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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 148 में से

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पृष्ठ 102

चन्द्रशेखर आजाद
कुछ समय बाद भगतसिंह से पूछा गया कि उसने यह सब क्यों किया
तो उसने उत्तर दिया कि भगवतीचरण की मृत्यु के बाद जीवित रहने की
इच्छा न रही थी। वह यह भी नहीं चाहते थे कि उनकी पार्टी की अन्तिम
निशानी आजाद भी इस प्रयास में मारे जायें। आजाद को खत्म कराकर
भगतसिंह रिहाई हासिल करना नहीं चाहते थे। इसलिए जब वह जेल से
निकले तो उन्होंने देखा कि उनके साथी वहाँ खड़े हैं। फिर भी वह इस
कार्यवाही के लिए तैयार न हुए। न जाने इसमें कितने लोग मारे जाते।"
संशय के क्षण :
इस योजना की असफलता से आजाद को भारी दुःख हुआ। बहावल-
पुर रोड वाले अपने मकान में जाने पर वह किसी से कुछ नहीं बोले और
एक कमरे में चले गए। आजाद के सबसे अधिक विश्वासपात्र भगतसिंह थे,
[L13: इनके बाद भगवतीचरण वोहरा का नम्बर आता। भगवतीचरण पहले ही
दुनिया छोड़कर जा चुके थे तथा भगतसिंह के लिए भी फाँसी का फन्दा
तैयार ही था। इसी सब पर विचार करते हुए आजाद कई घण्टों तक
कमरे में बन्द रहे। बड़ी विचित्र स्थिति थी। एक ओर सबसे प्रिय साथी
जेल में बन्द था, उसे फाँसी पर लटकाने के लिए न्याय का नाटक चल
रहा था, इसके साथ ही दिवंगत साथी भगवती भाई की अन्तिम इच्छा
थी कि भगतसिंह को अवश्य मुक्त कराया जाए। दुर्भाग्य से सारी योजना
विफल हो गई थी। क्या हो; क्या न हो का प्रश्न सामने था। अन्ततः सारे
संशयों पर विजय पाकर आजाद ने भगतसिंह की मुक्ति के लिए एक बार
पुनः प्रयत्न करने का निर्णय लिया। उनके लिए परिस्थितियों के सामने
हारकर आत्म-समर्पण करना कायरता थी।
आजाद अटल निर्णय लेकर सो गए, किन्तु लगता था इस समय भाग्य
ही विपरीत हो गया था। रात को घर में रखे हुए बमों में से एक बम स्वतः
फट गया। इसके धमाके से कइयों की नींद खुल गई, सारे दरवाजे और खिड़-
कियाँ हिल गईं। आजाद ने सबको आदेश दिया कि जिसका कुछ, जो
सामान हाथ, उसे लेकर तुरन्त बाहर निकल जाए। पुलिस के पहुँचने से
पूर्व ही, जिससे परिस्थितियाँ संकटपूर्ण बनकर हो सकती थीं,