अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा
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करने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहे हैं। ये भयंकर विषम-
ताएँ और विकास के अवसरों की कृत्रिम समानताएं समाज को अराजकता
की ओर ले जा रही हैं।
यदि इसकी उपेक्षा कर दी जाती है तथा वर्तमान शासन-व्यवस्था
नवोदित प्राकृतिक शक्तियों के मार्ग को रोक देती है और यह क्रम निरन्तर
चलता रहा, तो एक भयंकर संघर्ष उत्पन्न होना निश्चित है, जिसके फल-
स्वरूप समस्त अवरोधक तत्त्वों को उठाकर फेंक दिया जाएगा तथा सर्व-
हारा वर्ग का आधिपत्य होगा, जिससे क्रान्ति का लक्ष्य प्राप्त किया जा
सके। क्रान्ति मानव-जाति का जन्मसिद्ध अधिकार है। स्वतन्त्रता सभी
मनुष्यों का एक ऐसा जन्मसिद्ध अधिकार है, जिसे किसी भी स्थिति में
छीना नहीं जा सकता। श्रमिक वर्ग समाज का वास्तविक आधार है। प्र-
प्रभुता की स्थापना श्रमिकों का अन्तिम लक्ष्य है। इन आदर्शों तथा आग्रह
के लिए हम उन सब कष्टों का सामना करेंगे, जो हमें न्यायालय द्वारा दिये
जाएँगे। इस वेदी पर हम अपना यौवन धूपबत्ती की तरह जलाने के लिए
सन्नद्ध हुए हैं। इस महान लक्ष्य के लिए कोई भी बलिदान बड़ा नहीं माना
जा सकता। हम क्रान्ति की उन्नति की सन्तोष के साथ प्रतीक्षा करेंगे।'"'
इन्कलाब-जिन्दाबाद।"
भगतसिंह के इस भाषण से स्वाभाविक रूप में देश का ध्यान उनके
तथा दल के प्रति आकृष्ट हुआ। इस मुकदमे में उन्होंने अपने बचाव का
कोई प्रयत्न नहीं किया। अदालत की कार्यवाही 10 जून, 1929 को पूरी
हो गई और इसके दो दिन बाद 12 जून को निर्णय सुना दिया गया, जिसमें
भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त दोनों को आजीवन कारावास का दण्ड मिला।
इसके बाद भगतसिंह पंजाब की मियानवाली जेल भेज दिये गये तथा बटुकेश्वर
दत्त लाहौर सेन्ट्रल जेल भेज दिये गए।
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लाहौर उच्च न्यायालय में इस अपील की पेशी जस्टिस फोर्ड तथा
जस्टिस एडीसन के सामने हुई। यहाँ भी भगतसिंह ने अपने उद्देश्यों के
विषय में बयान दिया। इस बयान में उन्होंने यह सिद्ध करना चाहा कि वे
कोई अपराधी नहीं हैं, वरन् मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करनेवाले
एक योद्धा हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि किसी भी अप-
राधी को दण्ड उसके उद्देश्य को ध्यान में रखकर मिलना चाहिए—
" जब तक अभियुक्त के मनोभाव का पता न लग जाए, उसके
वास्तविक उद्देश्य का पता नहीं चल सकता। यदि उद्देश्य को पूरी तरह
भुला दिया जाए, तो किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हो सकता,
क्योंकि उद्देश्य की उपेक्षा करने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति साधारण
हत्यारे नज़र आएँगे। शासकीय कर ग्रहण करने वाले अधिकतर चोर-
जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी हत्या का अभियोग लगेगा।
इस तरह तो समाज-व्यवस्था और सभ्यता, खून-खराबा, चोरी और जाल-
साज़ी बनकर रह जाएगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए तो सरकार
को क्या अधिकार है कि समाज के व्यक्तियों से न्याय की उपेक्षा करे!
उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो हर धर्म-प्रचार झूठ का प्रचार दिखाई देगा
और प्रत्येक पैगम्बर पर अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों अनजान और
भोले-भाले लोगों को गुमराह किया। यदि उद्देश्य को भुला दिया जाए, तो
हजरत ईसा मसीह गड़बड़ करने वाले, शान्ति भंग करने वाले और विद्रोह
का प्रचार करने वाले दिखाई देंगे और कानून के शब्दों में खतरनाक
व्यक्तित्व समझे जाएँगे, किन्तु हम उनकी पूजा करते हैं; हमारे हृदयों में
उनके लिए असीम आदर है।"
लाहौर उच्च न्यायालय ने इस अपील को खारिज कर दिया तथा
निचली अदालत की सजा को कायम ठहराया। जेलों में राजनैतिक कैदियों
के लिए सुविधाओं को लेकर भगतसिंह ने 15 जून, 1929 से आमरण अन-
शन प्रारम्भ कर दिया। यह समाचार मिलने पर बटुकेश्वरदत्त ने भी
लाहौर सेन्ट्रल जेल में उसी दिन से उनके समर्थन में भूख हड़ताल शुरू कर
दी। भगतसिंह मियाँवाली जेल में थे। अब इन पर साण्डर्स हत्या-
कांड का मुकदमा भी चलने वाला था। इस हत्याकाण्ड में अन्य अभियुक्त
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लाहौर सेण्ट्रल जेल में थे। अतः 17 जून, 1929 को उन्होंने पंजाब राज
के इंसपेक्टर जनरल जेल को अपना स्थानान्तरण लाहौर सेण्ट्रल जेल
करवाने के लिए प्रार्थना-पत्र दिया। उनकी यह मांग मान ली गई और
