सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

चन्द्रशेखर आजाद 49
कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक अवश्य रोज दस हजार
रुपये की आमदनी होती होगी।"
स्पष्ट है कि यह योजना पण्डित रामप्रसाद 'बिस्मिल' के मस्तिष्क की
उपज थी। अतः इसके लिए 9 अगस्त, 1925 का दिन निश्चित किया गया।
इसके लिए दल के दस युवकों का चुनाव किया गया—पण्डित रामप्रसाद
'बिस्मिल', अशफाकउल्ला खां, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद,
मन्मथनाथ गुप्त, बनवारीलाल, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मुरारीलाल, केशव
चक्रवर्ती तथा मुकुन्दीलाल।
8 डाउन पैसेंजर गाड़ी सहारनपुर से चलती थी तथा इसमें सभी
स्टेशनों से राजस्व इकट्ठा होकर लखनऊ पहुँचता था। अतः निश्चित
समय पर ये वीर अपने अभियान पर चल पड़े। इस विषय में मन्मथनाथ
गुप्त लिखते हैं—"हम लोग 9 तारीख को संध्या समय शाहजहाँपुर से
हथियार, छेनी, घन, हथोड़े आदि से लैस होकर गाड़ी पर सवार हो गए।
इस गाड़ी में रेल के खजाने के अतिरिक्त कोई और खजाना भी जा रहा
था जिसके साथ बन्दूकों का पहरा था। इसके अतिरिक्त गाड़ी में कई
और बन्दूकें थीं। कुछ पल्टनियां गोरे भी हथियार सहित मौजूद थे। जिसमें
शायद एक मेजर भी ऊँचे क्लास में था। हमारे स्काउट ने खबर दी, तब
हम असमंजस में पड़ गए। श्री अशफाक ने शायद अपना निषेध फिर से
लोगों के मस्तिष्क में प्रविष्ट कराने की चेष्टा की, किन्तु हम लोग तुल चुके
थे। हम इतने अग्रसर हो चुके थे कि हमारा लौटना कठिन था और हम
लौटना चाहते भी नहीं थे। एक महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि यों तो अशफाक
मना कर रहे थे, किन्तु जब उन्होंने देखा कि उनकी एक न चली और हम
लोग काम करने पर तुले हैं, तो उन्होंने कमर कस ली। उनकी सुन्दर बड़ी-
बड़ी आँखें तेज से दीप्त हो उठीं और अपना पार्ट अदा करने के लिए
अत्यन्त साहस तथा हर्षपूर्वक प्रस्तुत हो गए।"
श्री अशफाकउल्ला, राजेन्द्र लाहिड़ी तथा शचीन्द्रनाथ बख्शी द्वितीय
श्रेणी के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे, अन्य लोग तृतीय श्रेणी में बैठे थे। कुछ
सदस्यों को द्वितीय श्रेणी के डिब्बों में एक विशेष उद्देश्य से बैठाया गया
था। गाड़ी को काकोरी में जंजीर खींचकर रोकना था, किन्तु तृतीय श्रेणी

30 स्वदेश
के डिब्बों की जंजीरें प्रायः खराब रहती थीं।
इस दल के पास चार बड़े माउजर पिस्तौल, प्रत्येक के लिए
कुछ अधिक कारतूस तथा अन्य छोटे-मोटे हथियार थे। काकोरी उस
जिले में एक छोटा-सा गाँव है। जब यह जगह थोड़ी ही दूर रह गई
तो जंजीर खींच कर उसे रोक दिया गया। गाड़ी के रुकने पर यात्री उतर
कर गार्ड के डिब्बे के पास जाने लगे, कुछ खिड़कियों से सिर बाहर निकाल-
ने लगे और फिर गार्ड भी नीचे उतर आया और उस डिब्बे की ओर
गया, जहाँ से जंजीर खींची गई थी। क्रान्तिकारी तुरन्त डिब्बों से बा-
हर आए। उन्होंने यात्रियों को डिब्बों में चढ़ जाने का आदेश दिया, कि
गार्ड को जमीन पर लेट जाने को कहा गया, ताकि उसके बिना गाड़ी
नहीं सके। दो-दो व्यक्ति पटरी के दोनों ओर कुछ दूरी पर खड़े हो गए,
उनके हाथों में माउजर पिस्तौलें थीं, जो एक-एक हजार गज तक मार कर
सकती थीं। उन्हें रुक-रुककर आकाश की ओर हवाई फायर करने को कहा
गया था, किन्तु एक युवक ने मूर्खता से सामने की ओर गोली चला दी।
यह गोली एक यात्री का काम तमाम कर गई। वह व्यक्ति सम्भवतः
महिला बोगी में बैठी हुई अपनी पत्नी को सान्त्वना देने जा रहा था।
दल के दोय सदस्य गार्ड के डिब्बे में चढ़ गए। लोहे का सन्दूक बाहर
उतार लिया गया। सन्दूक तोड़ डाला गया, उसमें निकले पैसों को चादरों
से गठरी बना ली गई। इसी समय लखनऊ की ओर से कोई दूसरी
या एक्सप्रेस गाड़ी भी आ रही थी। इससे क्रान्तिकारियों को कुछ शंका
हुई कि वह कहीं रुक न जाए और उसमें कुछ सशस्त्र लोग न हों। इस
घटना का विवरण श्री मन्मथनाथ गुप्त ने इस प्रकार किया है—
"....थैले निकालकर चादर में बाँध लिये गए। इसी समय लखनऊ
की ओर से कोई मेल या एक्सप्रेस आ रहा था। वह गाड़ी बड़ी जोर से
गुजरती हुई चली आ रही थी। हमारे दिल धड़क रहे थे। हम सोचते थे
कि कहीं यह गाड़ी खड़ी हो गई और इसमें कुछ लोग हथियारबन्द निकल
आए, तो हममें से दो-चार अवश्य ढेर हो जाएँगे। खैर गाड़ी किसी तरह
निकल गई। जब गाड़ी हमारे निकट से जा रही थी, तो हमने बन्दूकें जरा
... जब गाड़ी चली गई, तो हम लोगों ने अपना कार्य प्रारम्भ

