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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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पृष्ठ 101

104 चन्द्रशेखर आजाद
महिला सुशीला ने जाने की इच्छा व्यक्त की। आजाद ने दोनों की बातें
सुनीं और दल का नेता होने के नाते उन्हें आदेश दिया—
"यह काम महिलाओं का नहीं है। तुम दोनों में से कोई भी नहीं
जाएँगी, जो कुछ तुम इस समय कर रही हो, यही क्या कम है। अब हम
जाएँगे और भाग्य की परीक्षा करेंगे।"
अतः पूर्व निश्चित समय 1 जून, 1930 को आजाद, यशपाल, वैशम्पा-
यन तथा दो-तीन अन्य युवा सदस्य अपने लक्ष्य पर चल पड़े और सेन्ट्रल
जेल के समीप पहुँच गए। सब पूरी तरह तैयार होकर योजना अनुसार
अपने-अपने स्थानों पर खड़े हो गए। भगतसिंह तथा दत्त को पहले ही
इसकी सूचना दे दी गई थी, किन्तु यह योजना सफल न हो सकी।
यह योजना असफल क्यों रही, इस विषय में प्रायः दो मत देखने को
मिलते हैं। पहले मत के अनुसार इस घटना से पूर्व इन दोनों कैदियों को
ले जानेवाली पुलिस की गाड़ी जेल के गेट से कुछ दूर सड़क पर खड़ी कर
दी जाती थी। जेल के फाटक से यहाँ तक कैदियों को पैदल चलकर जाना
पड़ता था, किन्तु इस दिन गाड़ी जेल के गेट के बिलकुल पास खड़ी की गई
और वहीं पर से कैदियों को लेकर चल दी। चन्द्रशेखर आजाद आदि
देखते रह गए।
दूसरा मत इससे भिन्न है। इस मत के अनुसार अन्तिम समय में
भगतसिंह ने जेल से भागने का मत ही बदल लिया था। श्री वीरेन्द्र ने
अपनी पुस्तक में इसी मत के अनुसार वर्णन किया। यहाँ श्री वीरेन्द्र का
वर्णन प्रस्तुत किया जा रहा है—
"इस योजना का भाग यह भी था कि जब भगतसिंह और दत्त बाहर
निकलेंगे, वैशम्पायन बाँसुरी बजाएगा, सो उत्तर में भगतसिंह अपना सिर
झुलाएगा। जिसके अर्थ होंगे कि वह भी तैयार है। इसके बाद कार्यवाही
शुरू हो जाएगी। किन्तु न जाने क्यों भगतसिंह ने संकेत नहीं दिया। जेल
से बाहर जाते ही वह और दत्त कैदियों वाली गाड़ी में बैठ गए और पुलिस
उन्हें वहाँ से ले गई। आजाद और उनके साथी यहाँ खड़े यह सब देखते
रह गए। उन्हें कुछ समझ में नहीं आया कि यह हुआ क्या है। वे निराश
होकर लौट आए।