इसी माह के अन्तिम सप्ताह में उन्हें लाहौर सेण्ट्रल जेल भेज दिया गया।
लाहौर काण्ड पर मुकदमा :
साण्डर्स हत्याकाण्ड, जो लाहौर काण्ड भी कहलाता है, इस पर
मुकदमा 10 जुलाई, 1929 से लाहौर के मजिस्ट्रेट श्री कृष्ण की अदालत में
प्रारम्भ हुआ। भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त अनशन पर थे, अतः उन्हें
स्ट्रेचर पर अदालत में लाया गया। इसके बाद उनके समर्थन में इस काण्ड
के अन्य अभियुक्तों ने भी भूख हड़ताल आरम्भ कर दी। भगतसिंह ने 14
जुलाई, 1929 को अपनी मांगों के विषय में भारत सरकार के गृह सदस्य
को एक पत्र भेजा, जिसमें कैदियों के लिए सुविधाओं की मांग की गई थी।
सरकार इन मांगों को कोई महत्त्व नहीं दे रही थी, हड़ताल चलती रही।
कैदियों का स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरता रहा, भगतसिंह का वजन प्रारम्भ
में 133 पौण्ड था, जो 30 जुलाई तक लगभग 5 पौण्ड प्रति सप्ताह गिरता
रहा और फिर स्थिर हो गया।
अनशन में जतीनदास की मृत्यु
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हो गए हैं, उनमें करवट बदलने की भी ताकत नहीं है। वह बहुत धीरे-धीरे
बोलते हैं। वास्तव में देखा जाए, तो वह मौत की ओर बढ़ रहे हैं। मुझे
इन बहादुर नौजवानों के कष्ट को देखकर बहुत दुःख हुआ। मालूम होता
है, ये अपने प्राणों की बाजी लगाकर इस लड़ाई में शामिल हुए हैं। ये
चाहते हैं कि राजनीतिक बंदियों के साथ राजनीतिक कैदियों का जैसा
व्यवहार हो। मुझे पूरा विश्वास है कि यह तपस्या सफलता से सुशोभित
होकर ही रहेगी।'
इस अनशन की सहानुभूति में अनेक अन्य जेलों में भी अनशन किया
गया। इस अनशन के कारण मुकदमे की तारीखें भी बदलती गईं। बाद में
पंजाब जेल कमेटी ने सुधार की मांगों पर विचार करने के लिए एक उप-
समिति बनाई। अतः 2 सितम्बर, 1929 को जतीनदास को छोड़कर अन्य
सभी ने अनशन तोड़ दिया। इस उपसमिति ने जतीनदास को रिहा कर देने
की सिफारिश की थी, किन्तु सरकार ने बिना जमानत रिहा करना स्वीकार
नहीं किया। और जमानत-पत्र पर जतीनदास ने हस्ताक्षर करने से मना
कर दिया। जतीनदास की स्थिति को देखकर भगतसिंह आदि ने दो दिन
बाद पुनः अनशन प्रारम्भ कर दिया। अन्ततः 13 सितम्बर, 1929 को
एक बजकर पाँच मिनट पर जतीनदास मृत्यु को प्राप्त हो गए। उनके शव
को लाहौर से कलकत्ता भेजने के लिए नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने 600 रु०
भिजवाए थे, अतः उनका शव कलकत्ता भेज दिया गया, जहाँ उनके अन्तिम
संस्कार में लाखों लोगों ने एकत्र होकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
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इन्हें विश्वास था कि यह सर्व कानूनी कार्यवाही केवल एक दिखावा थी।
अतः ये भी अदालत की हर कार्यवाही पर अड़ंगा लगाते रहते थे। एक
बार इसी प्रकार की एक घटना में न्यायाधिकरण के अध्यक्ष जस्टिस कोल्ड-
स्ट्रीम ने पुलिस को आदेश दिया कि इन अभियुक्तों को लाठियों तथा जूतों
से पीटा जाए। पुलिस ने ऐसा ही किया। अतः अभियुक्तों ने दूसरे दिन से
अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया और जस्टिस कोल्डस्ट्रीम
को बदलने की मांग की। इस दिन पुलिस द्वारा अभियुक्तों के साथ जो
दुर्व्यवहार किया गया, इस कार्यवाही की न्यायाधिकरण के भारतीय
सदस्य जस्टिस आगा हैदर ने भी आलोचना की थी, अतः कोल्डस्ट्रीम के
साथ ही आगा हैदर को भी बदलकर नया न्यायाधिकरण बनाया गया,
जिसमें जस्टिस जी० सी० हिल्टन, जस्टिस अब्दुल कादिर तथा जस्टिस
जे० के० टॅप थे।
अभियुक्तों ने फिर भी अदालत का बहिष्कार जारी रखा। भगतसिंह
का कहना था कि जस्टिस कोल्डस्ट्रीम को अपने व्यवहार के लिए माफी
मांगनी चाहिए। सरकार ने जस्टिस कोल्डस्ट्रीम को लम्बी छुट्टी पर भेज
दिया था और सरकार इस माँग को स्वीकार भी कैसे कर सकती थी।
फैसला :
न्यायाधिकरण में अभियुक्तों की अनुपस्थिति में एकतरफा कार्यवाही
चली। इसके बाद 26 अगस्त, 1930 को अदालत ने अपना काम पूरा कर
लिया, तब अभियुक्तों के पास सन्देश भेजा गया कि वे अपने बचाव के
लिए स्वयं कुछ कहना चाहें या वकील रखना चाहें अथवा कोई गवाह
प्रस्तुत करना चाहें तो करें। अभियुक्त इस नाटक का अर्थ समझते थे,
क्योंकि समस्त कार्यवाही हो जाने के बाद अब केवल निर्णय ही दिया जाने
वाला था, अतः उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया।
7 अक्टूबर 1930 को इस मुकदमे का फैसला सुना दिया गया।
अभियुक्तों ने अदालत का बहिष्कार कर रखा था, अतः ट्रिब्यूनल के एक
विशेष सन्देशवाहक ने उन्हें यह फैसला जेल में ही जाकर सुनाया। फैसले
के अनुसार अभियुक्तों को निम्न दण्ड दिये गए थे-
"?