चन्द्रशेखर आज़ाद
कर दिया। हम लोगों ने बहुत शीघ्र शायद दस मिनट से भी कम समय में
यह सब काम समाप्त कर दिया और थैलों को लेकर झाड़ियों की ओर
चले गए।"
इस लूट के बाद क्रान्तिकारी लखनऊ की ओर चले गए। रास्ते में रुपये
निकालकर चमड़े के थैलों को बरसात के पानी में डाल दिया गया और
फिर सभी लखनऊ पहुँच गए। इस डकैती में युवकों के इस दल को किसी
प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। जबकि गाड़ी में चौदह
व्यक्ति ऐसे थे, जिनके पास हथियार भी थे। दो सशस्त्र गोरे सैनिक भी
थे। गाड़ी का ड्राइवर तथा इन्जीनियर बहुत अधिक भयभीत हो गए थे।
ड्राइवर इञ्जिन में लेट गया था और इन्जीनियर डरकर शौचालय में जा
छिपा था। यात्रियों से पहले ही कह दिया गया था कि वे निश्चिन्त रहें,
उन्हें कोई कुछ नहीं कहेगा; केवल सरकारी खजाना लूटा जाएगा। अतः
वे शान्ति से बैठे रहे। गाड़ी में बैठे लोगों ने यह समझ लिया था कि गाड़ी
को बहुत अधिक लोगों ने घेर लिया है, जबकि यह काम केवल दस युवकों
का था, जिनमें से अधिकतर सदस्यों की अवस्था बाईस वर्ष के आसपास थी।
हाँ, इन सभी युवकों का शरीर स्वस्थ तथा सुदृढ़ अवश्य था।
इस डकैती की सफलता से एक ओर जहाँ दल को कर्जों से मुक्ति
मिली, वहीं दूसरी ओर युवकों का साहस भी बढ़ गया। साथ ही नये हथि-
यार भी खरीदे गए और आगे की योजना भी बनने लगी।
गिरफ्तारियों का सिलसिला :
काकोरी काण्ड सरकार के लिए खुली चेतावनी के समान था। शीघ्र
ही पुलिस सक्रिय हो गई। जगह-जगह छापे मारे जाने लगे, तलाशियाँ ली
जाने लगीं। गुप्तचर विभाग भी अपने स्तर से इसकी खोज में जुट गया।
शीघ्र ही चालीस व्यक्ति गिरफ्तार कर लिये गए, जबकि डकैती में केवल
दस ही लोगों ने भाग लिया था। ऐसे लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया
गया, जिनका इस मामले में कभी कोई सम्बन्ध नहीं था। इस प्रकार के
लोगों को बाद में छोड़ दिया गया।
शाहजहाँपुर के बनारसीलाल तथा इन्दुभूषण मित्र तथा कानपुर के

52 चन्द्रशेखर आजाद
' गोपीमोहन भी गिरफ्तार किये गए थे, किन्तु इनमें से प्रथम दो व्यक्ति
मुखबिर बन गए तथा गोपीमोहन साहा ने सरकारी गवाह बनना स्वीकार
कर लिया। इस डकैती में भाग लेनेवाला बनवारीलाल भी इकबाली गवाह
बन गया। इन लोगों ने पुलिस को सब-कुछ बता दिया, केवल बनारस केन्द्र
का कोई भी मुखबिर न मिल सका, अतः इस केन्द्र के बारे में पुलिस कुछ भी
पता न लगा सकी।
इन चारों को छोड़कर शेष चौबीस व्यक्ति अभियुक्त सिद्ध किये गये।
इक्कीस गिरफ्तार कर लिये गए तथा अशफाकउल्ला खां, चन्द्रशेखर आजाद
और शचीन्द्र बख्शी पुलिस के हाथ नहीं आए। इन्हें फरार घोषित कर दिया
गया।
बाद में दामोदरस्वरूप सेठ गम्भीर रूप से अस्वस्थ होने के कारण छोड़
दिये गए। मथुरा-आगरा केन्द्र के शिवचरणलाल तथा उरई-कानपुर केन्द्र के
वीरभद्र तिवारी पर से रहस्यमय अज्ञात कारणों से मुकदमा उठा लिया
गया।
मुकदमा :
शेष गिरफ्तार अभियुक्तों पर निम्नलिखित अभियोगों पर मुकदमा
चला—

  1. धारा 121 ब्रिटेन के सम्राट् के विरुद्ध युद्ध की घोषणा।
  2. धारा 120 अराजनीतिक षड्यन्त्र।
  3. धारा 396 कत्ल एव डकैती।
  4. धारा 302 कत्ल।

