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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

चन्द्रशेखर आजाद 33
था। उसने एक नई योजना रखी। योजना इस प्रकार थी कि गाजीपुर में
निर्मले साधुओं का एक मठ था। मठ के महन्त के पास अपार धन था
और मठ की अपनी भी पर्याप्त सम्पत्ति थी। महन्त वृद्ध हो चला था और
रोगी था; आशा थी वह शीघ्र ही संसार से चल बसेगा। अतः क्रान्ति-
कारियों के दल के किसी सदस्य को महन्त का शिष्य बनाना था, जिससे
महन्त के मरने के बाद महन्त तथा मठ की सम्पत्ति क्रान्तिकारियों के काम
आ सके। इस समय महन्त को किसी शिष्य की आवश्यकता भी थी। दल
के सभी सदस्यों ने इस कार्य के लिए चन्द्रशेखर आजाद को ही उपयुक्त
समझा। उन्हें पूरा विश्वास था कि महन्त उन्हें देखकर अवश्य अपना
शिष्य बना लेगा। इस कार्य के लिए सबने एक स्वर से चन्द्रशेखर आजाद
का नाम प्रस्तावित किया, किन्तु चन्द्रशेखर आजाद इससे सहमत नहीं हुए।
वह इसे पाखण्ड और धोखा समझते थे, किन्तु दल को धन की अत्यन्त
आवश्यकता थी, अतः इसे देखते हुए और साथियों के दबाव के कारण उन्हें
यह बात माननी पड़ी।
महन्त के शिष्य के रूप में :
पूरी योजना बनाकर ब्रह्मचारी साधु के रूप में आजाद गाजीपुर के
उक्त मठ में पहुँच गये। माथे पर चन्दन, गेरुआ परिधान, रुद्राक्ष की
मालाएँ उनके व्यक्तित्व को एक अनोखी भव्यता प्रदान कर रही थीं। वैसे
भी उनकी देह सुन्दर-सुदर्शन एवं आकर्षक थी। अपने व्यक्तिगत जीवन में
भी वह ब्रह्मचारी थे। महन्त के पास जाकर उन्होंने उसका शिष्य बनने की
इच्छा व्यक्त की। महन्त उनके मनमोहक व्यक्तित्व एवं बलिष्ठ शरीर को
देखकर तुरन्त सहमत हो गया। वह महन्त के शिष्य बन गये। उनकी सेवा
से बीमार महन्त धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा।
निर्मले साधु सिख होते हैं, जो 'गुरु ग्रन्थ साहिब' की उपासना करते
हैं। यहाँ रहकर आजाद ने गुरुमुखी लिपि तथा पंजाबी भाषा का भी
अध्ययन किया, क्योंकि मठ का महन्त बनने के लिए यह आवश्यक था।
यद्यपि मठ में किसी प्रकार का कोई भी अभाव नहीं था, फिर भी
आजाद तो ... कि उन्हें यहाँ ऐसा बन्दी जीवन जैसा लगने लगा।