Wait, look at:
"पं०" then a space, then "राधे" or "राजे"?
Wait, could it be "पं० जी के साथ"?
Look at the last word: 'य' 'ा' 'द' -> "याद"!
Wait, what is the word before "याद"?
Is it "की"?
Wait, look at the letter: 'क' with left stroke? No, it's 'क' with matra: 'के' or 'की'.
Wait, what if it is "पं० जी की याद"?
Why would it have that shape between पं० and की?
Let's look at that shape very closely:
It has:
Top bar.
Left: like a vertical with a tick, or 'र'?
Right: like 'ध' or 'घ' with 'े'?
Wait, could it be "राधे"?
Wait, who was "राधे"?
Wait, was someone named "राधे" in H.S.R.A.?
Radha Krishna? Radhe Shyam?
Wait! What about "पं० राधे" - could it be "पं० राधे की याद"?
Wait, let's look at lines 3, 4, 5 again very carefully:
काले पानी की सजा — कमलनाथ तिवारी, जयदेव
कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, गया
सिंह तथा किशोरीलाल ।
Wait! Look at line 5 again:
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बदलवाने के लिए आवाज उठाई, जगह-जगह से लोगों ने हस्ताक्षर अभियान
चलाकर वाइसराय के पास अनुस्मारक भेजे, किन्तु, इनका परिणाम
शून्य ही रहा। और 23 मार्च, 1931 को इन तीनों वीरों को लाहौर में
फाँसी दे दी गई।
फाँसी दे दिए जाने पर भी देश के आक्रोश में कमी नहीं आई। देश भर
के समाचार-पत्रों ने सरकार के इस कृत्य की भर्त्सना की। महात्मा गांधी
उस समय भारत की राजनीति पर छाए हुए थे। फरवरी, 1931 में वाइसराय
लार्ड इरविन के साथ उनका एक समझौता हुआ, जिसे गांधी-इरविन
समझौता कहा जाता है। भारत की जनता बड़ी आशाओं के साथ इस
समझौते की रिपोर्ट की प्रतीक्षा कर रही थी। उसे पूरा विश्वास था कि
गांधीजी इन वीरों को फाँसी पर चढ़ने से बचा लेंगे, किन्तु समझौते की
रिपोर्ट प्रकाशित होने पर उसकी सारी आशाओं पर पानी फिर गया;
समझौते में इस मामले का कोई उल्लेख ही नहीं था। हाँ, काँग्रेसी सत्या-
ग्रही, जो जेलों में थे, सबको छोड़ दिए जाने की घोषणा की गई थी।
गांधीजी के इस कार्य की खूब आलोचना हुई। जगह-जगह पत्रकारों ने
उनसे इस विषय में प्रश्न पूछे। इस फाँसी के कुछ ही दिन बाद कराँची
कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए वहाँ जाने पर उन्हें काले झण्डे
दिखाए गए।
इस फाँसी के बाद पंजाब में जगह-जगह सभाएँ हुईं। लोगों ने अपने
खून से लिखकर इसका बदला लेने की शपथ ली। किसानों ने कर देना
बन्द कर दिया। भगतसिंह उनके लिए आराध्यदेव के समान बन गए थे।
उनके चित्र धड़ाधड़ बिकने लगे। देश भर में इन वीरों की वीरतापूर्ण
जीवनी की पुस्तकें प्रकाशित होने लगीं। सरकार इन्हें अपने लिए मौत का
साया समझती थी। परिणामस्वरूप इन चित्रों एवं पुस्तकों पर प्रतिबन्ध
लगा दिया गया।
इन वीरों के शहीद होने पर भारतीय क्रान्तिकारियों के इतिहास के
एक अध्याय की इतिश्री हो गई।
इस बीच आजाद की भूमिका :
भगतसिंह आदि के गिरफ्तार हो जाने पर भी चन्द्रशेखर आजाद
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निष्क्रिय होकर नहीं बैठे। इसके बाद भी वे कुछ-न-कुछ करते रहते थे।
वाइसराय की गाड़ी को बम से उड़ाने का प्रयास भी इसकी पुष्टि करता
है। इसके साथ ही वह पण्डित मोतीलाल नेहरू तथा उनके सुपुत्र
पण्डित जवाहरलाल नेहरू से भी मिले थे। यद्यपि कांग्रेस के तथा उनके
सिद्धान्तो में अन्तर था, फिर भी दोनों के लक्ष्य समान थे। नेहरू परिवार
से उनके सम्बन्ध सुमधुर थे। यह परिवार यद्यपि खुले रूप में क्रान्ति-
कारियों का समर्थन नहीं करता था, तथापि उसे इन वीरों के साथ सहानु-
भूति अवश्य थी। कहा जाता है, अपने इन्हीं फरारी के दिनों में 1930 में
वह आनन्द भवन, इलाहाबाद गए। वहाँ उन्होंने पण्डित मोतीलाल नेहरू
से भेंट की। पण्डित नेहरू ने उन्हें अहिंसा का मार्ग त्यागने का परामर्श
दिया था, जिसे आजाद ने विनम्र शब्दों में अस्वीकार कर दिया था।
उन्होंने कहा कि उन्हें अहिंसा पर विश्वास नहीं था, वह नहीं समझते थे
