अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा
चन्द्रशेखर आजाद २५
विद्यार्थी निर्भीक खड़े थे। आजाद से पहलेवाले लड़के से मजिस्ट्रेट ने पूछा,
"तुम्हारा नाम?"
"नवम्बर।" लड़के ने उत्तर दिया।
"तुम्हारे बाप का नाम?"
"दिसम्बर।"
इन उत्तरों को खरेघाट ने अपने लिए अपमानजनक समझा। इसके
बाद उसने चन्द्रशेखर आजाद से पूछा, "तुम्हारा नाम"
"आजाद।" चन्द्रशेखर बोले।
"पिता का नाम?"
"स्वाधीन।"
"तुम्हारा घर कहाँ है?"
"जेल में।"
इस प्रकार के उत्तरों से मजिस्ट्रेट तिलमिलाकर रह गया। बड़े-बड़े
अपराधी उसके सामने उत्तर देने का साहस भी नहीं कर पाते थे। अतः
उसने क्रोध में आकर आजाद को पन्द्रह बेतों की कठोर सजा दी। बेतों की
सजा वास्तव में कठोर समझी जाती थी। इसे सुनकर ही अभियुक्त काँप
उठते थे, बेतों की मार से चमड़ी उधड़ जाती थी, परन्तु चन्द्रशेखर ने इस
दण्ड की कोई परवाह नहीं की।
The provided image appears to be entirely blank (completely white) with no visible text, diagrams, or content to transcribe.
Please re-upload or provide the intended image containing the document or page, and I will gladly transcribe it line-by-line as requested.
चन्द्रशेखर आजाद 27
उनका प्रेम और भी दृढ़ हो गया। इस सम्बन्ध में श्री मन्मथनाथ गुप्त
अपनी पुस्तक 'भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास' में लिखते
हैं—
"आजाद ने मजिस्ट्रेट के सामने चुनौती दी। आजाद ने ठीक ही
कहा था कि कुशासन में आजाद लोगों का स्थान जेलखाना ही होता है।
खरेघाट ने सोचा कि यह बालक है, इसे ऐसी सजा देनी चाहिए, जिससे
कि इसे कुछ सबक हो और यह इन बातों को छोड़कर पढ़ने-लिखने में
लगे। इसके अनुसार उन्हें पन्द्रह बेंत मारने की सजा दी गई। जेल में ले
जाकर उन्हें बेंत लगाये गये। पर एक-एक बेंत मारा जाता था और वे
पहले से अधिक जोर से 'महात्मा गांधी की जय' बोलते थे। उन दिनों
'महात्मा गांधी की जय' का नारा भारत की युद्धयात्रा का नारा था।"
वास्तव में स्वतन्त्रता शरीर की नहीं मन की होती है। व्यक्ति के
शरीर को बन्दी बनाया जा सकता है, मन को नहीं। सच्चे स्वतन्त्रता प्रेमी
अत्याचारी शासन के लिए आँखों की किरकिरी बन जाते हैं, अतः उनका
जीवन अधिकतर कारागारों में ही बीतता है। ब्रिटिश शासन में सभी
देशप्रेमियों का घर जेल में ही बन गया था, इसलिए चन्द्रशेखर से जब
मजिस्ट्रेट ने उनके घर के विषय में पूछा तो उन्होंने जेल को ही अपना घर
बताया। उनके इस उत्तर में गम्भीर अर्थ छिपा था जो सरकार के अत्या-
चारों की ओर संकेत करता था।
इस घटना ने किशोर अवस्था में ही चन्द्रशेखर को एक लोकप्रिय नेता
के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। यद्यपि यह सजा क्रूर अवश्य थी, फिर भी इसे
कोई भारी सजा नहीं कहा जा सकता, किन्तु यह घटना उनके भावी
क्रान्तिकारी जीवन के लिए प्रथम सोपान थी। इस दृष्टि से यह एक
महत्वपूर्ण घटना है और इसी घटना के बाद वह चन्द्रशेखर से चन्द्रशेखर
आजाद बने थे; वीर चन्द्रशेखर आजाद।
उनकी बेंतों की सजा का यह समाचार उनके घर वालों तक पहुँच
गया, क्योंकि यह समाचार देश के सभी समाचार-पत्रों में छपा था।
समाचार को पढ़कर उनके घर के लोग अत्यन्त चिन्तित हुए। पिता
श्री सीताराम तिवारी सीधे बनारस पहुँचे। उन्होंने पुत्र को अनेक प्रकार
26 चन्द्रशेखर आजाद
सारा शरीर लहूलुहान हो गया, किन्तु चन्द्रशेखर ने उफ तक नहीं की;
उनके मुखमण्डल पर पीड़ा या विषाद का कोई चिह्न नहीं था। उनके इस
प्रकार के धैर्य, साहस तथा देशप्रेम को देखकर सभी उपस्थित लोग आश्चर्य-
चकित रह गये।
चन्द्रशेखर को मिली बेंतों की सजा का समाचार पूरे बनारस नगर में
फैल गया था। जनता फूलमालाएं लेकर उनका स्वागत करने जेल के
दरवाजे पर पहुँच गई। जनता में बालक, युवा एवं वृद्ध तथा स्त्री एवं
पुरुष सभी ने उनको फूलों की मालाएं पहनाकर उनका स्वागत किया, उन्हें
अपने कन्धों पर उठा लिया और 'चन्द्रशेखर आजाद की जय', 'भारतमाता
की जय' तथा 'महात्मा गांधी की जय' आदि नारों से आकाश गूंज उठा।
उसी दिन बनारस के ज्ञानवापी नामक स्थान पर एक सभा हुई।
वहाँ भी लोगों की अपार भीड़ इस वीर बालक के दर्शनों के लिए उप-
स्थित थी। चन्द्रशेखर आजाद मंच पर आये तो उनके ऊपर फूलों की
वर्षा की गई; वह पुष्पमालाओं से लद गये। इस समय वह धोती एवं
कुर्ता पहने हुए थे, उनके माथे पर चन्दन का तिलक लगा हुआ था। मंच
पर से उन्होंने एक संक्षिप्त-सा भाषण दिया, जिसमें उन्होंने देश की