चन्द्रशेखर आजाद 53
सजाएँ :
काकोरी काण्ड के इन दोनों मुकदमों में अभियुक्तों को निम्नलिखित
सजाएँ मिलीं—
मृत्युदण्ड—पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशनसिंह, राजेन्द्र-
नाथ लाहिड़ी तथा अशफाकउल्ला खां।
कालापानी—शचीन्द्रनाथ सान्याल तथा शचीन्द्र बख्शी।
चौदह वर्ष की कैद—मन्मथनाथ गुप्त।
दस वर्ष की कैद—योगेशचन्द्र चटर्जी, मुकुन्दीलाल, गोविन्दचरण कार,
राजकुमारसिंह तथा रामकृष्ण खत्री।
सात वर्ष की कैद—विष्णुशरण दुब्लिश और सुरेश भट्टाचार्य।
पाँच वर्ष की कैद—भूपेन्द्रनाथ सान्याल, प्रेमकृष्ण खन्ना तथा राम-
दुलारे त्रिवेदी।
चार वर्ष की कैद—प्रणवेश चटर्जी।
यद्यपि बनवारीलाल इकबाली गवाह बन गया था, फिर भी वह सजा
पाने से बच नहीं सका। अदालत ने उसे भी पाँच वर्ष की सजा दी।
मन्मथनाथ गुप्त, योगेशचन्द्र चटर्जी, मुकुन्दीलाल, गोविन्दचरण कार,
विष्णुशरण दुब्लिश तथा सुरेश भट्टाचार्य के विरुद्ध सरकार ने फिर अपील
की। इन ६ अभियुक्तों में से योगेशचन्द्र चटर्जी, मुकुन्दीलाल तथा गोविन्द-
चरण कार को पहले दस वर्ष की कैद की सजा मिली थी, बाद में इनकी
सजा भी बढ़ाकर कालेपानी में बदल दी गई तथा सात साल कैद की सजा
पानेवाले विष्णुशरण दुब्लिश और सुरेश भट्टाचार्य की सजा बढ़ाकर दस
वर्ष कर दी गई। उम्र कम होने के कारण मन्मथनाथ गुप्त की सजा पूर्ववत्
रही।

चन्द्रशेखर आजाद
54
परन्तु परिणाम शून्य रहा। अन्ततः अंग्रेजी सरकार ने अपनी क्रूरता का
परिचय दे ही दिया; 17 दिसम्बर, 1927 को राजेन्द्र लाहिड़ी को गोंडा
जेल में तथा 19 दिसम्बर को रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में,
इसी दिन अशफ़ाकउल्ला खा को फैजाबाद जेल मे और 18 दिसम्बर को
इलाहाबाद जेल में ठा० रोशनसिंह को फाँसी दे दी गई।
इस प्रकार यह दल छिन्न-भिन्न हो गया। केवल चन्द्रशेखर आजाद
ही पुलिस के हाथ नही आ सके। इसके साथ ही उनके क्रान्तिकारी जीवन
का पूर्वार्द्ध समाप्त हो गया।

चतुर्थ अध्याय
मध्यान्तर काल
काकोरी काण्ड के बाद चन्द्रशेखर आजाद ही ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें
लाख प्रयत्न करने पर भी पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी। काकोरी काण्ड
के फैसले तक दल के लोगों को भी मालूम नहीं था कि आजाद कहाँ हैं।
श्री मन्मथनाथ गुप्त के अनुसार इस काण्ड के बाद वह दल के लोगों से
अपने घर जाने के लिए कहकर गए थे, किन्तु दल के लोगों को ही मालूम
नहीं था कि उनका घर उन्नाव था अथवा भाभरा।
इस काण्ड में उनके सभी साथी गिरफ्तार हो चुके थे। किन्तु आजाद
को खोजने के लिए पुलिस ने कुएँ, तालाब आदि भी छान मारे। इस विषय
में डॉ० भगवानदास माहौर ने लिखा है—
“प्रबल पराक्रम अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करने की चेष्टा में
कोई कसर उठा न रखी। आजाद पर कई हजार रुपये का इनाम घोषित
हो चुका था। जैसा कि कहते हैं; सारे कुओं में खोज हो चुकी थी, नदियों
में गोता लगाया गया और खोहों में तलाशा गया। पर आजाद रुद्रनारायण
के साथ परम शान्ति में निवास कर रहे थे।”
इस समय उनका निवास स्थान झाँसी और उसके आस-पास का क्षेत्र
ही था। उन दिनों झाँसी स्थित दल का केन्द्र ही उनके छिपने की जगह थी।
ऐसी स्थिति में कुछ दिनों तक शान्त बने रहना आवश्यक था। काकोरी
काण्ड के बाद से भगतसिंह के साथ नये दल के संगठन तक का समय
आजाद के क्रान्तिकारी जीवन का मध्यान्तर काल कहा जा सकता है। इस
काल में उनकी निम्नलिखित गतिविधियाँ रहीं।

