अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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बदलवाने के लिए आवाज उठाई, जगह-जगह से लोगों ने हस्ताक्षर अभियान
चलाकर वाइसराय के पास अनुस्मारक भेजे, किन्तु, इनका परिणाम
शून्य ही रहा। और 23 मार्च, 1931 को इन तीनों वीरों को लाहौर में
फाँसी दे दी गई।
फाँसी दे दिए जाने पर भी देश के आक्रोश में कमी नहीं आई। देश भर
के समाचार-पत्रों ने सरकार के इस कृत्य की भर्त्सना की। महात्मा गांधी
उस समय भारत की राजनीति पर छाए हुए थे। फरवरी, 1931 में वाइसराय
लार्ड इरविन के साथ उनका एक समझौता हुआ, जिसे गांधी-इरविन
समझौता कहा जाता है। भारत की जनता बड़ी आशाओं के साथ इस
समझौते की रिपोर्ट की प्रतीक्षा कर रही थी। उसे पूरा विश्वास था कि
गांधीजी इन वीरों को फाँसी पर चढ़ने से बचा लेंगे, किन्तु समझौते की
रिपोर्ट प्रकाशित होने पर उसकी सारी आशाओं पर पानी फिर गया;
समझौते में इस मामले का कोई उल्लेख ही नहीं था। हाँ, काँग्रेसी सत्या-
ग्रही, जो जेलों में थे, सबको छोड़ दिए जाने की घोषणा की गई थी।
गांधीजी के इस कार्य की खूब आलोचना हुई। जगह-जगह पत्रकारों ने
उनसे इस विषय में प्रश्न पूछे। इस फाँसी के कुछ ही दिन बाद कराँची
कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए वहाँ जाने पर उन्हें काले झण्डे
दिखाए गए।
इस फाँसी के बाद पंजाब में जगह-जगह सभाएँ हुईं। लोगों ने अपने
खून से लिखकर इसका बदला लेने की शपथ ली। किसानों ने कर देना
बन्द कर दिया। भगतसिंह उनके लिए आराध्यदेव के समान बन गए थे।
उनके चित्र धड़ाधड़ बिकने लगे। देश भर में इन वीरों की वीरतापूर्ण
जीवनी की पुस्तकें प्रकाशित होने लगीं। सरकार इन्हें अपने लिए मौत का
साया समझती थी। परिणामस्वरूप इन चित्रों एवं पुस्तकों पर प्रतिबन्ध
लगा दिया गया।
इन वीरों के शहीद होने पर भारतीय क्रान्तिकारियों के इतिहास के
एक अध्याय की इतिश्री हो गई।
इस बीच आजाद की भूमिका :
भगतसिंह आदि के गिरफ्तार हो जाने पर भी चन्द्रशेखर आजाद