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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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चन्द्रशेखर आजाद 27
उनका प्रेम और भी दृढ़ हो गया। इस सम्बन्ध में श्री मन्मथनाथ गुप्त
अपनी पुस्तक 'भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास' में लिखते
हैं—
"आजाद ने मजिस्ट्रेट के सामने चुनौती दी। आजाद ने ठीक ही
कहा था कि कुशासन में आजाद लोगों का स्थान जेलखाना ही होता है।
खरेघाट ने सोचा कि यह बालक है, इसे ऐसी सजा देनी चाहिए, जिससे
कि इसे कुछ सबक हो और यह इन बातों को छोड़कर पढ़ने-लिखने में
लगे। इसके अनुसार उन्हें पन्द्रह बेंत मारने की सजा दी गई। जेल में ले
जाकर उन्हें बेंत लगाये गये। पर एक-एक बेंत मारा जाता था और वे
पहले से अधिक जोर से 'महात्मा गांधी की जय' बोलते थे। उन दिनों
'महात्मा गांधी की जय' का नारा भारत की युद्धयात्रा का नारा था।"
वास्तव में स्वतन्त्रता शरीर की नहीं मन की होती है। व्यक्ति के
शरीर को बन्दी बनाया जा सकता है, मन को नहीं। सच्चे स्वतन्त्रता प्रेमी
अत्याचारी शासन के लिए आँखों की किरकिरी बन जाते हैं, अतः उनका
जीवन अधिकतर कारागारों में ही बीतता है। ब्रिटिश शासन में सभी
देशप्रेमियों का घर जेल में ही बन गया था, इसलिए चन्द्रशेखर से जब
मजिस्ट्रेट ने उनके घर के विषय में पूछा तो उन्होंने जेल को ही अपना घर
बताया। उनके इस उत्तर में गम्भीर अर्थ छिपा था जो सरकार के अत्या-
चारों की ओर संकेत करता था।
इस घटना ने किशोर अवस्था में ही चन्द्रशेखर को एक लोकप्रिय नेता
के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। यद्यपि यह सजा क्रूर अवश्य थी, फिर भी इसे
कोई भारी सजा नहीं कहा जा सकता, किन्तु यह घटना उनके भावी
क्रान्तिकारी जीवन के लिए प्रथम सोपान थी। इस दृष्टि से यह एक
महत्वपूर्ण घटना है और इसी घटना के बाद वह चन्द्रशेखर से चन्द्रशेखर
आजाद बने थे; वीर चन्द्रशेखर आजाद।
उनकी बेंतों की सजा का यह समाचार उनके घर वालों तक पहुँच
गया, क्योंकि यह समाचार देश के सभी समाचार-पत्रों में छपा था।
समाचार को पढ़कर उनके घर के लोग अत्यन्त चिन्तित हुए। पिता
श्री सीताराम तिवारी सीधे बनारस पहुँचे। उन्होंने पुत्र को अनेक प्रकार