स्वतन्त्रता के लिए कार्य करने की प्रार्थना की तथा इस पावन कार्य के लिए
अपने प्राणों का बलिदान कर देने वाले वीरों को अपनी श्रद्धांजलि दी।
जन समुदाय ने पुनः 'चन्द्रशेखर आजाद जिन्दाबाद' के नारे लगाये। इसके
पश्चात् अन्य लोगों ने भी भाषण दिये, जिनमें चन्द्रशेखर आजाद के वीरता-
पूर्ण कार्य की प्रशंसा की गई।
उन दिनों बनारस से 'मर्यादा' नामक एक पत्र निकलता था, जिसके
प्रकाशक श्री शिवप्रसाद गुप्त तथा सम्पादक श्री सम्पूर्णानन्द थे। श्री
सम्पूर्णानन्द बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री तथा राजस्थान के राज्यपाल
भी बने। 'मर्यादा' में चन्द्रशेखर आजाद का चित्र तथा 'वीर बालक
आजाद' नाम से उनके विषय में एक लेख भी प्रकाशित हुआ जिसमें
उनके वीरतामय कार्य तथा अद्भुत साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी।
यद्यपि अदालत में मजिस्ट्रेट खरेघाट ने चन्द्रशेखर को सबक सिखाने
के उद्देश्य से 'बेंतों' की सजा दी थी, किन्तु इस सजा से मातृभूमि के प्रति
चन्द्रशेखर आजाद 27
उनका प्रेम और भी दृढ़ हो गया। इस सम्बन्ध में श्री मन्मथनाथ गुप्त
अपनी पुस्तक 'भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास' में लिखते
हैं—
"आजाद ने मजिस्ट्रेट के सामने चुनौती दी। आजाद ने ठीक ही
कहा था कि कुशासन में आजाद लोगों का स्थान जेलखाना ही होता है।
खरेघाट ने सोचा कि यह बालक है, इसे ऐसी सजा देनी चाहिए, जिससे
कि इसे कुछ सबक हो और यह इन बातों को छोड़कर पढ़ने-लिखने में
लगे। इसके अनुसार उन्हें पन्द्रह बेंत मारने की सजा दी गई। जेल में ले
जाकर उन्हें बेंत लगाये गये। पर एक-एक बेंत मारा जाता था और वे
पहले से अधिक जोर से 'महात्मा गांधी की जय' बोलते थे। उन दिनों
'महात्मा गांधी की जय' का नारा भारत की युद्धयात्रा का नारा था।"
वास्तव में स्वतन्त्रता शरीर की नहीं मन की होती है। व्यक्ति के
शरीर को बन्दी बनाया जा सकता है, मन को नहीं। सच्चे स्वतन्त्रता प्रेमी
अत्याचारी शासन के लिए आँखों की किरकिरी बन जाते हैं, अतः उनका
जीवन अधिकतर कारागारों में ही बीतता है। ब्रिटिश शासन में सभी
देशप्रेमियों का घर जेल में ही बन गया था, इसलिए चन्द्रशेखर से जब
मजिस्ट्रेट ने उनके घर के विषय में पूछा तो उन्होंने जेल को ही अपना घर
बताया। उनके इस उत्तर में गम्भीर अर्थ छिपा था जो सरकार के अत्या-
चारों की ओर संकेत करता था।
इस घटना ने किशोर अवस्था में ही चन्द्रशेखर को एक लोकप्रिय नेता
के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। यद्यपि यह सजा क्रूर अवश्य थी, फिर भी इसे
कोई भारी सजा नहीं कहा जा सकता, किन्तु यह घटना उनके भावी
क्रान्तिकारी जीवन के लिए प्रथम सोपान थी। इस दृष्टि से यह एक
महत्त्वपूर्ण घटना है और इसी घटना के बाद वह चन्द्रशेखर से चन्द्रशेखर
आजाद बने थे; वीर चन्द्रशेखर आजाद।
उनकी बेंतों की सजा का यह समाचार उनके घर वालों तक पहुँच
गया, क्योंकि यह समाचार देश के सभी समाचार-पत्रों में छपा था।
समाचार को पढ़कर उनके घर के लोग अत्यन्त चिन्तित हुए। पिता
श्री सीताराम तिवारी सीधे बनारस पहुँचे। उन्होंने पुत्र को अनेक प्रकार
29
चन्द्रशेखर आजाद
ने समझाया तथा उन पर जोर डाला कि वह घर लौट चलें, किन्तु आजाद
भी बचपन से ही अपने हठ के धनी थे। वह देश-सेवा का व्रत ले चुके थे।
किसी भी श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए अपना लक्ष्य ही सबसे महान होता है।
महापुरुष जिस कार्य को करने की ठान लेते हैं, दुनिया भर की विपत्तियां
आ जाने पर भी, वह अपने मार्ग से नहीं हटते, अतः उन्होंने अपने पिताजी
का यह प्रस्ताव नहीं माना। पिताजी निराश होकर वापस घर लौट गये।
यह उनका अपने घर के प्रति एक प्रकार का विद्रोह ही था। वस्तुतः
आजाद की दृष्टि में सारा देश ही अपना घर था। आचार्य चाणक्य ने
कुल के लिए एक व्यक्ति का, ग्राम के लिए कुल का तथा राज्य अथवा देश
के लिए ग्राम का भी परित्याग करने की शिक्षा दी है। चन्द्रशेखर आजाद
ने भी ऐसा ही किया, उन्होंने भारत भूमि के हित में संकीर्ण पारिवारिक
मोह तथा उसके सम्बन्धों को तिलांजलि दे दी।
द्वितीय अध्याय
क्रान्ति की ओर
पूर्वकथित बनारस की घटना के बाद वीर चन्द्रशेखर आजाद के
चरण स्वतन्त्रता आन्दोलन की ओर बढ़ते गये। वे पूर्णतया देशभक्ति के
रंग में रंग गये; पढ़ाई से उनका मन उठ गया, वे अपने विद्यालय के
साथियों को भी देश की स्वतन्त्रता के आन्दोलन में भाग लेने के लिए
तैयार करने लगे। आजादी प्राप्त करना ही आजाद का लक्ष्य बन गया।
आन्दोलन की वापसी : आजाद की निराशा.
