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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

३४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
अन्तमें विज्ञानात्मा अर्थात् जीवात्माका भी अन्तर्यामी उसीको बतलाया है
तथा प्रत्येक वाक्यके अन्तमें कहा है कि 'यही तेरा अन्तर्यामी अमृतस्वरूप
आत्मा है।'१ श्वेताश्वतरमें भी कहा गया है कि 'सब प्राणियोंमें छिपा हुआ
वह एक देव सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है, वह सबके
कर्मोंका अधिष्ठाता, सबका निवासस्थान, सबका साक्षी, सर्वथा विशुद्ध
और गुणातीत है।'२ (श्वेता० उ० ६।११) इसलिये यही सिद्ध होता है
कि सबका अन्तरात्मा वह परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है। जीवात्मा सबका
अन्तरात्मा नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—अब कही हुई बातमें शंका उठाकर उसका उत्तर देते हैं—
अन्यथाभेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशान्तरवत् ॥ ३। ३। ३६ ॥
चेत्=यदि कहो कि; अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अभेदानुपपत्तिः=अभेदकी
सिद्धि नहीं होगी, इसलिये (उक्त प्रकरणमें जीवात्मा और परमात्माका
अभेद मानना ही उचित है); इति न=तो यह ठीक नहीं; उपदेशान्तरवत्=क्योंकि
दूसरे उपदेशकी भाँति अभेदकी सिद्धि हो जायगी।
व्याख्या—यदि कहो कि उक्त वर्णनके अनुसार जीवात्मा और
परमात्माके भेदको उपाधिकृत न मानकर वास्तविक मान लेनेपर
अभेदकी सिद्धि नहीं होगी तो ऐसी बात नहीं है। दूसरी जगहके
उपदेशकी भाँति यहाँ भी अभेदकी सिद्धि हो जायगी। अर्थात् जिस
प्रकार दूसरी जगह कार्यकारणभावके अभिप्रायसे परब्रह्म परमेश्वरकी
जड-प्रपंच और जीवात्माके साथ एकता करके उपदेश दिया गया
है, उसी प्रकार प्रत्येक स्थानमें अभेदकी सिद्धि हो जायगी। भाव
यह कि श्वेतकेतुको उसके पिताने मिट्टी, लोहा और सोनेके
१-यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आया है तथा इसका विस्तार सूत्र
१।२।१८ और १९ की व्याख्यामें भी देखना चाहिये।
२-यह मन्त्र सूत्र १।१।२ की टिप्पणीमें आया है।