कि कांग्रेस की इस अहिंसा की नीति से अंग्रेज भारत को छोड़कर चले
जाएँगे। अंग्रेजों को भगाने के लिए वह हिंसा को अनिवार्य मानते थे।
इसके बाद वह पण्डित जवाहरलाल नेहरू से भी मिले थे। उनकी
गिरफ्तारी पर दस हजार रुपयों का इनाम था और वह इस प्रकार घूम
रहे थे, इससे जवाहरलाल नेहरू को बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने इस
विषय में आजाद से सचेत रहने को कहा, किन्तु, आजाद को इस सब की
परवाह कहाँ थी! उनका तो बस इतना ही कहना था कि जीते जी पुलिस
उन्हें नहीं पकड़ पाएगी। इन्हीं दिनों गांधी-इरविन समझौते के लिए बातें
चल रही थीं। इस सम्बन्ध में आजाद ने नेहरूजी से पूछा था कि इस
समझौते में प्राणों को हथेली पर रखकर घूमने वाले क्रान्तिकारियों के
लिए क्या किया जाएगा? पण्डित नेहरू शायद इसका कोई उत्तर नहीं
दे पाए थे, क्योंकि वे जानते थे कि इस समझौते के हो जाने पर भी इन
वीरों की रक्षा नहीं हो सकेगी। इस समझौते में गांधीजी इरविन से बातें
करेंगे और उन्हें अपने सिद्धान्त सबसे प्रिय थे, किन्तु नेहरूजी की हार्दिक
इच्छा थी कि इन क्रान्तिकारियों की रक्षा होनी चाहिए। भगतसिंह आदि
को फाँसी दे दिए जाने पर उन्हें जो दुःख हुआ, उसे व्यक्त करते हुए उन्होंने
कहा था—
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चन्द्रशेखर आज़ाद
"मैं भगतसिंह तथा उनके साथियों के अन्तिम दिनों में मौन धारण
किए रहा, क्योंकि मैं जानता था कि कहीं मेरे बोलने से फाँसी की सजा
रद्द होने की सम्भावना जाती न रहे। मैं चुप रहा, गोकि इच्छा होती थी मैं
उबल पडूँ। हम सब मिलकर उन्हें बचा न सके, गोकि हमारे इतने प्यारे थे,
और उनका महान त्याग तथा साहस भारत के नौजवानों के लिए एक
प्रेरणा की चीज थी और है। हमारी इस असहायता पर देश में दुःख
प्रकट किया जाएगा, किन्तु साथ ही हमारे देश की इस स्वर्गीय आत्मा पर
गर्व है और जब इंग्लैण्ड हम से समझौते की बात करे, तो हम भगतसिंह
की लाश को भूल न जाएं।"
क्रान्तिकारियों से नेहरूजी की सहानुभूति के कारण लाहौर काण्ड के
एक मुखबिर कैलाशपति ने उनके नाम का भी उल्लेख किया था इस सम्बन्ध
में मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं—
"उसकी स्मरण-शक्ति अद्भुत थी। बयान में उसने लाहौर से लेकर
कलकत्ते तक बीसियों मनुष्यों का नाम लिया। जिस सरगर्मी से वह क्रान्ति-
कारी बना था, उसी सरगर्मी से मुखबिर बना न तब कोई उसको फिक्र थी
न अब।... उसने अपने बयान में पण्डित जवाहरलाल तक को तान दिया
था, फिर कौन बचता।"
स्पष्ट है कि नेहरूजी को यद्यपि क्रान्तिकारियों से पूरी सहानुभूति
थी, फिर भी वह कुछ कर पाने में असमर्थ थे।
आज़ाद द्वारा भगतसिंह की मुक्ति का प्रयास :
1930 में काँग्रेस के आन्दोलन भी जोरों पर थे, अतः क्रान्तिकारी दल
ने भी अपनी कार्यवाहियाँ तेज करने का निर्णय लिया। इस समय दल के
भगतसिंह आदि अनेक सदस्य जेलों में थे, किन्तु आज़ाद चुप नहीं बैठे थे,
इस समय उनके मुख्य सहयोगी भगवतीचरण थे। उन्हें विश्वास हो गया था
कि भगतसिंह को सरकार अवश्य फाँसी पर लटका देगी। इस समय आज़ाद
तथा भगवतीचरण ने भगतसिंह को जेल से मुक्त कराने की योजना बनाने
की सोची। उन्होंने योजना के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया।
---- फाँसी देने पर तुली हुई थी। यदि ऐसे समय में उन्हें
सरकार भग
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जेल से छुड़ा लिया जाता, तो इससे पूरी दुनिया में एक तहलका मच
जाता। आजाद इसे कार्यरूप देकर सरकार की जड़ें हिला देना चाहते
थे।
इस योजना पर पहले आजाद और भगवतीचरण कई दिनों तक
विचार करते रहे, कि इसके लिए कितनी तैयारी करनी होगी। कार्यवाही
के समय कुछ पुलिस वालों तथा दल के सदस्यों का मारा जाना भी
सम्भव होगा, इसके लिए बमों, पिस्तौलों आदि की भी आवश्यकता थी,
इसके साथ ही एक-दो कारों तथा इस सब सामान को छिपाने के लिए जेल
के पास ही किसी मकान को भी किराये पर लेना पड़ता। इस योजना में
महिलाओं को सम्मिलित किया जाए अथवा नहीं इस पर भी विचार किया
गया। योजना का निश्चय हो जाने पर यशपाल, सुखदेवराज, धनवन्तरी
