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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

३९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

३९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
भक्तिके अंगभूत जो श्रवण, कीर्तन आदि कर्म हैं, उनका पालन किस
परिस्थितिमें और किस प्रकार करना चाहिये? इसपर विचार करनेके लिये
अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
सर्वथापि त एवोभयलिङ्गात् ॥ ३।४।३४॥
अपि = किसी कारणसे कठिनता प्राप्त होनेपर भी; ते = वे भक्तिसम्बन्धी
कर्म या भागवतधर्म तो; सर्वथा = सब प्रकारसे; एव = ही आचरणमें
लानेयोग्य हैं; उभयलिङ्गात् = क्योंकि श्रुति और स्मृति दोनोंके निश्चयात्मक
वर्णनरूप लिंग (लक्षण)-से यही सिद्ध होता है।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि—
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः।
नानुध्यायाद् बहून् शब्दान् वाचो विग्लापनँ हि तत्॥
'बुद्धिमान् ब्राह्मणको चाहिये कि उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वको
समझकर उसीमें बुद्धिको प्रविष्ट करे, अन्य नाना प्रकारके व्यर्थ
शब्दोंपर ध्यान न दे; क्योंकि वह तो केवल वाणीका अपव्ययमात्र है।'
(बृ० उ० ४।४।२१) तथा—
यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः॥
'जिस परब्रह्म परमेश्वरमें स्वर्ग, पृथिवी, अन्तरिक्ष, मनसहित
समस्त इन्द्रियाँ और प्राण स्थित हैं, उसी एक सबके आत्मा
परमेश्वरको कहे हुए उपायोंद्वारा जानो, दूसरी बातोंको छोड़ो। यही
अमृतस्वरूप परमात्माको पानेके लिये सेतुके सदृश सरल मार्ग है।'
(मु० उ० २।२।५) इसी प्रकार श्रीमद्भागवतमें भी कहा है कि—
शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः
स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः।
त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं
भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम्॥