अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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करने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहे हैं। ये भयंकर विषम-
ताएँ और विकास के अवसरों की कृत्रिम समानताएं समाज को अराजकता
की ओर ले जा रही हैं।
यदि इसकी उपेक्षा कर दी जाती है तथा वर्तमान शासन-व्यवस्था
नवोदित प्राकृतिक शक्तियों के मार्ग को रोक देती है और यह क्रम निरन्तर
चलता रहा, तो एक भयंकर संघर्ष उत्पन्न होना निश्चित है, जिसके फल-
स्वरूप समस्त अवरोधक तत्त्वों को उठाकर फेंक दिया जाएगा तथा सर्व-
हारा वर्ग का आधिपत्य होगा, जिससे क्रान्ति का लक्ष्य प्राप्त किया जा
सके। क्रान्ति मानव-जाति का जन्मसिद्ध अधिकार है। स्वतन्त्रता सभी
मनुष्यों का एक ऐसा जन्मसिद्ध अधिकार है, जिसे किसी भी स्थिति में
छीना नहीं जा सकता। श्रमिक वर्ग समाज का वास्तविक आधार है। प्र-
प्रभुता की स्थापना श्रमिकों का अन्तिम लक्ष्य है। इन आदर्शों तथा आग्रह
के लिए हम उन सब कष्टों का सामना करेंगे, जो हमें न्यायालय द्वारा दिये
जाएँगे। इस वेदी पर हम अपना यौवन धूपबत्ती की तरह जलाने के लिए
सन्नद्ध हुए हैं। इस महान लक्ष्य के लिए कोई भी बलिदान बड़ा नहीं माना
जा सकता। हम क्रान्ति की उन्नति की सन्तोष के साथ प्रतीक्षा करेंगे।'"'
इन्कलाब-जिन्दाबाद।"
भगतसिंह के इस भाषण से स्वाभाविक रूप में देश का ध्यान उनके
तथा दल के प्रति आकृष्ट हुआ। इस मुकदमे में उन्होंने अपने बचाव का
कोई प्रयत्न नहीं किया। अदालत की कार्यवाही 10 जून, 1929 को पूरी
हो गई और इसके दो दिन बाद 12 जून को निर्णय सुना दिया गया, जिसमें
भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त दोनों को आजीवन कारावास का दण्ड मिला।
इसके बाद भगतसिंह पंजाब की मियानवाली जेल भेज दिये गये तथा बटुकेश्वर
दत्त लाहौर सेन्ट्रल जेल भेज दिये गए।