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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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चन्द्रशेखर आजाद 35
और साथियों के पास बनारस पहुँच गये।
आजाद के इस प्रकार मठ को छोड़कर चले आने से उनके साथियों
को बड़ी निराशा हुई। उन्हें लगा कि हाथ में आया खजाना चला गया है।
दल के पास धन की कमी के कारण उसका काम भी आगे नहीं बढ़ सकता
था। अब आजाद पुनः दल के संगठन में जुट गये। यद्यपि उनके कठोर
परिश्रम से धन की कमी कुछ दूर हुई, किन्तु इससे कुछ नहीं हो सकता था,
अतः उन्होंने कुछ नई योजनाओं पर विचार किया।
दल के लिए ऋण और चन्दे :
'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' ने धन एकत्रित करने का
उत्तरदायित्व मुख्य रूप से चन्द्रशेखर आजाद को सौंपा। आजाद तत्परता
से इस काम में जुट गये। उनका व्यक्तित्व बड़ा ही मनमोहक था तथा वह
बातचीत करने की कला में भी कुशल थे, अतः जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क
में आता, उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। कदाचित् उनके इन्हीं
गुणों से पण्डित मोतीलाल नेहरू भी प्रभावित थे। इतिहास की पुस्तकों में
लिखा मिलता है कि विभिन्न राजनीतिक काण्डों में फरार हो जाने पर भी
आजाद उनसे मिलते रहते थे तथा आर्थिक सहायता प्राप्त करते रहते थे।
पण्डित मोतीलाल नेहरू दल को यदा-कदा चन्दा देते रहते थे। राजर्षि
पुरुषोत्तमदास टण्डन सदा ही मुक्तहस्त से क्रान्तिकारियों को आर्थिक
सहायता देते रहते थे। प्रसिद्ध साहित्यकार शरत्चन्द्र कलकत्ता के अटार्नी
जनरल निर्मलचन्द्र तथा वहीं के एडवोकेट जनरल सर एन० एन० सरकार
आदि महानुभाव भी इन क्रान्तिकारियों को नियमित रूप से चन्दा देते
रहते थे। दल की सदस्य संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही थी, फलस्वरूप
खर्चे भी बढ़ते जा रहे थे। धन के अभाव में आजाद तथा उनके साथियों
को भयंकर तंगी का सामना करना पड़ता था। कभी-कभी तो हालात ऐसे
भी हो जाते कि सभी को भूखों रह जाना पड़ता। भयंकर सर्दी में साधारण
कपड़ों से ही गुजारा करना पड़ता था। इन अभावों के होते हुए भी इन
वीरों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई; मातृभूमि की स्वतन्त्रता के कार्य
को वे अनवरत रूप में आगे बढ़ाते रहे। इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए,