदायक है बुद्धोंका जन्म, सुखदायक है सच्चे धर्मका
उपदेश, संघमें एकता सुखदायक है; और सुखदायक है,
एकतायुक्त हो तप करना ।
चारिकाके समय कस्सप बुद्धका सुवर्ण चैत्य
१६५-पूजारहे पूजयतो बुद्धे यदि व सावके ।
पपञ्चसमतिक्कन्ते तिण्णसोकपरिद्दवे ॥१७॥
(पूजार्हान् पूजयतो बुद्धान् यदि वा श्रावकान् ।
प्रपंचसमतिक्रान्तान् तीर्णशोकपरिद्ववान् ॥ १७ ॥)
१६६-ते तादिसे पूजयतो निब्बुते अकुतोभये ।
न सक्का पुञ्ञं संख्यातुं इमेत्तमपि केनचि ॥१८॥