अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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लाहौर उच्च न्यायालय में इस अपील की पेशी जस्टिस फोर्ड तथा
जस्टिस एडीसन के सामने हुई। यहाँ भी भगतसिंह ने अपने उद्देश्यों के
विषय में बयान दिया। इस बयान में उन्होंने यह सिद्ध करना चाहा कि वे
कोई अपराधी नहीं हैं, वरन् मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करनेवाले
एक योद्धा हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि किसी भी अप-
राधी को दण्ड उसके उद्देश्य को ध्यान में रखकर मिलना चाहिए—
" जब तक अभियुक्त के मनोभाव का पता न लग जाए, उसके
वास्तविक उद्देश्य का पता नहीं चल सकता। यदि उद्देश्य को पूरी तरह
भुला दिया जाए, तो किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हो सकता,
क्योंकि उद्देश्य की उपेक्षा करने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति साधारण
हत्यारे नज़र आएँगे। शासकीय कर ग्रहण करने वाले अधिकतर चोर-
जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी हत्या का अभियोग लगेगा।
इस तरह तो समाज-व्यवस्था और सभ्यता, खून-खराबा, चोरी और जाल-
साज़ी बनकर रह जाएगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए तो सरकार
को क्या अधिकार है कि समाज के व्यक्तियों से न्याय की उपेक्षा करे!
उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो हर धर्म-प्रचार झूठ का प्रचार दिखाई देगा
और प्रत्येक पैगम्बर पर अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों अनजान और
भोले-भाले लोगों को गुमराह किया। यदि उद्देश्य को भुला दिया जाए, तो
हजरत ईसा मसीह गड़बड़ करने वाले, शान्ति भंग करने वाले और विद्रोह
का प्रचार करने वाले दिखाई देंगे और कानून के शब्दों में खतरनाक
व्यक्तित्व समझे जाएँगे, किन्तु हम उनकी पूजा करते हैं; हमारे हृदयों में
उनके लिए असीम आदर है।"
लाहौर उच्च न्यायालय ने इस अपील को खारिज कर दिया तथा
निचली अदालत की सजा को कायम ठहराया। जेलों में राजनैतिक कैदियों
के लिए सुविधाओं को लेकर भगतसिंह ने 15 जून, 1929 से आमरण अन-
शन प्रारम्भ कर दिया। यह समाचार मिलने पर बटुकेश्वरदत्त ने भी
लाहौर सेन्ट्रल जेल में उसी दिन से उनके समर्थन में भूख हड़ताल शुरू कर
दी। भगतसिंह मियाँवाली जेल में थे। अब इन पर साण्डर्स हत्या-
कांड का मुकदमा भी चलने वाला था। इस हत्याकाण्ड में अन्य अभियुक्त