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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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चन्द्रशेखर आजाद 97
निष्क्रिय होकर नहीं बैठे। इसके बाद भी वे कुछ-न-कुछ करते रहते थे।
वाइसराय की गाड़ी को बम से उड़ाने का प्रयास भी इसकी पुष्टि करता
है। इसके साथ ही वह पण्डित मोतीलाल नेहरू तथा उनके सुपुत्र
पण्डित जवाहरलाल नेहरू से भी मिले थे। यद्यपि कांग्रेस के तथा उनके
सिद्धान्तो में अन्तर था, फिर भी दोनों के लक्ष्य समान थे। नेहरू परिवार
से उनके सम्बन्ध सुमधुर थे। यह परिवार यद्यपि खुले रूप में क्रान्ति-
कारियों का समर्थन नहीं करता था, तथापि उसे इन वीरों के साथ सहानु-
भूति अवश्य थी। कहा जाता है, अपने इन्हीं फरारी के दिनों में 1930 में
वह आनन्द भवन, इलाहाबाद गए। वहाँ उन्होंने पण्डित मोतीलाल नेहरू
से भेंट की। पण्डित नेहरू ने उन्हें अहिंसा का मार्ग त्यागने का परामर्श
दिया था, जिसे आजाद ने विनम्र शब्दों में अस्वीकार कर दिया था।
उन्होंने कहा कि उन्हें अहिंसा पर विश्वास नहीं था, वह नहीं समझते थे
कि कांग्रेस की इस अहिंसा की नीति से अंग्रेज भारत को छोड़कर चले
जाएँगे। अंग्रेजों को भगाने के लिए वह हिंसा को अनिवार्य मानते थे।
इसके बाद वह पण्डित जवाहरलाल नेहरू से भी मिले थे। उनकी
गिरफ्तारी पर दस हजार रुपयों का इनाम था और वह इस प्रकार घूम
रहे थे, इससे जवाहरलाल नेहरू को बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने इस
विषय में आजाद से सचेत रहने को कहा, किन्तु, आजाद को इस सब की
परवाह कहाँ थी! उनका तो बस इतना ही कहना था कि जीते जी पुलिस
उन्हें नहीं पकड़ पाएगी। इन्हीं दिनों गांधी-इरविन समझौते के लिए बातें
चल रही थीं। इस सम्बन्ध में आजाद ने नेहरूजी से पूछा था कि इस
समझौते में प्राणों को हथेली पर रखकर घूमने वाले क्रान्तिकारियों के
लिए क्या किया जाएगा? पण्डित नेहरू शायद इसका कोई उत्तर नहीं
दे पाए थे, क्योंकि वे जानते थे कि इस समझौते के हो जाने पर भी इन
वीरों की रक्षा नहीं हो सकेगी। इस समझौते में गांधीजी इरविन से बातें
करेंगे और उन्हें अपने सिद्धान्त सबसे प्रिय थे, किन्तु नेहरूजी की हार्दिक
इच्छा थी कि इन क्रान्तिकारियों की रक्षा होनी चाहिए। भगतसिंह आदि
को फाँसी दे दिए जाने पर उन्हें जो दुःख हुआ, उसे व्यक्त करते हुए उन्होंने
कहा था—