असहयोग आन्दोलन ने चन्द्रशेखर आजाद को एक नई दिशा दिखाई
थी, वह भारत की स्वतन्त्रता के सपने देखने लगे थे। इसके लिए उनके
मन में कुछ करने की तमन्नाएँ थीं, किन्तु अगले ही वर्ष चौरीचौरा की
घटना के कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया।
घटना इस प्रकार घटी कि असहयोग आन्दोलन पूरे जोरों से चल रहा था,
कई आन्दोलनकारी जेलों में बन्द कर दिये गए थे। यह आन्दोलन पूरी
तरह अहिंसात्मक था। गोरखपुर के पास चौरीचौरा नामक स्थान पर
पुलिस के अत्याचारों से आन्दोलनकर्ता अपना आपा खो बैठे, उनकी भीड़
ने एक थाने में आग लगा दी। इस आग में एक दरोगा तथा इक्कीस
सिपाहियों की जलकर मृत्यु हो गई। यह घटना 12 फरवरी, 1922 को
घटी थी, जिसे इतिहास में 'चौरीचौरा काण्ड' के नाम से जाना जाता है।
इस प्रकार की हिंसा को देखकर गांधीजी ने आन्दोलन रोक दिया। 13
मार्च, 1922 को गांधीजी गिरफ्तार कर लिये गये। इस समय क्रान्तिकारियों
का उत्साह अपनी चरम सीमा पर था, अतः महात्मा गांधी के इस निर्णय
से उन्हें भारी निराशा हुई। महात्माजी के इस प्रकार के निर्णय के विरुद्ध
30 चन्द्रशेखर आजाद
में भी मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं—
"....महात्मा गांधी ने इस पर आम लोगों में अहिंसा के भाव की कमी
देखकर आन्दोलन को स्थगित कर दिया। 13 मार्च को गांधीजी भी
गिरफ्तार कर लिये गए। एक आश्चर्य की बात यह है कि जब तक
आन्दोलन जोरों से चलता रहा और गांधी जी खुल्लमखुल्ला तौर पर
उसका नेतृत्व कर रहे थे, उस समय तक उनको किसी ने नहीं पकड़ा, किन्तु
ज्यों ही आन्दोलन को बन्द कर दिया गया, त्यों ही सरकार ने उनको
पकड़ लिया। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, क्योंकि गांधीजी जिस
समय आन्दोलन चला रहे थे, उस समय वह पैंतीस करोड़ थे, किन्तु जिस
समय उन्होंने आन्दोलन स्थगित कर दिया और लोगों की बढ़ती हुई
उमंगों पर पानी फेर दिया, उनको एक खामख्याली के नाम पर निरुत्साह
कर दिया, उस समय वे एक व्यक्ति हो गये।"
श्री गुप्त के इन शब्दों में कुछ अत्युक्ति हो सकती है, किन्तु इतना
निश्चित है कि एक मामूली-सी घटना के कारण आन्दोलन को इस प्रकार
बीच में ही रोक देने से भारतीयों को विशेषकर युवा वर्ग को इससे बड़ी
निराशा हुई। गुप्तजी स्वयं एक क्रान्तिकारी रहे हैं, अतः उनके इन शब्दों
से तत्कालीन क्रान्तिकारियों के मनोभावों का सुन्दर परिचय मिलता है।
आन्दोलन के इस प्रकार बीच में ही रुक जाने पर चन्द्रशेखर आजाद को
बड़ी निराशा हुई, किन्तु उनकी यह निराशा स्थायी न होकर एक क्षणिक
आवेग मात्र थी। वह जिस मार्ग पर बढ़ चुके थे, उससे पीछे लौटने का
उनके लिए प्रश्न ही नहीं उठता था।
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) एवं काकोरी एक्शन
चन्द्रशेखर आजाद 31
गतिविधियों से अछूता नहीं रहा था। इन गतिविधियों में बंगाल के क्रान्ति-
कारियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही थी। कुछ समय के लिए क्रान्तिकारी
आन्दोलन समाप्त जैसा हो गया था। बनारस षड्यन्त्र के नेता शचीन्द्र-
नाथ सान्याल को इस षड्यन्त्र में आजन्म कालेपानी की सजा तथा अन्य
लोगों को भी अनेक प्रकार की सजाएं हुई थीं। सन् 1920 में सभी राज-
नीतिक बन्दियों को आम माफी दे दी गई थी, फलतः ये सभी क्रान्तिकारी
छूट गये। इधर असहयोग आन्दोलन के इस प्रकार बीच में ही समाप्त
हो जाने पर युवक खिन्न थे। शचीन्द्रनाथ सान्याल ने इस अवसर का लाभ
उठाया तथा पुनः क्रान्तिकारी दल का गठन किया। सान्याल का मुख्य
क्षेत्र उत्तर प्रदेश ही था। उन्होंने शीघ्र ही क्रान्तिकारी दल को सुदृढ़ बना
दिया। इन्हीं दिनों बंगाल में अनुशीलन समिति नाम की क्रान्तिकारियों
की संस्था भी कार्य कर रही थी। अनुशीलन समिति ने बनारस में कल्याण
आश्रम नाम के एक आश्रम की स्थापना भी की थी, यह आश्रम वास्तव में
समिति के सदस्य क्रान्तिकारियों का कार्यालय ही था।
क्रान्तिकारी दल तथा अनुशीलन समिति लम्बे समय तक अलग-अलग
कार्य करते रहे। दोनों के उद्देश्य तथा कार्यप्रणालियां समान थीं, अतः