आदि को भी इसके बारे में बताया गया तथा इस योजना में दुर्गादेवी एवं
सुशीला दीदी का भी सहयोग लेना निश्चित किया गया।
100 चन्द्रशेखर आजाद
जाएँ और ड्राइवर उन्हें लेकर चल दे। पुलिस पर धावा बोलने के लिए
क्रान्तिकारियों के दो समूह बनाए गए थे। एक दल बमों से हमला करता,
जिसका नेतृत्व भगवतीचरण को करना था। दूसरा दल पुलिस को पीछा
करने से रिवाल्वरों से रोकता, इसके नेता चन्द्रशेखर आजाद बनाए
गए थे।
इस योजना के लिए भगतसिंह से भी सम्पर्क करके सलाह कर ली गई
थी। बोरस्टल जेल में पुलिस का सुरक्षा प्रबन्ध सेण्ट्रल जेल की तुलना में
कम था। अतः भगतसिंह का विचार था कि पुलिस पर हमला बोरस्टल
जेल के बाहर किया जाए, तो अच्छा रहेगा, किन्तु बोरस्टल जेल बड़ी सड़क
से कुछ दूर पीछे को थी, अतः भगतसिंह एवं बटुकेश्वरदत्त के मोटरगाड़ी
में बैठने तक यहाँ सेण्ट्रल जेल की पुलिस भी पहुँच सकती थी और उनका
दूसरी बार फिर सामना करना पड़ जाता। अन्ततः सेण्ट्रल जेल के बाहर
ही धावा बोलने की योजना निश्चित की गई। योजना रोमांचक थी। इसमें
दोनो ओर से कुछ लोगों का मृत्यु को प्राप्त हो जाना निश्चित था, किन्तु
क्रान्तिकारियों को मृत्यु का भय कभी रहा ही नहीं, वे ऐसा करने के लिए
जी-जान से जुट गए। भगतसिंह तथा दत्त को भी इसकी सूचना दे दी गई।
भगवतीचरण की मृत्यु :
इस योजना के लिए बम बनाए गए, अतः उनकी उपयोगिता देखने के
लिए भगवतीचरण ने उनका पूर्व परीक्षण करने का विचार किया। इस
परीक्षण के लिए 28 मई, 1930 के दिन वह सुखदेवराज तथा बच्चन, इन
दो क्रान्तिकारियों को साथ लेकर रावी के किनारे पहुँचे और रावी पार
कर जंगल में चले गए।
इधर अन्य क्रान्तिकारी बहावलपुर रोड वाले मकान में थे। योजना
को कार्यरूप देने में केवल दो दिन शेष रह गए थे, अतः यहाँ उपस्थित लोग
हथियारों की साफ-सफाई में लग गए। आजाद ने प्रत्येक को अलग-अलग
कार्य सौंपे थे, इसलिए सब अपना-अपना कार्य करने लगे। इसी बीच एक
तांगे में घायल सुखदेवराज आते दिखाई दिए। वह दर्द से कराह रहे थे, उनके
पैर में कपड़े की पट्टी बँधी थी, जो अत्यधिक रक्त बहने से लाल हो चुकी
थी। उन्हें ताँगे से उतारकर अन्दर ले जाया गया। तब उनसे ज्ञात हुआ
कि बम के परीक्षण के समय बम भगवतीचरण के हाथ में ही फट गया था।
जिससे उनका हाथ उड़ गया। उसी के कारण सुखदेवराज के पैर में भी
गम्भीर चोट लगी थी। भगवतीचरण की हालत अत्यन्त गम्भीर थी,
उसी ने सुखदेव को यहाँ भेजा था, ताकि अन्य सदस्यों को इसका समाचार
दिया जा सके। इस घटना का वर्णन करते हुए श्री वीरेन्द्र लिखते हैं—
"सुखदेवराज उन्हें छोड़कर जाना न चाहता था। परन्तु भगवतीचरण
ने उससे कहा, 'बचने की कोई आशा नहीं। इतना खून बह चुका है कि मैं
अब बच नहीं सकता। न ही तुम मुझे बहावलपुर रोड तक पहुँचा सकते
हो। मैं यह भी नहीं चाहता कि इस हालत में जाने से किसी को सन्देह हो
जाए और हमारे दूसरे साथियों के लिए कोई मुसीबत खड़ी हो जाए। इस-
लिए अब मुझे यहीं छोड़ दो और तुम जाओ और जाकर शेष साथियों को
सावधान कर दो। मेरी अब चिन्ता मत करना। जो कुछ होगा देखा
जाएगा।'"
102 चन्द्रशेखर आजाद
यशपाल अपने एक साथी को वहां पर बिठाकर शहर की ओर चले गए,
ताकि स्ट्रैचर या चारपाई का प्रबन्ध किया जा सके और यदि हो सके तो
किसी डाक्टर को भी लाया जाए, किन्तु उनके जाने के कुछ ही देर बाद
भगवतीचरण भी इस संसार से चल बसे।
देर रात गए जब यशपाल चारपाई, चादरें तथा दवा लेकर वहीं फिर
आए, तो भगवतीचरण की जगह केवल उनका शव पड़ा हुआ था। वह
अपने जिस साथी को वहाँ पर छोड़ गए थे, वह भी डरकर भाग गया था।
इससे यशपाल को बड़ी निराशा तथा भारी दुःख हुआ। शव को चादर में
लपेट दिया गया तथा उसे अकेले वहाँ छोड़कर साथियों से परामर्श लेने के
लिए यशपाल आवास पर लौट आए। यहाँ इस समाचार के ज्ञात होने पर
सभी शोक के सागर में डूब गए। प्रातःकाल आजाद, यशपाल तथा दो-
तीन दूसरे साथी वहाँ जाने को तैयार हो गए। भगवतीचरण की पत्नी दुर्गा
देवी भी जाना चाहती थीं, किन्तु साइकिल पर बैठाकर महिलाओं को ऐसे
