अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 148 में से
संदर्भ में पढ़ें34 चन्द्रशेखर आजाद
कहाँ एक क्रान्तिकारी युवक; कहाँ मठ का जीवन ! उनकी स्थिति पिंजरे
में बन्द शेर के समान हो गई। केवल दो महीनो में ही वह इस जीवन से
ऊब गये। उनकी सहन-शक्ति जवाब देने लगी। वे तो यह समझकर आये
थे कि महन्त बीमार है, इसलिए जल्द ही चल बसेगा, किन्तु यहाँ उल्टा ही
हो रहा था; मरने की तो बात ही दूर, वह और भी अधिक तगड़ा हो गया
था। अतः इस सम्बन्ध में अपने साथियों को एक पत्र लिखा- "महन्त के
मरने के कोई आसार नजर नही आ रहे हैं। आपका अनुमान सही नहीं
था; वह दिन पर दिन मोटा होता जा रहा है। मठ की सम्पत्ति हाथ में
आयेगी, हमें यह आशा छोड़ देनी चाहिए। मुझे इस बन्धन से मुक्त होने
की आज्ञा दो।"
पत्र दल के लोगों को मिला, वे किसी भी कीमत पर मठ की सम्पत्ति
को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे। अतः पत्र मिलते ही दो और सदस्य
गोविन्दप्रकाश तथा मन्मथनाथ गुप्त साधु वेश में गाजीपुर पहुँचे। गोविन्द-
प्रकाश गुरु तथा मन्मथनाथ गुप्त चेला बने थे। दोनों मठ में पहुँचे और
पहले महन्त से मिले तथा फिर चन्द्रशेखर आजाद से। फिर वे मठ के अंदर
में घूमे-फिरे। मठ एक किले की तरह था। चारों ओर ऊँची-ऊँची दीवारें
थीं। उन्होंने मठ की सम्पत्ति को भी देखा। मठ दल के कार्यक्रमों के लिए
पूर्णतया उपयुक्त जगह थी। उसकी सम्पत्ति दल को सुदृढ़ बनाने के काम
आ सकती थी। गोविन्द प्रकाश तथा मन्मथनाथ गुप्त ने इस पर सब प्रकार
से विचार किया और उन्होंने आजाद को वहीं बने रहने का परामर्श दिया।
आजाद इसे मान ही नहीं रहे थे, परन्तु दोनों साथियों ने उनपर इतना दबाव
डाला कि उनकी एक भी न चलने दी। तब विवश होकर आजाद को
उनकी बात माननी पड़ी। गोविन्द प्रकाश तथा मन्मथनाथ दोनों वापस
चले गये।
विवशता में लिये गए निर्णय पर दृढ़ रहना सरल नहीं होता। यद्यपि
उस समय चन्द्रशेखर आजाद ने अपने साथियों के दबाव में आकर मठ में
बने रहने की बात स्वीकार कर ली थी, किन्तु उनका मन उस मठ
में नहीं लग सका। उनके लिए यहाँ रहना असम्भव हो गया। अतः एक
दिन महन्त को बताए बिना आजाद चुपचाप इस बन्धन से आजाद हो गये