बाद में ये दोनों मिलकर एक दल के रूप में कार्य करने लगे। इस संयुक्त
दल का नाम 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' रखा गया। इस एसो-
सिएशन के निम्नलिखित मुख्य उद्देश्य थे—
- संगठित क्रान्ति द्वारा गणतन्त्र स्थापित करना, जिसमें प्रान्तों को
आन्तरिक मामलों में पूर्ण स्वतन्त्रता होगी। - प्रत्येक सही सलामत मस्तिष्क वाले वयस्क नागरिक को मता-
धिकार। - शोषण रहित समाज की स्थापना।
स्पष्ट है कि ये सभी उद्देश्य साम्यवादी रूस की शासन प्रणाली से
प्रभावित थे। कुछ ही वर्ष पूर्व सन् 1917 में अक्तूबर क्रान्ति के बाद
सोवियत संघ में साम्यवाद की स्थापना हो चुकी थी। 'हिन्दुस्तान रिपब्लि-
कन एसोसिएशन' के सदस्य पूरे उत्तर प्रदेश में फैले हुए थे। शाहजहांपुर
में पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, कानपुर में सुरेश बाबू तथा बनारस में श्री
32 चन्द्रशेखर आजाद
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी तथा श्री रवीन्द्रमोहन बाग
इस दल के कार्यों को आगे बढ़ा रहे थे।
इन दिनों चन्द्रशेखर आजाद भी बनारस में प्रसिद्ध हो चुके थे, अतः
क्रान्तिकारी दल का एक सदस्य प्रणवेश उनसे मिला। आजाद से मिलकर
प्रणवेश अत्यधिक प्रभावित हुआ। इस प्रकार आजाद भी 'हिन्दुस्तान
रिपब्लिकन एसोसिएशन' के सदस्य बन गये। यहीं उनकी भेंट रामप्रसाद
बिस्मिल आदि महान् क्रान्तिकारियों से हुई और यहीं से उनके भावी
क्रान्तिकारी जीवन का एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ।
दल के संगठन में :
आजाद हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गये, तभी
दल की सदस्यता का विस्तार किया जाना निश्चित हुआ। आजाद ने इस
कार्य में बढ़-चढ़कर भाग लिया। वह ब्राह्मण के वेश में इधर-उधर घूमते
रहते तथा युवकों से मिलते और उनके विचार जानते। क्रान्तिकारी विचारों
वाले युवकों को खोजकर अपने दल का सदस्य बनाते। इस प्रकार थोड़े ही
समय में उनके प्रयत्नों से दल के सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी, किन्तु दल
के पास धन का अभाव था। यद्यपि दल की जनशक्ति में भारी वृद्धि हो गई
थी, परन्तु दल के पास साधनों की कमी थी। इस कमी को दूर करने के
लिए दल के सदस्यों की बैठकें हुईं।
चन्द्रशेखर आजाद 33
था। उसने एक नई योजना रखी। योजना इस प्रकार थी कि गाजीपुर में
निर्मले साधुओं का एक मठ था। मठ के महन्त के पास अपार धन था
और मठ की अपनी भी पर्याप्त सम्पत्ति थी। महन्त वृद्ध हो चला था और
रोगी था; आशा थी वह शीघ्र ही संसार से चल बसेगा। अतः क्रान्ति-
कारियों के दल के किसी सदस्य को महन्त का शिष्य बनाना था, जिससे
महन्त के मरने के बाद महन्त तथा मठ की सम्पत्ति क्रान्तिकारियों के काम
आ सके। इस समय महन्त को किसी शिष्य की आवश्यकता भी थी। दल
के सभी सदस्यों ने इस कार्य के लिए चन्द्रशेखर आजाद को ही उपयुक्त
समझा। उन्हें पूरा विश्वास था कि महन्त उन्हें देखकर अवश्य अपना
शिष्य बना लेगा। इस कार्य के लिए सबने एक स्वर से चन्द्रशेखर आजाद
का नाम प्रस्तावित किया, किन्तु चन्द्रशेखर आजाद इससे सहमत नहीं हुए।
वह इसे पाखण्ड और धोखा समझते थे, किन्तु दल को धन की अत्यन्त
आवश्यकता थी, अतः इसे देखते हुए और साथियों के दबाव के कारण उन्हें
यह बात माननी पड़ी।
महन्त के शिष्य के रूप में :
पूरी योजना बनाकर ब्रह्मचारी साधु के रूप में आजाद गाजीपुर के
उक्त मठ में पहुँच गये। माथे पर चन्दन, गेरुआ परिधान, रुद्राक्ष की
मालाएँ उनके व्यक्तित्व को एक अनोखी भव्यता प्रदान कर रही थीं। वैसे
भी उनकी देह सुन्दर-सुदर्शन एवं आकर्षक थी। अपने व्यक्तिगत जीवन में
भी वह ब्रह्मचारी थे। महन्त के पास जाकर उन्होंने उसका शिष्य बनने की
इच्छा व्यक्त की। महन्त उनके मनमोहक व्यक्तित्व एवं बलिष्ठ शरीर को
देखकर तुरन्त सहमत हो गया। वह महन्त के शिष्य बन गये। उनकी सेवा
से बीमार महन्त धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा।
निर्मले साधु सिख होते हैं, जो 'गुरु ग्रन्थ साहिब' की उपासना करते
हैं। यहाँ रहकर आजाद ने गुरुमुखी लिपि तथा पंजाबी भाषा का भी