स्थान पर ले जाना खतरे से खाली नहीं था। वह बेचारी अपने सुहाग के
लुट जाने पर इस मकान में रो भी नहीं सकती थीं। उनसे इस अवसर पर
चन्द्रशेखर आजाद ने कहा था—
"तुम हमारी माँ हो। हमारी बहिन हो। तुम्हारी इज्जत हमारे हाथ
में है और हमारी इज्जत तुम्हारे हाथ में है। मैं तुम्हारी भावनाओं को
समझ सकता हूँ, परन्तु तुमने और भगवती भाई ने तो अपनी भावनाएँ उसी
दिन पाँवों तले रौंद डाली थीं, जिस दिन आप दोनों इस पार्टी में शामिल
हुए। इसके यदि पहले इतनी कुर्बानी की है, तो कुछ और करो।'"
अतः दुर्गादेवी पति के अन्तिम दर्शन भी नहीं कर सकीं। आजाद और
यशपाल उस स्थान पर गए, जहाँ भगवतीचरण का शव पड़ा था और शव
को जमीन में दफना दिया गया, क्योंकि इसे श्मशान में ले जाना हर प्रकार
से कठिन था। एक तो जंगल में इस स्थान तक कोई वाहन नहीं आ सकता
था, दूसरे यदि इसे यों ही उठाकर ले जाते, तो पुलिस को पता लगने पर
सभी लोग भारी विपत्ति में पड़ सकते थे।
यह वर्णन श्री वीरेन्द्र की पुस्तक 'ये इंकलाबी दिन' के आधार पर है।
श्री मन्मथनाथ गुप्त ने भगवतीचरण की मृत्यु का वर्णन कुछ दूसरी तरह
से किया है। श्री गुप्त के अनुसार इस दुर्घटना में भगवतीचरण की अंतड़ियां
बाहर निकल आई थीं। उन्हीं के शब्दों में—
"भगवतीचरण की मृत्यु क्रान्तिकारी इतिहास की एक दर्दनाक घटना
है। इसके सम्बन्ध में कई तरह की बातें सुनी जाती हैं। जो कुछ मालूम हो
सका है, उसमें केवल इतना निर्विवाद है कि 28 मई, 1930 को साडे चार
बजे शाम को भगवतीचरण एक बम लेकर प्रयोग करने के लिए रावी के
किनारे पर गए। जहां बम एकाएक फट गया और भगवतीचरण बहुत सख्त
घायल हो गए। कहते हैं चोट से उनकी सारी अंतड़ियां बाहर निकल आई
थीं, किन्तु फिर भी अन्तिम समय तक उनको दल की धुन थी। यह तीन-
चार घण्टे तक जीवित रहे, किन्तु कुछ परिस्थितियां ऐसी आईं या पैदा की
गईं जिससे उनको डाक्टरी सहायता नहीं पहुँचाई जा सकी।"
निःसन्देह भगवतीचरण की मृत्यु क्रान्तिकारी दल तथा भगतसिंह की
मुक्ति की योजना के लिए एक भारी धक्का थी।
योजना की असफलता :
104 चन्द्रशेखर आजाद
महिला सुशीला ने जाने की इच्छा व्यक्त की। आजाद ने दोनों की बातें
सुनीं और दल का नेता होने के नाते उन्हें आदेश दिया—
"यह काम महिलाओं का नहीं है। तुम दोनों में से कोई भी नहीं
जाएँगी, जो कुछ तुम इस समय कर रही हो, यही क्या कम है। अब हम
जाएँगे और भाग्य की परीक्षा करेंगे।"
अतः पूर्व निश्चित समय 1 जून, 1930 को आजाद, यशपाल, वैशम्पा-
यन तथा दो-तीन अन्य युवा सदस्य अपने लक्ष्य पर चल पड़े और सेन्ट्रल
जेल के समीप पहुँच गए। सब पूरी तरह तैयार होकर योजना अनुसार
अपने-अपने स्थानों पर खड़े हो गए। भगतसिंह तथा दत्त को पहले ही
इसकी सूचना दे दी गई थी, किन्तु यह योजना सफल न हो सकी।
यह योजना असफल क्यों रही, इस विषय में प्रायः दो मत देखने को
मिलते हैं। पहले मत के अनुसार इस घटना से पूर्व इन दोनों कैदियों को
ले जानेवाली पुलिस की गाड़ी जेल के गेट से कुछ दूर सड़क पर खड़ी कर
दी जाती थी। जेल के फाटक से यहाँ तक कैदियों को पैदल चलकर जाना
पड़ता था, किन्तु इस दिन गाड़ी जेल के गेट के बिलकुल पास खड़ी की गई
और वहीं पर से कैदियों को लेकर चल दी। चन्द्रशेखर आजाद आदि
देखते रह गए।
दूसरा मत इससे भिन्न है। इस मत के अनुसार अन्तिम समय में
भगतसिंह ने जेल से भागने का मत ही बदल लिया था। श्री वीरेन्द्र ने
अपनी पुस्तक में इसी मत के अनुसार वर्णन किया। यहाँ श्री वीरेन्द्र का
वर्णन प्रस्तुत किया जा रहा है—
"इस योजना का भाग यह भी था कि जब भगतसिंह और दत्त बाहर
निकलेंगे, वैशम्पायन बाँसुरी बजाएगा, सो उत्तर में भगतसिंह अपना सिर
झुलाएगा। जिसके अर्थ होंगे कि वह भी तैयार है। इसके बाद कार्यवाही
शुरू हो जाएगी। किन्तु न जाने क्यों भगतसिंह ने संकेत नहीं दिया। जेल
से बाहर जाते ही वह और दत्त कैदियों वाली गाड़ी में बैठ गए और पुलिस
उन्हें वहाँ से ले गई। आजाद और उनके साथी यहाँ खड़े यह सब देखते
रह गए। उन्हें कुछ समझ में नहीं आया कि यह हुआ क्या है। वे निराश
होकर लौट आए।
चन्द्रशेखर आजाद
