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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 148 में से

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चन्द्रशेखर आज़ाद
"मैं भगतसिंह तथा उनके साथियों के अन्तिम दिनों में मौन धारण
किए रहा, क्योंकि मैं जानता था कि कहीं मेरे बोलने से फाँसी की सजा
रद्द होने की सम्भावना जाती न रहे। मैं चुप रहा, गोकि इच्छा होती थी मैं
उबल पडूँ। हम सब मिलकर उन्हें बचा न सके, गोकि हमारे इतने प्यारे थे,
और उनका महान त्याग तथा साहस भारत के नौजवानों के लिए एक
प्रेरणा की चीज थी और है। हमारी इस असहायता पर देश में दुःख
प्रकट किया जाएगा, किन्तु साथ ही हमारे देश की इस स्वर्गीय आत्मा पर
गर्व है और जब इंग्लैण्ड हम से समझौते की बात करे, तो हम भगतसिंह
की लाश को भूल न जाएं।"
क्रान्तिकारियों से नेहरूजी की सहानुभूति के कारण लाहौर काण्ड के
एक मुखबिर कैलाशपति ने उनके नाम का भी उल्लेख किया था इस सम्बन्ध
में मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं—
"उसकी स्मरण-शक्ति अद्भुत थी। बयान में उसने लाहौर से लेकर
कलकत्ते तक बीसियों मनुष्यों का नाम लिया। जिस सरगर्मी से वह क्रान्ति-
कारी बना था, उसी सरगर्मी से मुखबिर बना न तब कोई उसको फिक्र थी
न अब।... उसने अपने बयान में पण्डित जवाहरलाल तक को तान दिया
था, फिर कौन बचता।"
स्पष्ट है कि नेहरूजी को यद्यपि क्रान्तिकारियों से पूरी सहानुभूति
थी, फिर भी वह कुछ कर पाने में असमर्थ थे।
आज़ाद द्वारा भगतसिंह की मुक्ति का प्रयास :
1930 में काँग्रेस के आन्दोलन भी जोरों पर थे, अतः क्रान्तिकारी दल
ने भी अपनी कार्यवाहियाँ तेज करने का निर्णय लिया। इस समय दल के
भगतसिंह आदि अनेक सदस्य जेलों में थे, किन्तु आज़ाद चुप नहीं बैठे थे,
इस समय उनके मुख्य सहयोगी भगवतीचरण थे। उन्हें विश्वास हो गया था
कि भगतसिंह को सरकार अवश्य फाँसी पर लटका देगी। इस समय आज़ाद
तथा भगवतीचरण ने भगतसिंह को जेल से मुक्त कराने की योजना बनाने
की सोची। उन्होंने योजना के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया।
---- फाँसी देने पर तुली हुई थी। यदि ऐसे समय में उन्हें
सरकार भग