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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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26 चन्द्रशेखर आजाद
सारा शरीर लहूलुहान हो गया, किन्तु चन्द्रशेखर ने उफ तक नहीं की;
उनके मुखमण्डल पर पीड़ा या विषाद का कोई चिह्न नहीं था। उनके इस
प्रकार के धैर्य, साहस तथा देशप्रेम को देखकर सभी उपस्थित लोग आश्चर्य-
चकित रह गये।
चन्द्रशेखर को मिली बेंतों की सजा का समाचार पूरे बनारस नगर में
फैल गया था। जनता फूलमालाएं लेकर उनका स्वागत करने जेल के
दरवाजे पर पहुँच गई। जनता में बालक, युवा एवं वृद्ध तथा स्त्री एवं
पुरुष सभी ने उनको फूलों की मालाएं पहनाकर उनका स्वागत किया, उन्हें
अपने कन्धों पर उठा लिया और 'चन्द्रशेखर आजाद की जय', 'भारतमाता
की जय' तथा 'महात्मा गांधी की जय' आदि नारों से आकाश गूंज उठा।
उसी दिन बनारस के ज्ञानवापी नामक स्थान पर एक सभा हुई।
वहाँ भी लोगों की अपार भीड़ इस वीर बालक के दर्शनों के लिए उप-
स्थित थी। चन्द्रशेखर आजाद मंच पर आये तो उनके ऊपर फूलों की
वर्षा की गई; वह पुष्पमालाओं से लद गये। इस समय वह धोती एवं
कुर्ता पहने हुए थे, उनके माथे पर चन्दन का तिलक लगा हुआ था। मंच
पर से उन्होंने एक संक्षिप्त-सा भाषण दिया, जिसमें उन्होंने देश की
स्वतन्त्रता के लिए कार्य करने की प्रार्थना की तथा इस पावन कार्य के लिए
अपने प्राणों का बलिदान कर देने वाले वीरों को अपनी श्रद्धांजलि दी।
जन समुदाय ने पुनः 'चन्द्रशेखर आजाद जिन्दाबाद' के नारे लगाये। इसके
पश्चात् अन्य लोगों ने भी भाषण दिये, जिनमें चन्द्रशेखर आजाद के वीरता-
पूर्ण कार्य की प्रशंसा की गई।
उन दिनों बनारस से 'मर्यादा' नामक एक पत्र निकलता था, जिसके
प्रकाशक श्री शिवप्रसाद गुप्त तथा सम्पादक श्री सम्पूर्णानन्द थे। श्री
सम्पूर्णानन्द बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री तथा राजस्थान के राज्यपाल
भी बने। 'मर्यादा' में चन्द्रशेखर आजाद का चित्र तथा 'वीर बालक
आजाद' नाम से उनके विषय में एक लेख भी प्रकाशित हुआ जिसमें
उनके वीरतामय कार्य तथा अद्भुत साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी।
यद्यपि अदालत में मजिस्ट्रेट खरेघाट ने चन्द्रशेखर को सबक सिखाने
के उद्देश्य से 'बेंतों' की सजा दी थी, किन्तु इस सजा से मातृभूमि के प्रति