कुछ समय बाद भगतसिंह से पूछा गया कि उसने यह सब क्यों किया
तो उसने उत्तर दिया कि भगवतीचरण की मृत्यु के बाद जीवित रहने की
इच्छा न रही थी। वह यह भी नहीं चाहते थे कि उनकी पार्टी की अन्तिम
निशानी आजाद भी इस प्रयास में मारे जायें। आजाद को खत्म कराकर
भगतसिंह रिहाई हासिल करना नहीं चाहते थे। इसलिए जब वह जेल से
निकले तो उन्होंने देखा कि उनके साथी वहाँ खड़े हैं। फिर भी वह इस
कार्यवाही के लिए तैयार न हुए। न जाने इसमें कितने लोग मारे जाते।"
संशय के क्षण :
इस योजना की असफलता से आजाद को भारी दुःख हुआ। बहावल-
पुर रोड वाले अपने मकान में जाने पर वह किसी से कुछ नहीं बोले और
एक कमरे में चले गए। आजाद के सबसे अधिक विश्वासपात्र भगतसिंह थे,
[L13: इनके बाद भगवतीचरण वोहरा का नम्बर आता। भगवतीचरण पहले ही
दुनिया छोड़कर जा चुके थे तथा भगतसिंह के लिए भी फाँसी का फन्दा
तैयार ही था। इसी सब पर विचार करते हुए आजाद कई घण्टों तक
कमरे में बन्द रहे। बड़ी विचित्र स्थिति थी। एक ओर सबसे प्रिय साथी
जेल में बन्द था, उसे फाँसी पर लटकाने के लिए न्याय का नाटक चल
रहा था, इसके साथ ही दिवंगत साथी भगवती भाई की अन्तिम इच्छा
थी कि भगतसिंह को अवश्य मुक्त कराया जाए। दुर्भाग्य से सारी योजना
विफल हो गई थी। क्या हो; क्या न हो का प्रश्न सामने था। अन्ततः सारे
संशयों पर विजय पाकर आजाद ने भगतसिंह की मुक्ति के लिए एक बार
पुनः प्रयत्न करने का निर्णय लिया। उनके लिए परिस्थितियों के सामने
हारकर आत्म-समर्पण करना कायरता थी।
आजाद अटल निर्णय लेकर सो गए, किन्तु लगता था इस समय भाग्य
ही विपरीत हो गया था। रात को घर में रखे हुए बमों में से एक बम स्वतः
फट गया। इसके धमाके से कइयों की नींद खुल गई, सारे दरवाजे और खिड़-
कियाँ हिल गईं। आजाद ने सबको आदेश दिया कि जिसका कुछ, जो
सामान हाथ, उसे लेकर तुरन्त बाहर निकल जाए। पुलिस के पहुँचने से
पूर्व ही, जिससे परिस्थितियाँ संकटपूर्ण बनकर हो सकती थीं,
106 चन्द्रशेखर आजाद
दल की महिलाओं को इतनी जल्दी कहाँ भेजा जाए, यह भी एक विराट
समस्या थी। इस मकान के बगल में एक इन्जीनियर रहता था। कही वह
पुलिस को बम विस्फोट की सूचना न दे दे, इस विपत्ति को टालने के लिए
यशपाल उसके पास गए। उन्होंने इन्जीनियर को अपनी सारी कहानी बता
दी और उससे निवेदन किया कि वह कम-से-कम आधे घण्टे तक विस्फोट
की सूचना पुलिस को न दे। इस बीच सारे क्रान्तिकारी वहाँ से चले
जाएंगे, तभी पुलिस को इसकी सूचना दी जाए। क्रान्तिकारियों की भार-
नाओं का सम्मान करते हुए इन्जीनियर ने उनकी बात मान ली। अतः
सभी क्रान्तिकारी इस बीच वहाँ से सुरक्षित निकल गए।
सुखदेवराज घायल थे, किन्तु उन्हें किसी अस्पताल में भर्ती कराना
सम्भव नही था। इसका समाधान भी धन्वन्तरि ने निकाल लिया। दया-
नन्द आयुर्वेदिक कालेज लाहौर के प्रधानाचार्य डाक्टर आसामन्द राष्ट्रवादी
विचारों के व्यक्ति थे। धन्वन्तरि कभी उनके विद्यार्थी रह चुके थे। डा०
आसामन्द ने अपने घर पर रखकर सुखदेवराज की चिकित्सा का भार
अपने ऊपर ले लिया। उन्होंने सुखदेवराज के पैर का आपरेशन किया।
उनकी चिकित्सा से सुखदेवराज का पाँव शीघ्र ठीक हो गया। इसके बाद
उन्हें अमृतसर भेज दिया गया।
इस प्रकार अनवरत असफलताओं के बाद आजाद के सामने दल को
पुनः संगठित करने का प्रश्न सर्वप्रथम था। इसके लिए पैसों की आवश्य-
कता थी। पैसों का प्रबन्ध करने के लिए लाहौर से चले गए और दिल्ली
पहुंचे। पूर्ववर्णित गाडोदिया स्टोर डकैती उन्होंने इसी समय डाली थी।
यशपाल प्रकरण :
यद्यपि दल सदस्यो द्वारा विवाह करने का विरोध नहीं करता था,
फिर भी सक्रिय क्रान्तिकारियों से अपेक्षा की जाती थी कि वे अविवाहित
रहें। यदि कोई सदस्य विवाह करना चाहता था तो उसे दम से इसके लिए
अनुमति लेनी पड़ती थी। गाडोदिया स्टोर डकैती के बाद दल ने एक कार-
खाना दिल्ली में खोला था। दिखाने के लिए तो यह साबुन, तेल बनाने का
कारखाना था, किन्तु इसमें बम बनाने में प्रयुक्त होने के लिए विला-
चन्द्रशेखर आजाद 107
एसिड बनता था। इस कारखाने का संचालन श्री अज्ञेय करते थे। अज्ञेय