अध्ययन किया, क्योंकि मठ का महन्त बनने के लिए यह आवश्यक था।
यद्यपि मठ में किसी प्रकार का कोई भी अभाव नहीं था, फिर भी
आजाद तो ... कि उन्हें यहाँ ऐसा बन्दी जीवन जैसा लगने लगा।
34 चन्द्रशेखर आजाद
कहाँ एक क्रान्तिकारी युवक; कहाँ मठ का जीवन ! उनकी स्थिति पिंजरे
में बन्द शेर के समान हो गई। केवल दो महीनो में ही वह इस जीवन से
ऊब गये। उनकी सहन-शक्ति जवाब देने लगी। वे तो यह समझकर आये
थे कि महन्त बीमार है, इसलिए जल्द ही चल बसेगा, किन्तु यहाँ उल्टा ही
हो रहा था; मरने की तो बात ही दूर, वह और भी अधिक तगड़ा हो गया
था। अतः इस सम्बन्ध में अपने साथियों को एक पत्र लिखा- "महन्त के
मरने के कोई आसार नजर नही आ रहे हैं। आपका अनुमान सही नहीं
था; वह दिन पर दिन मोटा होता जा रहा है। मठ की सम्पत्ति हाथ में
आयेगी, हमें यह आशा छोड़ देनी चाहिए। मुझे इस बन्धन से मुक्त होने
की आज्ञा दो।"
पत्र दल के लोगों को मिला, वे किसी भी कीमत पर मठ की सम्पत्ति
को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे। अतः पत्र मिलते ही दो और सदस्य
गोविन्दप्रकाश तथा मन्मथनाथ गुप्त साधु वेश में गाजीपुर पहुँचे। गोविन्द-
प्रकाश गुरु तथा मन्मथनाथ गुप्त चेला बने थे। दोनों मठ में पहुँचे और
पहले महन्त से मिले तथा फिर चन्द्रशेखर आजाद से। फिर वे मठ के अंदर
में घूमे-फिरे। मठ एक किले की तरह था। चारों ओर ऊँची-ऊँची दीवारें
थीं। उन्होंने मठ की सम्पत्ति को भी देखा। मठ दल के कार्यक्रमों के लिए
पूर्णतया उपयुक्त जगह थी। उसकी सम्पत्ति दल को सुदृढ़ बनाने के काम
आ सकती थी। गोविन्द प्रकाश तथा मन्मथनाथ गुप्त ने इस पर सब प्रकार
से विचार किया और उन्होंने आजाद को वहीं बने रहने का परामर्श दिया।
आजाद इसे मान ही नहीं रहे थे, परन्तु दोनों साथियों ने उनपर इतना दबाव
डाला कि उनकी एक भी न चलने दी। तब विवश होकर आजाद को
उनकी बात माननी पड़ी। गोविन्द प्रकाश तथा मन्मथनाथ दोनों वापस
चले गये।
विवशता में लिये गए निर्णय पर दृढ़ रहना सरल नहीं होता। यद्यपि
उस समय चन्द्रशेखर आजाद ने अपने साथियों के दबाव में आकर मठ में
बने रहने की बात स्वीकार कर ली थी, किन्तु उनका मन उस मठ
में नहीं लग सका। उनके लिए यहाँ रहना असम्भव हो गया। अतः एक
दिन महन्त को बताए बिना आजाद चुपचाप इस बन्धन से आजाद हो गये
चन्द्रशेखर आजाद 35
और साथियों के पास बनारस पहुँच गये।
आजाद के इस प्रकार मठ को छोड़कर चले आने से उनके साथियों
को बड़ी निराशा हुई। उन्हें लगा कि हाथ में आया खजाना चला गया है।
दल के पास धन की कमी के कारण उसका काम भी आगे नहीं बढ़ सकता
था। अब आजाद पुनः दल के संगठन में जुट गये। यद्यपि उनके कठोर
परिश्रम से धन की कमी कुछ दूर हुई, किन्तु इससे कुछ नहीं हो सकता था,
अतः उन्होंने कुछ नई योजनाओं पर विचार किया।
दल के लिए ऋण और चन्दे :
'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' ने धन एकत्रित करने का
उत्तरदायित्व मुख्य रूप से चन्द्रशेखर आजाद को सौंपा। आजाद तत्परता
से इस काम में जुट गये। उनका व्यक्तित्व बड़ा ही मनमोहक था तथा वह
बातचीत करने की कला में भी कुशल थे, अतः जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क
में आता, उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। कदाचित् उनके इन्हीं
गुणों से पण्डित मोतीलाल नेहरू भी प्रभावित थे। इतिहास की पुस्तकों में
लिखा मिलता है कि विभिन्न राजनीतिक काण्डों में फरार हो जाने पर भी
आजाद उनसे मिलते रहते थे तथा आर्थिक सहायता प्राप्त करते रहते थे।
पण्डित मोतीलाल नेहरू दल को यदा-कदा चन्दा देते रहते थे। राजर्षि
पुरुषोत्तमदास टण्डन सदा ही मुक्तहस्त से क्रान्तिकारियों को आर्थिक
सहायता देते रहते थे। प्रसिद्ध साहित्यकार शरत्चन्द्र कलकत्ता के अटार्नी
जनरल निर्मलचन्द्र तथा वहीं के एडवोकेट जनरल सर एन० एन० सरकार
आदि महानुभाव भी इन क्रान्तिकारियों को नियमित रूप से चन्दा देते
रहते थे। दल की सदस्य संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही थी, फलस्वरूप
