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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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पृष्ठ 34

द्वितीय अध्याय
क्रान्ति की ओर
पूर्वकथित बनारस की घटना के बाद वीर चन्द्रशेखर आजाद के
चरण स्वतन्त्रता आन्दोलन की ओर बढ़ते गये। वे पूर्णतया देशभक्ति के
रंग में रंग गये; पढ़ाई से उनका मन उठ गया, वे अपने विद्यालय के
साथियों को भी देश की स्वतन्त्रता के आन्दोलन में भाग लेने के लिए
तैयार करने लगे। आजादी प्राप्त करना ही आजाद का लक्ष्य बन गया।
आन्दोलन की वापसी : आजाद की निराशा.
असहयोग आन्दोलन ने चन्द्रशेखर आजाद को एक नई दिशा दिखाई
थी, वह भारत की स्वतन्त्रता के सपने देखने लगे थे। इसके लिए उनके
मन में कुछ करने की तमन्नाएँ थीं, किन्तु अगले ही वर्ष चौरीचौरा की
घटना के कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया।
घटना इस प्रकार घटी कि असहयोग आन्दोलन पूरे जोरों से चल रहा था,
कई आन्दोलनकारी जेलों में बन्द कर दिये गए थे। यह आन्दोलन पूरी
तरह अहिंसात्मक था। गोरखपुर के पास चौरीचौरा नामक स्थान पर
पुलिस के अत्याचारों से आन्दोलनकर्ता अपना आपा खो बैठे, उनकी भीड़
ने एक थाने में आग लगा दी। इस आग में एक दरोगा तथा इक्कीस
सिपाहियों की जलकर मृत्यु हो गई। यह घटना 12 फरवरी, 1922 को
घटी थी, जिसे इतिहास में 'चौरीचौरा काण्ड' के नाम से जाना जाता है।
इस प्रकार की हिंसा को देखकर गांधीजी ने आन्दोलन रोक दिया। 13
मार्च, 1922 को गांधीजी गिरफ्तार कर लिये गये। इस समय क्रान्तिकारियों
का उत्साह अपनी चरम सीमा पर था, अतः महात्मा गांधी के इस निर्णय
से उन्हें भारी निराशा हुई। महात्माजी के इस प्रकार के निर्णय के विरुद्ध