के अतिरिक्त यहाँ कैलाशपति, विमलप्रसाद जैन, उनकी पत्नी, यशपाल
और प्रकाशवती भी रहते थे। यशपाल और प्रकाशवती के सम्बन्ध अत्यन्त
अन्तरंग हो गए थे। वे दोनों साथ-साथ रहते हुए देखे जाने लगे। यह दल
के नियमों के विरुद्ध था। अतः दल ने निर्णय लिया कि यशपाल को गोली
मार दी जाए। यह काम वीरभद्र तिवारी को सौंपा गया। यशपाल को
गोली मारने के बजाय तिवारी ने यह बात यशपाल को बता दी। यशपाल
हाथ में रिवाल्वर लेकर कारखाने में गए और प्रकाशवती को लेकर लाहौर
चले गए।
इसके बाद यशपाल ने प्रकाशवती से विवाह कर लिया। बाद में वह
आजाद से मिले। यद्यपि आजाद एवं यशपाल का मनमुटाव दूर हो गया,
किन्तु दलीय अनुशासन की अवहेलना करने के कारण वीरभद्र तिवारी
को दल से निकाल दिया गया तथा यह कारखाना भी बन्द कर दिया
गया।
यशपाल के विरुद्ध यह कठोर निर्णय लिए जाने का कारण दलीय अनु-
शासन के साथ ही यह भी था कि यशपाल प्रकाशवती को भगाकर लाए
थे। उसके माँ-बाप द्वारा की गई कार्यवाही दल के लिए घातक सिद्ध हो
सकती थी। इस प्रकार आसक्ति में फँसकर कई सदस्य दल को हानि
पहुँचा चुके थे।
अष्टम अध्याय
वीरगति'
इधर भगतसिंह, राजगुरू तथा सुखदेव को फाँसी की सजा सुना दी
गई थी, उधर चन्द्रशेखर आजाद फरार अपराधी घोषित थे। इन फरारी
के दिनो में ये पुलिस की आँखों मे धूल झोंकते हुए एक स्थान से दूसरे
स्थान तक घूम रहे थे। पुलिस तो उनके पीछे पड़ी ही थी ; उसके अनेकों
मुखबिर भी इनाम के लालच में घूम रहे थे। जरा-सा सन्देह होने पर भी
पुलिस तलाशी लेने से नहीं चूकती थी, किन्तु आजाद के सामने केवल
एक ही प्रश्न था कि ऐसी परिस्थितियों मे दल को पुनः कैसे सुदृढ़ बनाया
जाए। सम्भवतः वह अपने इस अभीष्ट की सिद्धि के लिए दक्षिण भारत
जाने का विचार कर रहे थे।
अपने इसी विचार को कार्यरूप मे परिणत करने के लिए वह
इलाहाबाद पहुँचे। अन्त मे 27 फरवरी, 1931 का वह अशुभ दिन भी आ
गया। आजाद अपने एक साथी सुखदेवराज के साथ अल्फ्रेड पार्क में बैठे
हुए थे, सुबह के दस बजे का समय था। सम्भवतः किसी देशद्रोही ने
उनके अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना पुलिस को दे दी थी। इतने मे दो
पुलिस अधिकारी सूचना की सत्यता को जानने के लिए यहाँ आए, जिनके
नाम दिनेश्वर सिह और डालचन्द थे। डालचन्द चन्द्रशेखर आजाद को
पहचानता था। उसने दूर से ही उन्हें देखा और पहचान लिया। इसके
बाद दोनों लौट गए तथा तुरन्त यह सूचना गुप्तचर पुलिस अधीक्षक नाट
बावर को दे दी। नाट बावर तुरन्त अपनी गाड़ी से अल्फ्रेड पार्क पहुँच
गया तथा उसने अपनी गाड़ी आजाद से केवल 10 गज की दूरी पर खड़ी
कर दी। वह गाड़ी से उतरा और आजाद की ओर बढ़ा। वह आजाद
जीवित पकड़ना चाहता था, अतः उसने उसकी ओर
चन्द्रशेखर आजाद 109
दौड़ते हुए उन्हें आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी। भला आजाद ऐसा
कैसे कर सकते थे। वह उठ खड़े हुए। उन्होंने नाट की चेतावनी का उत्तर
अपनी रिवाल्वर हाथ में लेकर दिया। नाट बावर ने गोली चला दी।
इस पर आजाद ने भी गोली चलाई। गोरे की गोली आजाद की टाँग में
लगी तथा आजाद की गोरे के कन्धे में। फिर दोनों ओर से गोलियां चलने
लगीं। सम्भवतः अन्य पुलिस भी आ गई थी। नाट बावर की कलाई घायल
हो गई। गोलियां लगातार चल रही थीं, किन्तु, कलाई घायल हो जाने
पर नाट बावर एक पेड़ की ओट में हो गया। आजाद भी घिसटते हुए
एक पेड़ की ओट में हो गए। उनके पास भी पर्याप्त गोलियाँ थी। उन्होंने
अपने साथी सुखदेवराज को गोलियाँ चलने पर वहाँ से भगा दिया था।
यद्यपि वह जाने को बिल्कुल भी तैयार नहीं थे, किन्तु आजाद ने उनकी
एक भी नहीं सुनी और बलपूर्वक उन्हें वहाँ से भगा दिया था। अतः वह
पुलिस वालों पर अकेले गोलियाँ बरसाते रहे। नाट बावर के ओट में हो
जाने पर उसकी जगह पुलिस अधिकारी विशेश्वर सिंह ने ले ली थी।
आजाद ने उस पर निशाना साधा, इस निशाने से उसका जबड़ा टूट गया।
विशेश्वर सिंह को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उसका जबड़ा
फिर कभी ठीक न हो सका और सेवाकाल समाप्त होने से पूर्व ही उसे
कार्य मुक्त कर दिया गया।