खर्चे भी बढ़ते जा रहे थे। धन के अभाव में आजाद तथा उनके साथियों
को भयंकर तंगी का सामना करना पड़ता था। कभी-कभी तो हालात ऐसे
भी हो जाते कि सभी को भूखों रह जाना पड़ता। भयंकर सर्दी में साधारण
कपड़ों से ही गुजारा करना पड़ता था। इन अभावों के होते हुए भी इन
वीरों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई; मातृभूमि की स्वतन्त्रता के कार्य
को वे अनवरत रूप में आगे बढ़ाते रहे। इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए,
चन्द्रशेखर आजाद
36
आजाद ने अपने मित्रों से कई बार ऋण भी लिया था। यहाँ उनके जीवन
की इसी प्रकार की कुछ घटनाओं का वर्णन किया जा रहा है, जिनसे दल
के प्रति उनके निःस्वार्थ प्रेम का परिचय प्राप्त होता है। कहा जाता है एक
बार दल के सामने धन की परम आवश्यकता थी; क्योंकि पिस्तोलें खरी-
दनी थी। क्या किया जाए? आजाद इसी चिन्ता मे डूबे हुए थे। दोपहर
के समय एक व्यक्ति उनके पास आया। उसने बताया कि उनके (आजाद
के) माता-पिता घर में भूखो मर रहे हैं। उनके लिए वह व्यक्ति इधर-उधर
से माँगकर किसी तरह कुछ रुपये लाया था। उसने ये रुपये चन्द्रशेखर
आजाद को दे दिये, ताकि वह इन्हें अपने माता-पिता के पास भिजवा दें।
रुपये मिलने पर आजाद ने उस व्यक्ति का आभार प्रकट किया और
इसे ईश्वर की सहायता मानते हुए उस व्यक्ति से कुछ इस तरह की बात
की—
"इन रुपयों के लिए मैं तुम्हारा आभार प्रकट करता हूँ। इस समय
दल को इनकी बहुत बड़ी आवश्यकता थी। ईश्वर की कृपा से तुम सही
समय पर आ गये।"
आजाद की इन बातों को सुनकर, वह व्यक्ति बड़ा हैरान हुआ और
बोला, "पण्डितजी! मैंने यह पैसा आपके माता-पिता की सहायता के लिए
दिया है। वे भूखों मर रहे हैं, पर समझ में नहीं आता, आप इस पैसे को
दल के लिए खर्च करना चाहते हैं।"
इस पर आजाद बोले, "भैया, देश के करोड़ों लोग भूखों मर रहे हैं,
मुझे केवल अपने ही माता-पिता की नहीं, अपितु पूरे देश की चिन्ता है।
इसके लिए इस समय पिस्तोल खरीदना नितान्त आवश्यक है। देश की
ऐसी स्थिति में केवल अपने परिवार की चिन्ता करना स्वार्थ मात्र है।"
उनके इस उत्तर ने उस व्यक्ति को निरुत्तर कर दिया और वह लौट
गया।
इसी प्रकार एक बार फिर दल को रुपयों की अत्यन्त आवश्यकता थी।
दल के अध्यक्ष ने यह समस्या आजाद के समक्ष रखी और उन्हें बताया कि
दल को तुरन्त चार हजार रुपयों की आवश्यकता थी। यदि यह पैसा न
... का काम रुक जाएगा। समस्या के महत्व पर विचार करके
चन्द्रशेखर आजाद 37
आजाद गम्भीर हो गये, किन्तु विपत्ति से घबराना उन्हींने सीखा ही नहीं
था। उन्होंने पैसों का प्रबन्ध करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया
और अध्यक्ष से निश्चिन्त रहने को कह दिया। उनका एक मित्र था, जो
रुपयों के लेन-देन का कार्य करता था। वह आजाद का बड़ा सम्मान करता
था। आजाद उसी के पास पहुंचे। उन्होंने मित्र के सामने अपनी समस्या
रखी। और बताया कि उन्हें तत्काल चार हजार रुपयों की आवश्यकता
थी, किन्तु उस समय उस मित्र के पास भी रुपये नहीं थे। उसने दूसरे दिन
रुपयों का प्रबन्ध कर देने की बात कही, परन्तु चन्द्रशेखर आजाद अपने
दल के अध्यक्ष को उसी दिन पैसे देने का वचन दे चुके थे। अतः उन्होंने
मित्र से कहा कि उन्हें तत्काल रुपयों की आवश्यकता थी। वह कहीं से भी
प्रबन्ध कर दे और वायदा किया कि रुपया छः महीने बाद ब्याज सहित
लौटा दिया जायेगा। मित्र भी बड़ी दुविधा में पड़ गया। इसके बाद उनके
उस मित्र ने किसी दूसरे व्यक्ति से चार हजार रुपये कर्ज लेकर उन्हें दे
दिये।
इस प्रकार चन्द्रशेखर आजाद दल की आवश्यकता के लिए किसी
प्रकार कर्ज लेकर भी रुपयों का प्रबन्ध कर देते थे। चन्द्रशेखर आजाद तथा
उनके सभी साथी बड़ी ही निर्धनता की स्थिति में जीवन का निर्वाह करते,
किन्तु दल के पैसों का हिसाब बड़ी सावधानी और ईमानदारी से रखा
जाता। एक पैसे का भी अपव्यय नहीं किया जाता।
दुकान में मुनीमगीरी :
चन्द्रशेखर आजाद
38
मिलता था, उसमें से थोड़ी-सी राशि अपने पास रखकर शेष रुपये वह दल
को दे देते थे।
इस प्रकार आजाद का पूरा जीवन ही दल के लिए समर्पित था। दल
की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए वह निरन्तर प्रयत्न करते रहते
थे। यही नहीं दल का प्रत्येक कार्य करने में वे सदा आगे रहते थे, इसीलिए
दल में उन्हें 'क्विक सिल्वर' अर्थात् पारा कहा जाता था।
क्रान्ति का पर्चा :
धीरे-धीरे 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' की शाखाएँ उत्तरी
भारत में कलकत्ता से लेकर लाहौर तक फैल गईं। इसका केन्द्र बनारस
था। हथियार एकत्रित करने का कार्य रामप्रसाद बिस्मिल का था। सभी
हथियार बनारस में इकट्ठा करके विभिन्न केन्द्रों को भेजे जाने थे, किन्तु
बन्दूक, रिवाल्वर आदि अनेक प्रकार के हथियारों को एक स्थान से दूसरे
स्थान तक ले जाना कोई आसान कार्य नहीं था। इन्हें प्रथम या द्वितीय श्रेणी
के डिब्बों में ही ले जाया जा सकता था। अनेक कठिनाइयों के बाद भी ये
हथियार विभिन्न केन्द्रों पर भिजवा दिये गए। इस प्रकार दल के विभिन्न
केन्द्रों पर हथियारों का अच्छा खासा भण्डार जमा हो गया था। अब दल
ने सरकार को चेतावनी देने की सोची।
एक योजना बनी, जिसके अनुसार एक पर्चा छपवाया गया। इस पर्चे
में दल के उद्देश्यों का परिचय दिया गया था तथा जनता से अंग्रेजी सरकार
के विरुद्ध क्रान्ति कर देने की अपील की गई थी। यह पर्चा पीले कागज पर
था। योजना के अनुसार इस बात पर भलीभाँति विचार कर लिया गया
कि पर्चा सभी शहरों में एक ही दिन लगाया जाए। ऐसा न करने पर पुलिस
सावधान हो जाती और पर्चे जब्त कर लिये जाते। इससे जनता दल के
उद्देश्यों से परिचित नहीं हो पाती। अतः जनवरी, 1925 में एक दिन रंगून
से लेकर पेशावर तक लोगों ने इन पर्चों को एक साथ देखा। दल के सदस्य
इन पर्चों को लेकर स्वयं सभी शहरों में गए थे। प्रत्येक स्कूल, कालेज,
दफ्तर, बाजार, मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वार, सिनेमाघर तथा
अन्य सभी सार्वजनिक स्थानों पर ये पर्चे बिखरे हुए पाये गए। य...
चन्द्रशेखर आजाद 39
इतनी सावधानी एवं गोपनीयता के साथ किया गया कि किसी को इसका
पता भी न लग पाया ।
बनारस में पर्चे चिपकाने तथा बांटने का काम चन्द्रशेखर आजाद ने
किया था। उन्होंने बड़ी चतुरता से कार्यालयों के कर्मचारियों को भी अपनी
ओर मिलाकर उन्हीं के हाथो पर्चे बँटवा दिये। दल मे उनके इस कार्य की
सराहना की गई।
इस कार्य से क्रान्तिकारी दल देश-भर में प्रसिद्ध हो गया। किसी ने
सपने में भी यह नहीं सोचा था कि दल का विस्तार इतना अधिक है।
इससे सरकार चिन्ता मे पड़ गई। पुलिस तथा गुप्तचर विभाग दल की
खोज में जी-जान से जुट गए।
तृतीय अध्याय
साध्य और साधना
प्रारम्भ में क्रान्ति शब्द का अर्थ ही हिंसा के माध्यम से सत्ता-परिवर्तन
करना था, भले ही आज क्रान्ति शब्द अन्य अर्थों में भी प्रयुक्त होने लगा है,
जैसे हरित क्रान्ति अथवा औद्योगिक क्रान्ति इत्यादि। अतः क्रान्ति पथ के
पथिकों के लिए अपना साध्य देश को स्वतन्त्र कराना ही सर्वोपरि था।
इसमें साधनों की पवित्रता पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था। भारत
ही नहीं आयरलैण्ड एवं सोवियत संघ के क्रान्तिकारियों ने भी अपने साध्य
के लिए हिंसक साधनों को अपनाया था। इन क्रान्तिकारियों के पास आय
के कोई साधन तो थे नहीं, अपने लक्ष्य पर आगे बढ़ने के लिए इन्हें धन की
आवश्यकता पड़ती थी, जिसके लिए चन्दा माँगने पर भी धन का अभाव
अथवा कमी बनी रहती थी, अतः विवशता के कारण इन्हें डाके भी डालने
पड़ते थे।
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही बंगाल के क्रान्तिकारियों ने क्रान्ति
के लिए डकैतियों को अपनी कार्यप्रणाली का अंग बना लिया था। बंगाल
के एक प्रसिद्ध पत्र युगान्तर के एक लेख से इस बात का परिचय मिलता है
कि पवित्र साध्य के लिए डकैतियों को क्रान्तिकारी अनुचित नहीं समझते
थे।
चन्द्रशेखर आजाद 41
की आवश्यकता होती है, उसे प्राप्त करने हेतु आरम्भ मे देशवासियो पर
डकैती डालनी होगी। यह तो स्पष्ट है कि धनी इसमें पैसा नही देंगे। बाद
मे श्री अरविन्द घोष ने समझाया कि स्वतन्त्रता के लिए डकैती करने मे