56 चन्द्रशेखर आजाद
झाँसी में :
फरारी की अवस्था में सर्वप्रथम वह झाँसी पहुँचे। यहाँ उन्होंने मोटर
ड्राइविंग तथा मैकेनिक का काम सीखा और बुन्देलखण्ड मोटर कम्पनी में
काम किया। यहाँ काम करते समय एक बार उनके साथ एक दुर्घटना भी
हो गई, एक कार चालू नहीं हो रही थी, कोई भी व्यक्ति उसका हैण्डिल
नहीं घुमा पा रहा था। आजाद ने इसे चालू करने के लिए इतनी जोर से
हैण्डिल घुमाया कि उनके हाथ की हड्डी उखड़ गई। उन्हें तुरन्त अस्पताल
ले जाया गया। इसका ऑपरेशन करने के लिए क्लोरोफार्म सुंघाकर बेहोश
करना आवश्यक था, किन्तु डाक्टरों की इस राय से आजाद घबरा गए,
क्योंकि उन्होंने सुन रखा था कि बेहोशी की हालत में कभी-कभी व्यक्ति
अपनी गोपनीय बातें भी बता देता है। अतः आजाद बिना बेहोश हुए ही
ऑपरेशन कराने को तैयार हो गए, किन्तु डाक्टरों ने उनकी यह बात नहीं
मानी। आजाद ऑपरेशन-टेबल से उतर पड़े। तब उनके मित्रों ने किसी
तरह बेहोश किए जाने के लिए राजी किया।
सम्भवतः बेहोशी की हालत में उनके मुँह से कोई ऐसी बात निकल
गई, जिससे उनके क्रान्तिकारी होने का पता डाक्टर को लग गया था।
ऑपरेशन के बाद डाक्टर उनके साथ बड़े सम्मान से बातें कर रहा था।
अस्पताल से छुट्टी देते समय डाक्टर ने उनसे कहा--"अब आपका हाथ
ठीक हो गया, है। कोई चिन्ता न करिए। मुझे आशा है, आप अपने हाथों
का इस्तेमाल देश के लिए वीरता के साथ करेंगे।"
झाँसी में आजाद मास्टर रुद्रनारायण के छोटे भाई बनकर रहे थे।
डा० माहौर के अनुसार पुलिस ने कई बार रुद्रनारायण के घर पर छापे
भी मारे थे, आजाद को सामने देखकर भी वे उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाये,
क्योंकि उनके साथ आजाद का व्यवहार इस प्रकार का होता था कि पुलिस
कल्पना ही नहीं कर सकती थी कि वही आजाद होंगे और पुलिस के पास
उनका कोई फोटोग्राफ था नहीं, जो उन्हें पहचान पाती--.
"बार-बार रुद्रनारायण के घर की तलाशी हुई, पर बिल्कुल खुले रूप
में रहने वाले आजाद गिरफ्तार नहीं किए जा सके। आजाद आये हुए पुलिस
वालों और उनके अफसरों से मजाक करते रहे और बदमाश आजाद की

चालाकियों के विषय में उनकी कहानियाँ सुनते रहे। जब पुलिस वाले चले
जाते, तो आजाद हँसकर हमसे कहते—ये साले मुझे हौवा और जादूगर
बताये हुए हैं, ये बड़े मामूली लोग हैं। ये एक मजिस्ट्रेट के सामने गुलाम की
तरह खड़े रहते हैं। अब उस कुमुदसिंह को लो, जो यह कह रहा था—
क्रान्तिकारी लोग बड़े परिवारों में से होते हैं। अब अशफ़ाक़उल्ला को लो,
तो उसे डिप्टी मजिस्ट्रेट समझा जा सकता है।"
झाँसी में रहकर मोटर कम्पनी के कार्य के अतिरिक्त वह जंगलों में
जाकर निशाना लगाने का अभ्यास करते रहते थे। इन दिनों भगवानदास
माहौर से निरन्तर उनका सम्पर्क बना रहा।
साधु वेश में :
इसके बाद आजाद धीमरपुर गाँव चले गए और गाँव के बाहर एक
कुटिया बनाकर साधुवेश में रहने लगे। उन्हें ऐसा करने का परामर्श
रुद्रनारायण ने ही दिया था। यहाँ वह लोगों को रामचरित मानस की
चौपाइयाँ सुनाते थे। आरम्भ में लोग उन्हें भोजन का सामान कुटिया में
ही दे जाते थे, किन्तु बाद में आजाद श्रद्धालु लोगों के घर ही जाकर भोजन
करने लगे थे। यहीं उन्होंने छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए एक पाठशाला
भी खोली। पहले विद्यालय खुले आसमान के नीचे लगता था, परन्तु बाद
में गाँव के ही एक धनवान व्यक्ति ठाकुर मलखानसिंह ने इस कार्य के
लिए अपने घर की बैठक दे दी थी। बाद में आजाद, जो उन दिनों ब्रह्म-
चारी के नाम से जाने जाते थे, ठाकुर मलखानसिंह के ही घर में रहने लगे,
क्योंकि मलखानसिंह तथा उनके तीन भाई नौकरी करते थे और घर से
बाहर ही रहते थे। पुरुष सदस्य के घर में रहने से घर की सुरक्षा हो जाती
थी। आजाद वस्तुतः घर के सदस्य जैसे ही बन गए।
नरेशों के सम्पर्क में :
इस अवधि में उनका कई राजाओं एवं जमींदारों से भी सम्पर्क हुआ
था। एक बार ओरछा के राजा अपने दीवान आदि के साथ जंगल में
शिकार खेलने के लिए जा रहे थे, तब उनकी साधुवेशधारी आजाद से भेंट

