अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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हो गए हैं, उनमें करवट बदलने की भी ताकत नहीं है। वह बहुत धीरे-धीरे
बोलते हैं। वास्तव में देखा जाए, तो वह मौत की ओर बढ़ रहे हैं। मुझे
इन बहादुर नौजवानों के कष्ट को देखकर बहुत दुःख हुआ। मालूम होता
है, ये अपने प्राणों की बाजी लगाकर इस लड़ाई में शामिल हुए हैं। ये
चाहते हैं कि राजनीतिक बंदियों के साथ राजनीतिक कैदियों का जैसा
व्यवहार हो। मुझे पूरा विश्वास है कि यह तपस्या सफलता से सुशोभित
होकर ही रहेगी।'
इस अनशन की सहानुभूति में अनेक अन्य जेलों में भी अनशन किया
गया। इस अनशन के कारण मुकदमे की तारीखें भी बदलती गईं। बाद में
पंजाब जेल कमेटी ने सुधार की मांगों पर विचार करने के लिए एक उप-
समिति बनाई। अतः 2 सितम्बर, 1929 को जतीनदास को छोड़कर अन्य
सभी ने अनशन तोड़ दिया। इस उपसमिति ने जतीनदास को रिहा कर देने
की सिफारिश की थी, किन्तु सरकार ने बिना जमानत रिहा करना स्वीकार
नहीं किया। और जमानत-पत्र पर जतीनदास ने हस्ताक्षर करने से मना
कर दिया। जतीनदास की स्थिति को देखकर भगतसिंह आदि ने दो दिन
बाद पुनः अनशन प्रारम्भ कर दिया। अन्ततः 13 सितम्बर, 1929 को
एक बजकर पाँच मिनट पर जतीनदास मृत्यु को प्राप्त हो गए। उनके शव
को लाहौर से कलकत्ता भेजने के लिए नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने 600 रु०
भिजवाए थे, अतः उनका शव कलकत्ता भेज दिया गया, जहाँ उनके अन्तिम
संस्कार में लाखों लोगों ने एकत्र होकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।