अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 148 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचम अध्याय
नई सुबह : दल का पुनर्गठन
काकोरी काण्ड 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' के लिए अभि-
शाप सिद्ध हुआ। दल के सभी प्रमुख सदस्य पकड़े गए। उनमें चार को
फाँसी की सजा सुनाई गई तथा शेष सदस्यों को लम्बी कैद की सजाएँ हुईं।
केवल चन्द्रशेखर आजाद ही बचे रहे। उनके सामने दल को पुनर्गठित
करने की समस्या थी, वह इस कार्य के लिए जीजान से जुट गए। सौभाग्य
से उन्हें इसके लिए भगतसिंह जैसे साथी मिल गए। यहीं से उनके क्रान्ति-
कारी जीवन का उत्तरार्द्ध प्रारम्भ होता है।
भगतसिंह से भेंट :
दल के पुनर्गठन के सिलसिले में आजाद कानपुर पहुँचे। यहाँ वह
प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, पत्रकार एवं समाजसुधारक गणेशशंकर विद्यार्थी
के पास ठहरे। भगतसिंह भी यहाँ आये हुए थे। यहीं इन दोनों की पहली
बार भेंट हुई। इस भेंट का वर्णन करते हुए श्री यशपाल ने 'सिंहावलोकन'
में लिखा है—
"आजाद ज्यों ही अन्दर से बाहर वाले कमरे में आए, उन्होंने विद्यार्थी-
जी के निकट एक अपरिचित, किन्तु तेजस्वी नवयुवक को बैठे देखा। उसे
देखकर आजाद क्षण-भर के लिए ठिठक गए। वह नवयुवक लम्बे कद और
छरहरे बदन का था। रंग गोरा था, आँखें छोटी-छोटी थीं। उसके चेहरे
पर विलक्षणता का भाव था, उसने सिर के ढीले केशों पर लटकती-सी
पगड़ी बाँध रखी थी और उसके शरीर पर कोट और लुंगी थी। आजाद
को उसने आकर्षित किया।
"आइए पण्डितजी !" आजाद को संकोच में देखकर विद्यार्थीजी ने