58 चन्द्रशेखर आजाद

हुई थी। राजा साहब को शिकार के लिए जाते देख आजाद ने भी उनके
साथ चलने की इच्छा व्यक्त की। राजा को इससे बड़ा आश्चर्य हुआ कि
एक साधु शिकार करने की इच्छा व्यक्त कर रहा था। इस पर आजाद
ने अपने-आपको केवल एक पुजारी बताया था। अतः एक बन्दूक उन्हें भी
दे दी गई। इस पर राजा साहब तथा उनके कर्मचारियों को हंसी भी
आई। शिकार करते समय सभी लोग अपने-अपने स्थानों पर जम गए।
एक तगड़ा वनैला सूअर था। राजा तथा उसके सभी कर्मचारियों ने उस
पर गोलियां चलाईं, परन्तु सभी के निशाने चूक गए, फिर सबके अन्त में
आजाद ने निशाना लगाया, उनकी पहली ही गोली से सूअर धराशायी
हो गया। इस घटना के बाद राजा साहब को पक्का विश्वास हो गया कि
वह साधु या पुजारी न होकर कोई क्रान्तिकारी है। राजा साहब स्वयं भी
स्वतन्त्रता सेनानियों से सहानुभूति रखते थे। यह परिचय मित्रता में बदल
गया। काफी दिनों बाद आजाद ने उन्हें अपनी वास्तविकता बतायी।
एक बार बड़े लाट साहब ओरछा आने वाले थे। आजाद ने राजा के
पास सूचना भिजवाई कि इस अवसर पर वह लाट साहब का स्वागत
अपने ढंग से करना चाहते थे। राजा साहब ने आजाद से निवेदन किया
था कि लाट साहब राज्य के अतिथि बनकर आ रहे थे, अतः वह (आजाद)
ऐसा कुछ न करें।
यह भी कहा जाता है कि बाद में यही राजा साहब अपने एक मुंहलगे
नौकर के बहकावे में आकर आजाद को पकड़वाने के लिए सहमत हो गए
थे। जब उनके तथा इस नौकर के बीच इस योजना पर बात हो रही थी,
आजाद उस समय वहीं पर सो रहे थे। राजा को कोई शक न हो, इसलिए
वह जोर-जोर से खर्राटे ले रहे थे। इसके तुरन्त बाद मौका मिलते ही वह
वहां से भाग गए।
मास्टर रुद्रनारायण ने ही आजाद को साधुवेश में रहने का परामर्श
दिया था। उन्हीं के सहयोग से आजाद का सम्पर्क राजा साहब रानिया-
धाना से भी हुआ था। आजाद पहले उनके यहां एक अच्छे मोटर-मैकेनिक
के रूप में गए थे। बाद में राजा साहब को उन्होंने बताया था कि वह एक
क्रान्तिकारी हैं। मार्च, 1928 में राजा साहब ने उन्हें यह आश्वासन भी

चन्द्रशेखर आजाद 59
या था कि वह दल के कार्यों के लिए कुछ हथियार भी देंगे।
इस समय भगवानदास माहौर भी आज़ाद के साथ ही रहते थे। राजा
खलकश्री सिंहदेव के आजाद पक्के विश्वासपात्र बन गए थे। यहाँ रह-
कर वह ड्राइविंग तथा निशाना लगाने का अभ्यास भी करते रहते थे।
राजा साहब उनके साथ शिकार खेलने भी जाते रहते थे। राजा साहब की
उनके साथ इस घनिष्ठता से उनके कर्मचारी तथा रिश्तेदार ईर्ष्या करने
लगे, अतः आजाद ने खनियाधाना छोड़ दिया।
बम्बई में :
कुछ पुस्तको मे वर्णन मिलता है कि आजाद बुन्देलखण्ड के बाद फिर
बम्बई चले गए थे और वहाँ उन्होंने बन्दरगाह में कुली का काम किया।
दिनभर जहाजों में माल चढ़ाने या उतारने के काम करते थे, जिसके लिए
शाम को नौ आने मजदूरी मिलती थी। रात में बारह बजे तक विचर-
ते तथा फिर किसी गोदाम में या फुटपाथ पर सो जाते थे। यह क्रम
लगभग डेढ़ वर्ष तक चला।
यहाँ उन्होंने वीर सावरकर से भी भेंट की थी। सावरकर ने उन्हें
क्रान्तिपथ की कठिनाइयों से अवगत कराया और इनसे भयभीत न होने
का परामर्श दिया, इससे आजाद को एक नई प्रेरणा मिली और वह नये
सिरे से दल का संगठन करने के लिए बम्बई से उत्तर की ओर चल पड़े।

पंचम अध्याय
नई सुबह : दल का पुनर्गठन
काकोरी काण्ड 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' के लिए अभि-
शाप सिद्ध हुआ। दल के सभी प्रमुख सदस्य पकड़े गए। उनमें चार को
फाँसी की सजा सुनाई गई तथा शेष सदस्यों को लम्बी कैद की सजाएँ हुईं।
केवल चन्द्रशेखर आजाद ही बचे रहे। उनके सामने दल को पुनर्गठित
करने की समस्या थी, वह इस कार्य के लिए जीजान से जुट गए। सौभाग्य
से उन्हें इसके लिए भगतसिंह जैसे साथी मिल गए। यहीं से उनके क्रान्ति-
कारी जीवन का उत्तरार्द्ध प्रारम्भ होता है।
भगतसिंह से भेंट :
दल के पुनर्गठन के सिलसिले में आजाद कानपुर पहुँचे। यहाँ वह
प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, पत्रकार एवं समाजसुधारक गणेशशंकर विद्यार्थी
के पास ठहरे। भगतसिंह भी यहाँ आये हुए थे। यहीं इन दोनों की पहली
बार भेंट हुई। इस भेंट का वर्णन करते हुए श्री यशपाल ने 'सिंहावलोकन'
में लिखा है—
"आजाद ज्यों ही अन्दर से बाहर वाले कमरे में आए, उन्होंने विद्यार्थी-
जी के निकट एक अपरिचित, किन्तु तेजस्वी नवयुवक को बैठे देखा। उसे
देखकर आजाद क्षण-भर के लिए ठिठक गए। वह नवयुवक लम्बे कद और
छरहरे बदन का था। रंग गोरा था, आँखें छोटी-छोटी थीं। उसके चेहरे
पर विलक्षणता का भाव था, उसने सिर के ढीले केशों पर लटकती-सी
पगड़ी बाँध रखी थी और उसके शरीर पर कोट और लुंगी थी। आजाद
को उसने आकर्षित किया।
"आइए पण्डितजी !" आजाद को संकोच में देखकर विद्यार्थीजी ने

