अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रशेखर आजाद
गया था। अतः भाग चला जाए, किन्तु आजाद का तो काम ही खतरा से
खेलना था। भरा हुआ रिवाल्वर सदा उनके पास रहता था। वह पुलिस
का सामना करने को तैयार हो गये। इस पर भगतसिंह ने उन्हें समझाया
कि इस प्रकार का साहस उन्हें विपत्ति में डाल देगा; अतः सब भाग खड़े
हुए।
इसी प्रकार एक बार यह कानपुर में 'प्रताप' के सम्पादक श्रीयुत
गणेशशंकर विद्यार्थीजी के पास बैठे हुए थे। तभी उनको पता लगा कि
पुलिस को उनकी यहाँ उपस्थिति के विषय में पता चल गया था। अतः
आजाद और उनका एक साथी अपनी माँ के निवास-स्थान पर चले गए।
वहीं भोजन करने के बाद दोनों साथी सो गए। इतने में आजाद के
विद्यार्थीजी के पास से निकलते ही एक पुलिस अधिकारी अपने दल-बल के
साथ यहाँ पहुँच गया। आजाद वहाँ से पहले ही जा चुके थे। किसी ने
पुलिस को बता दिया कि आजाद अपनी माँ के पास चले गए थे। पुलिस
का दल वहाँ पहुँच गया। दरवाजा अन्दर से बन्द था। पुलिस को बाहर
आया देख दोनों साथी जाग पड़े। आजाद सामना करने को तैयार हो
गये।
दोनों साथियों ने अपनी-अपनी पिस्तोलें निकाल लीं। पुलिस लगातार
दरवाजा खटखटाए जा रही थी। पुलिस अधिकारी ने दरवाजा न खुलते
देख दरवाजा तोड़ने का आदेश दे दिया। दरवाजा तोड़ा जाने लगा। एक
किवाड़ के टूटते ही आजाद और उनका साथी पुलिस पर गोलियाँ चलाने
लगे। जवाब में पुलिस भी गोली चलाने लगी, किंतु दोनों साथी ओट में
स्वयं को बचाते रहे। कई पुलिस वाले घायल हो गए। पुलिस अधिकारी
क्रोधित हो गया। उसने अपने सिपाहियों को अन्दर प्रवेश करने का
आदेश दे दिया। दरवाजा टूट चुका था। बीसियों पुलिसवाले अपने हथिया-
रों को ताने अन्दर आने को तैयार हो गए। इधर आजाद और उनके
साथी की पिस्तोलें खाली हो चुकी थीं। पुलिसवाले अन्दर घुसते, इससे
पहले ही दोनों साथी मकान की छत पर चले गए, वहाँ से दूसरी छत पर
कूद पड़े। उस मकान को पुलिस ने घेर लिया। पुलिस गोलियाँ चलाने
लगी, दोनों क्रान्तिकारियों ने इसका जवाब छत पर रखी ईंटों से दिया।