जिस राजनीतिक दोष की कल्पना की जाती है, वह पूर्णतया निराधार है।
अन्त मे रंगपुर के एक प्रतिनिधि ने कहा कि हम लोग डकैती करके जो-कुछ
भी लाएं, उसका सही-सही हिसाब रखा जाए और स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद
जिनसे जो-कुछ लिया जाए, वह उन्हे ठीक-ठीक लौटा दिया जाए। इस
प्रस्ताव का अरविन्द घोष ने समर्थन किया और यह पास हो गया।"
ये क्रान्तिकारी इस नियम का पूर्णरूप से पालन करते थे। लूटे गये
व्यक्ति के घर उनसे लूटे गये धन की रसीद भेज दी जाती थी। सन् 1916
मे कलकत्ता के गोपोराय क्षेत्र मे एक डकैती हुई थी। इस डकैती का नेतृत्व
श्री अतुल्य घोष एवं श्री पुलिन बनर्जी ने किया था। बाद मे लूटे गये घर
के स्वामी के लिए एक पत्र भेजा गया था, जिसमे लिखा था—"हमारे
कोष मे आपके हिसाब मे 9891 रु० 5 पाई दिये गए कर्ज के रूप मे जमा
हुए हैं। स्वतन्त्रता मिलने पर इस धन को व्याज सहित लौटा दिया
जाएगा।"
इन डाको के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए श्री मन्मथनाथ गुप्त
अपनी पुस्तक 'भगतसिंह और उनका युग' मे इसी प्रकार के विचार प्रकट
करते हैं। उनका आशय है, "क्रान्तिकारी अपने घरो से भी दल के लिए
गहने चुराते थे। बंगाल मे एक क्रान्तिकारी ने अपने घर डाका डलवाया
था। पैसे का हिसाब बड़े ध्यान से रखा जाता था। चन्द्रशेखर आदि सभी
बड़ी गरीबी से जीवन बसर करते थे। ...आयरलैण्ड और रूस के क्रान्ति-
कारियों द्वारा भी डाके डाले गए। स्टालिन भी बाकू के पास डाली गई
डकैती मे शामिल थे। इंगलैण्ड मे सोवियत संघ के प्रथम राजदूत क्रासिन
भी डकैतियो मे शामिल हुए थे। इसे विदेशी क्रान्तिकारी जबरदस्ती वसूल
किया गया चंदा कहते थे। सिडीशन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार एक
डकैती डालने पर क्रान्तिकारियों ने रसीद छोड़ दी थी—इतनी रकम ली
गई है। भारत स्वतन्त्र होने पर कर्जा अदा कर दिया जाएगा।
क्रान्तिकारियो के समक्ष धन की समस्या सदा बनी रही। चन्द्रशेखर
42 चन्द्रशेखर आजाद
आजाद जब क्रांतिकारी दल में शामिल हुए, तो दल का सदस्य होने के
कारण उन्हें भी इस समस्या का सामना करना पड़ा। इस समस्या के कारण
दल के सदस्यों को भोजन एवं वस्त्र-जैसी सामान्य आवश्यकताओं के लिए
भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। कभी-कभी तो सदस्यों के
लिए भोजन का प्रबन्ध करना भी कठिन हो जाता था। यहाँ तक कि कभी-
कभी भोजन न मिलने पर क्रांतिकारियों को भिखारियों के लिए खोले गए
लंगरों में जाकर अपनी भूख शान्त करनी पड़ती थी, किन्तु आजाद को इन
जगहों पर भोजन करना बड़ा ही अपमानजनक लगता था। इसके साथ ही
अन्य अनेक आवश्यकताएँ भी दल के सामने थीं। इन सब समस्याओं के
निराकरण हेतु अमीर लोगों के यहाँ डाके डालने की योजना बनी।
दल के कार्यों के लिए डकैतियां :
अन्य कोई रास्ता न देखकर दल ने डाके डालने आरम्भ कर दिये।
पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल डकैतियों में दल का नेतृत्व करते थे। दल की
ओर से इस प्रकार का पहला डाका प्रतापगढ़ के पास एक गाँव में मुखिया
के घर डाला गया। रामप्रसाद अपने साथियों को लेकर डाका डालने के
लिए चल पड़े। गाँव के बाहर गाँव के ही कुछ लोगों से उनकी मुलाकात
हुई। गाँव के लोगों ने उनसे पूछा कि वे कहाँ जा रहे थे। इस पर उन्हें
बताया गया कि दल के लोगों को गाँव के मुखिया के यहाँ दावत पर बुलाया
गया था।
चन्द्रशेखर आजाद भी इस डकैती में शामिल थे। मुखिया के घर
पहुँचने पर डाका डालने से पहले बिस्मिल ने अपने साथियों को निर्देश
दिया कि "दल का उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना है; किसी की हत्या
करना नहीं। अतः केवल धन ही लूटा जाए और इस बात का ध्यान रहे
कि किसी महिला के साथ कोई भी किसी प्रकार का अभद्र व्यवहार न
करे।" साथी घर के अन्दर घुस गए और रामप्रसाद बिस्मिल स्वयं हाथ में
पिस्तौल लेकर बाहर खड़े रहे, ताकि यदि कोई व्यक्ति बाहर से मदद के
लिए आये, तो उसे अन्दर न जाने दिया जाए।
दल के लोग अन्दर लूटपाट करने लगे। घर में चीख-पुकार मच गई।