चन्द्रशेखर आजाद 61
तपाक से कहा।
कार्यव्यस्त नवयुवक ने दृष्टि ऊपर उठाकर देखा। पण्डितजी के रूप
में उसे भव्य हृष्टपुष्टाकारी जोशीले नवयुवक के दर्शन हुए।
इसके बाद इन दोनों का परस्पर परिचय हुआ। दोनों के विचार
समान थे। दोनों एक-दूसरे से प्रभावित हुए। उनकी यह पहली मुलाकात
जीवन भर की मित्रता में बदल गई। यह एक ऐतिहासिक मुलाकात थी।
मातृभूमि के दो दीवानों का एक अटूट मिलन था, जिन्होंने भावी इतिहास
में भारत की स्वतन्त्रता के लिए कन्धे-से-कन्धा मिलाकर कार्य किया और
एक नये इतिहास की रचना की। वीर चन्द्रशेखर आजाद के इस जीवन
का उत्तरार्द्ध वस्तुतः भगतसिंह के मिलने के बाद ही प्रारम्भ हुआ।
नया दल हिन्दुस्तान समाजवादी गणतन्त्र सेना '

62 चन्द्रशेखर आजाद
करने बंगाल गए, तो ये लोग उनका यहाँ रात में रहने का प्रबन्ध भी नहीं
कर पाए थे। अतः इनसे सहयोग की आशा छोड़ दी गई।
नये दल के गठन के लिए 8 सितम्बर, 1928 को फिरोजशाह कोटला
के किले के खण्डहरों में क्रान्तिकारियो की एक बैठक हुई (यह तिथि
विभिन्न पुस्तकों में अलग-अलग है, फिर भी अधिकतर पुस्तकों में यही
तिथि है।) इसमें बंगाल को छोड़कर उत्तरी भारत के सभी राज्यों के
प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भगतसिंह एवं सुखदेव पंजाब राज्य के प्रति-
निधि थे, कुन्दनलाल राजस्थान के, शिव वर्मा, ब्रह्मदत्त मिश्र, जयदेव,
विजयकुमार सिन्हा तथा सुरेन्द्र पाण्डे संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) के और
फणीन्द्रनाथ घोष एवं मनमोहन बनर्जी बिहार राज्य के प्रतिनिधि थे।
कुछ अज्ञात अपरिहार्य कारणों से चन्द्रशेखर आजाद इस बैठक में नहीं आ
सके, किन्तु भगतसिंह और शिव वर्मा से उन्होंने पहले ही कह दिया था कि
बैठक में बहुमत से जो भी निर्णय लिए जाएँगे, वे उन्हें मान्य होंगे।
अभी तक विभिन्न राज्यों के क्रान्तिकारी दलों के अपने अलग-अलग
नाम थे। अतः सभी प्रान्तों के दलों को मिलाकर एक अखिल भारतीय नया
दल बनाया गया। इस नये संगठन का नाम 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट
रिपब्लिकन आर्मी' अर्थात् 'हिन्दुस्तान समाजवादी गणतान्त्रिक सेना' रखा
गया। दल के सभी सदस्य नए थे। यों तो चन्द्रशेखर आजाद भी युवक ही
थे, किन्तु इससे पूर्व वह 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' मे राम-
प्रसाद बिस्मिल आदि के साथ कार्य कर चुके थे, जिससे उन्हें हथियारों
को चलाने आदि का अच्छा अनुभव था, जबकि अन्य नये लोग इस मामले
में अनुभवहीन थे, अतः 'हिन्दुस्तान समाजवादी गणतन्त्र सेना' का प्रधान
सेनापति-कमाण्डर इन चीफ उन्हीं को बनाया गया।
नये दल की केन्द्रीय समिति :
इस नये संगठन की एक केन्द्रीय समिति बनायी गई, जिसमें प्रत्येक
राज्य के प्रतिनिधि थे, जिनके नाम निम्नलिखित हैं।
1 भगतसिंह (पंजाब)
2 चन्द्रशेखर आजाद (संयुक्त प्रान्त

