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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

94 चन्द्रशेखर आजाद
इन्हें विश्वास था कि यह सर्व कानूनी कार्यवाही केवल एक दिखावा थी।
अतः ये भी अदालत की हर कार्यवाही पर अड़ंगा लगाते रहते थे। एक
बार इसी प्रकार की एक घटना में न्यायाधिकरण के अध्यक्ष जस्टिस कोल्ड-
स्ट्रीम ने पुलिस को आदेश दिया कि इन अभियुक्तों को लाठियों तथा जूतों
से पीटा जाए। पुलिस ने ऐसा ही किया। अतः अभियुक्तों ने दूसरे दिन से
अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया और जस्टिस कोल्डस्ट्रीम
को बदलने की मांग की। इस दिन पुलिस द्वारा अभियुक्तों के साथ जो
दुर्व्यवहार किया गया, इस कार्यवाही की न्यायाधिकरण के भारतीय
सदस्य जस्टिस आगा हैदर ने भी आलोचना की थी, अतः कोल्डस्ट्रीम के
साथ ही आगा हैदर को भी बदलकर नया न्यायाधिकरण बनाया गया,
जिसमें जस्टिस जी० सी० हिल्टन, जस्टिस अब्दुल कादिर तथा जस्टिस
जे० के० टॅप थे।
अभियुक्तों ने फिर भी अदालत का बहिष्कार जारी रखा। भगतसिंह
का कहना था कि जस्टिस कोल्डस्ट्रीम को अपने व्यवहार के लिए माफी
मांगनी चाहिए। सरकार ने जस्टिस कोल्डस्ट्रीम को लम्बी छुट्टी पर भेज
दिया था और सरकार इस माँग को स्वीकार भी कैसे कर सकती थी।
फैसला :
न्यायाधिकरण में अभियुक्तों की अनुपस्थिति में एकतरफा कार्यवाही
चली। इसके बाद 26 अगस्त, 1930 को अदालत ने अपना काम पूरा कर
लिया, तब अभियुक्तों के पास सन्देश भेजा गया कि वे अपने बचाव के
लिए स्वयं कुछ कहना चाहें या वकील रखना चाहें अथवा कोई गवाह
प्रस्तुत करना चाहें तो करें। अभियुक्त इस नाटक का अर्थ समझते थे,
क्योंकि समस्त कार्यवाही हो जाने के बाद अब केवल निर्णय ही दिया जाने
वाला था, अतः उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया।
7 अक्टूबर 1930 को इस मुकदमे का फैसला सुना दिया गया।
अभियुक्तों ने अदालत का बहिष्कार कर रखा था, अतः ट्रिब्यूनल के एक
विशेष सन्देशवाहक ने उन्हें यह फैसला जेल में ही जाकर सुनाया। फैसले
के अनुसार अभियुक्तों को निम्न दण्ड दिये गए थे-