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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र ६-७ ] अध्याय २ २०९

सूत्र ६-७ ] अध्याय २ २०९
गौण अर्थमें प्रयोग किया गया है, उसी प्रकार किसी एक शाखामें गौण
अर्थमें आकाशको उत्पत्तिशील बताया जा सकता है।
सम्बन्ध — इस प्रकार पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंद्वारा
उसका समाधान करते हैं—
प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥ २ । ३ । ६ ॥
अव्यतिरेकात् = ब्रह्मके कार्यसे आकाशको अलग न माननेसे ही;
प्रतिज्ञाहानिः = एकके ज्ञानसे सबके ज्ञानसम्बन्धी प्रतिज्ञाकी रक्षा हो सकती
है; शब्देभ्यः = श्रुतिके शब्दोंसे यही सिद्ध होता है।
व्याख्या — उपनिषदोंमें जो एकको जाननेसे सबका ज्ञान हो जानेकी
प्रतिज्ञा की गयी है और उस प्रसंगमें जो कारण-कार्यके उदाहरण दिये
गये हैं, (छा० उ० ३।१।१ से ६ तक) उन सबकी विरोधरहित सिद्धि
आकाशको ब्रह्मके कार्यसे अलग न माननेपर ही हो सकती है, अन्यथा
नहीं; क्योंकि वहाँ मिट्टी और सुवर्ण आदिका दृष्टान्त देकर उनके किसी
एक कार्यके ज्ञानसे कारणके ज्ञानद्वारा सबका ज्ञान होना बताया है। अतः
यदि आकाशको ब्रह्मका कार्य न मानकर ब्रह्मसे अलग मानेंगे तो
कारणरूप ब्रह्मको जान लेनेपर भी आकाश जाना हुआ नहीं होगा; इससे
प्रतिज्ञाकी हानि होगी। इतना ही नहीं, 'यह सब ब्रह्म ही है' (मु० उ०
२।२।११) 'यह सब इस ब्रह्मका स्वरूप है' (छा० उ० ६।८।७)
'यह सब निःसंदेह ब्रह्म ही है; क्योंकि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय उसीमें
होते हैं' (छा० उ० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे भी यही सिद्ध होता
है कि आकाश उस ब्रह्मका ही कार्य है।
यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥ २ । ३ । ७ ॥
तु = तथा; लोकवत् = साधारण लौकिक व्यवहारकी भाँति; यावद्-
विकारम् = विकारमात्र सब कुछ; विभागः = ब्रह्मका ही विभाग (कार्य) है।
व्याख्या — जिस प्रकार लोकमें यह बात देखी जाती है कि कोई पुरुष

२१० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
देवदत्तके पुत्रोंका परिचय देते समय कहता है—‘ये सब-के-सब
देवदत्तके पुत्र हैं।' फिर वह उनमेंसे किसी एक या दोका ही नाम लेकर
यदि कहे कि ‘इनकी उत्पत्ति देवदत्तसे हुई है’ तो भी उन सबकी उत्पत्ति
देवदत्तसे ही मानी जायगी, उसी प्रकार जब समस्त विकारात्मक जगत्‌को
उस ब्रह्मका कार्य बता दिया गया, तब आकाश उससे अलग कैसे रह
सकता है। अतः तेज आदिकी सृष्टि बताते समय यदि आकाशका नाम
छूट गया तो भी यही सिद्ध होता है कि आकाश भी अन्य तत्त्वोंकी भाँति
ब्रह्मका कार्य है और वह उससे उत्पन्न होता है। वायु और आकाशको
अमृत कहनेका तात्पर्य देवताओंकी भाँति उन्हें अन्य तत्त्वोंकी अपेक्षा
चिरस्थायी बतानामात्र है।
सम्बन्ध— इस प्रकार आकाशका उत्पन्न होना सिद्ध करके उसीके
उदाहरणसे यह निश्चय किया जाता है कि वायु भी उत्पन्न होता है—
एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः॥ २।३।८॥
एतेन = इससे अर्थात् आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध करनेवाले कथनसे ही;
मातरिश्वा = वायुका उत्पन्न होना; व्याख्यातः = बता दिया गया।
व्याख्या— जिन युक्तियों और श्रुतिप्रमाणोंद्वारा पूर्वसूत्रोंमें ब्रह्मसे
आकाशका उत्पन्न होना निश्चित किया गया, उन्हींसे यह कहना भी हो
गया कि वायु भी उत्पन्न होता है, अतः उसके विषयमें अलग कहना
आवश्यक नहीं समझा गया।
सम्बन्ध— इस प्रकार आकाश और वायुको उत्पत्तिशील बतलाकर
अब इस दृश्य-जगत्‌में जिन तत्त्वोंको दूसरे मतवाले नित्य मानते हैं तथा
जिनकी उत्पत्तिका स्पष्ट वर्णन वेदमें नहीं आया है, उन सबको भी उत्पत्तिशील
बतानेके लिये अगला सूत्र कहते हैं—
असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः॥ २।३।९॥
सतः = ‘सत्’ शब्दवाच्य ब्रह्मके सिवा (अन्य किसीका उत्पन्न न होना);

सूत्र १०-११ ] अध्याय २ २११
तु=तो; असम्भवः = असम्भव है; अनुपपत्तेः = क्योंकि अन्य किसीका उत्पन्न न
होना युक्ति और प्रमाणद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता।
व्याख्या—जिस पूर्णब्रह्म परमात्माका श्रुतिमें जगह-जगह सत् नामसे
वर्णन आया है तथा जो इस जड-चेतनात्मक जगत्का परम कारण माना
गया है, उसे छोड़कर इस जगत्में कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो
उत्पत्तिशील न हो। बुद्धि, अहंकार, काल तथा गुण और परमाणु आदि
सभी उत्पत्तिशील हैं। क्योंकि वेदमें प्रलयके समय एकमात्र परब्रह्म
परमेश्वरसे भिन्न किसीका अस्तित्व स्वीकार नहीं किया गया है इसलिये
युक्ति या प्रमाणद्वारा कोई भी पदार्थ उत्पन्न न होनेवाला सिद्ध नहीं हो
सकता। अतः ब्रह्मके सिवा सब कुछ उत्पत्तिशील है।
सम्बन्ध— छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा है कि ‘उस ब्रह्मने तेजको रचा’
और तैत्तिरीयोपनिषद्में बताया गया है कि ‘सर्वात्मा परमेश्वरसे आकाश
उत्पन्न हुआ, आकाशसे वायु और वायुसे तेज।’ अतः यहाँ तेजको किससे
उत्पन्न हुआ माना जाय? ब्रह्मसे या वायुसे? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
तेजोऽतस्तथा ह्याह॥ २।३।१०॥
तेजः=तेज; अतः=इस (वायु)-से (उत्पन्न हुआ); तथा हि=ऐसा
ही; आह=अन्यत्र कहा है।
व्याख्या—तेज-तत्त्व वायुसे उत्पन्न हुआ, यही मानना चाहिये;
क्योंकि यही बात श्रुतिमें दूसरी जगह कही गयी है। भाव यह है कि
उस ब्रह्मने वायुसे तेजकी रचना की अर्थात् आकाश और वायुको
पहले उत्पन्न करके उसके बाद वायुसे तेजकी उत्पत्ति की; ऐसा
माननेपर दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता हो जायगी।
सम्बन्ध— इसी प्रकार—
आपः ॥ २।३।११॥
आपः = जल (तेजसे उत्पन्न हुआ)।