चन्द्रशेखर आजाद 63
3 सुखदेव (पंजाब)
4. शिव वर्मा (संयुक्त प्रान्त)
5 विजय कुमार (संयुक्त प्रान्त)
6 फणीन्द्रनाथ घोष (बिहार)
7 कुन्दन लाल (राजस्थान)
नये दल के गठन में यह स्पष्ट कर दिया गया कि दल पर किसी एक
व्यक्ति का नियन्त्रण नहीं रहेगा। दल की सभी सम्पत्ति केन्द्रीय समिति के
अधिकार में रहेगी। जो भी कार्य किया जाएगा, उस पर पहले केन्द्रीय
समिति विचार करेगी। सभी निर्णय बहुमत के आधार पर किए जाएँगे।
इस नये दल के नाम में समाजवादी शब्द विशेष अभिप्राय से जोड़ा
गया। जो इस बात का सूचक था कि यह दल मार्क्सवाद के समाजवादी
सिद्धान्तों पर आधारित समाज की स्थापना करने के लिए प्रयत्नशील रहेगा
और शोषण को मिटाएगा।
इस बैठक में इन बातों पर भी विचार हुआ कि दल सशस्त्र क्रान्ति
द्वारा भारत की स्वतन्त्रता के लिए काम करेगा, जिसके लिए धन की
आवश्यकता अनिवार्य रूप से होगी। क्योंकि यह एक गुप्त आन्दोलन था,
अतः चन्दे से धन संचय करना सम्भव नहीं था। इस समस्या के निराकरण
के लिए डकैतियाँ डालना तय हुआ, साथ ही यह भी निश्चित हुआ कि
डकैतियाँ जहाँ तक हो सरकारी बैंकों, खजानों या डाकघरों में डाली
जाएँ। जनता में डकैतियाँ डालने से दल उसकी सहानुभूति से वंचित हो
सकता है। अतः केवल आपात काल के लिए व्यक्तिगत डकैतियाँ डाली जा सकती हैं।

64 चन्द्रशेखर आज़ाद
कर्ता प्रतिनिधि बनाया गया।
इस प्रकार चन्द्रशेखर आज़ाद को इस नये संगठन 'हिन्दुस्तान समाज-
वादी गणतन्त्र सेना' का अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ। यों देखा जाए
तो इस संगठन के उद्देश्यों तथा पूर्व संगठन 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसो-
सिएशन' के उद्देश्यों में कोई विशेष अन्तर नहीं था, किन्तु पूर्व दल के नाम
से उसके उद्देश्यों का परिचय नहीं मिलता था। इस सम्बन्ध में मन्मथनाथ
गुप्त लिखते हैं—
“काकोरी युग में समिति का नाम हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
था। यह नाम कम अर्थव्यंजक समझा गया, यानी यह समझा गया कि इस
नाम से दल का उद्देश्य पूर्णरूप से व्यक्त नहीं होता। इसलिए इसको और
स्पष्ट करना चाहिए, तदनुसार दल का नाम 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन
सोशलिस्ट आर्मी' यानी हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना रखा
गया। संक्षेप में ऐसा इसलिए हुआ कि साधनों में विकास न होकर क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के ध्येय में ही विकास होता रहा। उसी के अनुसार यह
नाम बदल दिया गया। यह परिवर्तन सूचित करता है कि दल के ध्येय में
और अधिक विकास हुआ। दल ने समाजवाद और मजदूर वर्ग के अधि-
नायकत्व को अपना ध्येय घोषित किया।
पुलिस से आँखमिचौनी :
काकोरी काण्ड के बाद फरार हो जाने पर आज़ाद लगभग दो वर्ष से
अपनी माँ से भी नहीं मिल पाए थे। उनके पिताजी का देहावसान हो चुका
था। वृद्धा माँ भी कानपुर में आकर रहने लगी थी। एकमात्र पुत्र
के वियोग में वह तड़प रही थी। उन्हें मालूम हो चुका था कि आज़ाद
किसी डकैती के बाद फरार हो गए थे। उनके अन्य कई साथी या तो
फाँसी की सजा पा चुके थे या उन्हें लम्बी-लम्बी कैद की सजाएं मिल चुकी
थी। पकड़े जाने पर आज़ाद के लिए भी सजा निश्चित थी। एक दिन
आज़ाद अपनी माँ से मिलने जा पहुँचे। इतने लम्बे समय बाद माँ-बेटे
मिले थे। अभी कुछ ही देर हुई थी कि भगतसिंह तथा सुखदेव भी वहाँ
पहुँच गए। भगतसिंह ने बताया कि उनके बारे में पुलिस को पता चल

