अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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मिलता था, उसमें से थोड़ी-सी राशि अपने पास रखकर शेष रुपये वह दल
को दे देते थे।
इस प्रकार आजाद का पूरा जीवन ही दल के लिए समर्पित था। दल
की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए वह निरन्तर प्रयत्न करते रहते
थे। यही नहीं दल का प्रत्येक कार्य करने में वे सदा आगे रहते थे, इसीलिए
दल में उन्हें 'क्विक सिल्वर' अर्थात् पारा कहा जाता था।
क्रान्ति का पर्चा :
धीरे-धीरे 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' की शाखाएँ उत्तरी
भारत में कलकत्ता से लेकर लाहौर तक फैल गईं। इसका केन्द्र बनारस
था। हथियार एकत्रित करने का कार्य रामप्रसाद बिस्मिल का था। सभी
हथियार बनारस में इकट्ठा करके विभिन्न केन्द्रों को भेजे जाने थे, किन्तु
बन्दूक, रिवाल्वर आदि अनेक प्रकार के हथियारों को एक स्थान से दूसरे
स्थान तक ले जाना कोई आसान कार्य नहीं था। इन्हें प्रथम या द्वितीय श्रेणी
के डिब्बों में ही ले जाया जा सकता था। अनेक कठिनाइयों के बाद भी ये
हथियार विभिन्न केन्द्रों पर भिजवा दिये गए। इस प्रकार दल के विभिन्न
केन्द्रों पर हथियारों का अच्छा खासा भण्डार जमा हो गया था। अब दल
ने सरकार को चेतावनी देने की सोची।
एक योजना बनी, जिसके अनुसार एक पर्चा छपवाया गया। इस पर्चे
में दल के उद्देश्यों का परिचय दिया गया था तथा जनता से अंग्रेजी सरकार
के विरुद्ध क्रान्ति कर देने की अपील की गई थी। यह पर्चा पीले कागज पर
था। योजना के अनुसार इस बात पर भलीभाँति विचार कर लिया गया
कि पर्चा सभी शहरों में एक ही दिन लगाया जाए। ऐसा न करने पर पुलिस
सावधान हो जाती और पर्चे जब्त कर लिये जाते। इससे जनता दल के
उद्देश्यों से परिचित नहीं हो पाती। अतः जनवरी, 1925 में एक दिन रंगून
से लेकर पेशावर तक लोगों ने इन पर्चों को एक साथ देखा। दल के सदस्य
इन पर्चों को लेकर स्वयं सभी शहरों में गए थे। प्रत्येक स्कूल, कालेज,
दफ्तर, बाजार, मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वार, सिनेमाघर तथा
अन्य सभी सार्वजनिक स्थानों पर ये पर्चे बिखरे हुए पाये गए। य...