चन्द्रशेखर आजाद
गया था। अतः भाग चला जाए, किन्तु आजाद का तो काम ही खतरा से
खेलना था। भरा हुआ रिवाल्वर सदा उनके पास रहता था। वह पुलिस
का सामना करने को तैयार हो गये। इस पर भगतसिंह ने उन्हें समझाया
कि इस प्रकार का साहस उन्हें विपत्ति में डाल देगा; अतः सब भाग खड़े
हुए।
इसी प्रकार एक बार यह कानपुर में 'प्रताप' के सम्पादक श्रीयुत
गणेशशंकर विद्यार्थीजी के पास बैठे हुए थे। तभी उनको पता लगा कि
पुलिस को उनकी यहाँ उपस्थिति के विषय में पता चल गया था। अतः
आजाद और उनका एक साथी अपनी माँ के निवास-स्थान पर चले गए।
वहीं भोजन करने के बाद दोनों साथी सो गए। इतने में आजाद के
विद्यार्थीजी के पास से निकलते ही एक पुलिस अधिकारी अपने दल-बल के
साथ यहाँ पहुँच गया। आजाद वहाँ से पहले ही जा चुके थे। किसी ने
पुलिस को बता दिया कि आजाद अपनी माँ के पास चले गए थे। पुलिस
का दल वहाँ पहुँच गया। दरवाजा अन्दर से बन्द था। पुलिस को बाहर
आया देख दोनों साथी जाग पड़े। आजाद सामना करने को तैयार हो
गये।
दोनों साथियों ने अपनी-अपनी पिस्तोलें निकाल लीं। पुलिस लगातार
दरवाजा खटखटाए जा रही थी। पुलिस अधिकारी ने दरवाजा न खुलते
देख दरवाजा तोड़ने का आदेश दे दिया। दरवाजा तोड़ा जाने लगा। एक
किवाड़ के टूटते ही आजाद और उनका साथी पुलिस पर गोलियाँ चलाने
लगे। जवाब में पुलिस भी गोली चलाने लगी, किंतु दोनों साथी ओट में
स्वयं को बचाते रहे। कई पुलिस वाले घायल हो गए। पुलिस अधिकारी
क्रोधित हो गया। उसने अपने सिपाहियों को अन्दर प्रवेश करने का
आदेश दे दिया। दरवाजा टूट चुका था। बीसियों पुलिसवाले अपने हथिया-
रों को ताने अन्दर आने को तैयार हो गए। इधर आजाद और उनके
साथी की पिस्तोलें खाली हो चुकी थीं। पुलिसवाले अन्दर घुसते, इससे
पहले ही दोनों साथी मकान की छत पर चले गए, वहाँ से दूसरी छत पर
कूद पड़े। उस मकान को पुलिस ने घेर लिया। पुलिस गोलियाँ चलाने
लगी, दोनों क्रान्तिकारियों ने इसका जवाब छत पर रखी ईंटों से दिया।

68 चन्द्रशेखर आजाद
और सतर्कता का वर्णन किया कि अभी हमें इस विचार को छोड़ना पड़ेगा,
इस समाचार ने भगतसिंह के सारे ख्वाब तोड़ दिए। बहुत कोशिशों के
बाद बिस्मिल की लिखी एक गजल हाथ लगी।" ...
' बिस्मिल काकोरी काण्ड के नेता थे, अतः फाँसी की सजा सुना दिये जाने
के बाद भी उन पर पुलिस का पहरा सबसे अधिक कठोर था। उनके द्वारा
बाहर भेजी जानेवाली तथा उनके पास आनेवाली चीजो पर कड़ी निग-
रानी रखी जाती थी; उनके द्वारा लिखी गई इस गजल को शायद जेल के
अधिकारियों ने एक साधारण गजल समझ लिया था; इसमें छिपे गूढ़ '
को वे नहीं समझ पाए थे। यह गजल निम्नलिखित है—
मिट गया जब मिटने वाला
फिर सलाम आया तो क्या।
दिल की बरबादी के बाद
उनका पयाम आया तो क्या॥
मिट गई सारी उम्मीदें
मिट गए सारे खयाल।
उस घड़ी गर नामबर
लेकर पयाम आया तो क्या॥
ऐ दिले नादान मिट जा
अब तू कूचे यार में।
फिर मेरी नाकामियों के
बाद काम आया तो क्या॥
काश अपनी जिन्दगी में
हम वो मंजर देखते।
बरसरे तुरबत कोई
महशर खराम आया तो क्या॥

चन्द्रशेखर आजाद
आखिरी शब दीद के
काबिल थी बिस्मिल की तड़प ।
सुबह दम कोई अगर
बाला ए बाम आया तो क्या ॥
गजल की इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि इनके माध्यम से बिस्मिल ने
अपने साथियों के पास संदेश भिजवाया था कि इस काण्ड में फांसी की
सजा पाये वीरों को मुक्त कराने के लिए शीघ्र प्रयत्न करें। अन्यथा फांसी
हो जाने पर उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी। यह प्रयत्न 1927 के आरम्भ
में किये गए थे।

78 चन्द्रशेखर आज़ाद
माननी ही पड़ेगी। तुमने मेरा जो अपमान किया है, उसका उत्तर मैं दे
दूंगा। इसके बाद तुम कभी मुझसे बात न करना।"
भगतसिंह के साथ बम डालने में बटुकेश्वरदत्त को उनका साथी
बनाया गया।
आज़ाद का नाम इसके लिए किसी ने भी प्रस्तुत नहीं किया, क्योंकि
सभी सदस्यों के मत में दल के भविष्य के लिए उनका इस प्रकार के कार्यों
में भाग न लेना ही उचित था।
केन्द्रीय असेम्बली में दो बिल पेश किये गए थे—जन सुरक्षा बिल
तथा औद्योगिक विवाद बिल। प्रथम बिल का उद्देश्य राजनीतिक आन्दो-
लनों को कुचलना तथा दूसरे बिल का मज़दूरों को हड़ताल के अधिकार से
वंचित करना था। अतः ये बिल विवाद का विषय बन चुके थे। जनता को
विश्वास था कि यदि असेम्बली ने इन बिलों को अस्वीकार भी कर दिया
तो सरकार वाइसराय के विशेष अधिकार से इन्हें पास कर देगी।
8 अप्रैल, 1929 को असेम्बली में इन दोनों बिलों पर निर्णय सुनाया
जाना था। अतः भगतसिंह एवं बटुकेश्वरदत्त के लिए असेम्बली के एक
मनोनीत सदस्य की सिफारिश पर पास बनाये गए। दोनों ने खाकी क़मीज़
और नेकर पहनी थी। जयदेव कपूर उन्हें असेम्बली में उचित स्थान पर
बैठा आये, जहाँ से बम फेंकने में किसी प्रकार की असुविधा न हो और
किसी को चोट भी न लगे।