वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र ४० ] अध्याय २ २३५
सूत्र ४० ] अध्याय २ २३५
है। अतः जीवात्माका कर्तापन स्वभावसिद्ध नहीं है। इसके सिवा, यदि
जीवात्माको स्वरूपसे कर्ता मान लिया जाय तो श्रीमद्भगवद्गीताका
निम्नलिखित वर्णन सर्वथा असंगत ठहरेगा—
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
'हे अर्जुन ! वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये हुए हैं, तो भी
जो अहंकारसे मोहित हो गया है वह पुरुष 'मैं कर्ता हूँ' ऐसे मान लेता है।'
(गीता ३। २७)
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥
'हे अर्जुन! तत्त्वको जाननेवाला योगी तो देखता हुआ, सुनता
हुआ, स्पर्श करता हुआ; सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता
हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण
करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मीचता हुआ भी सब इन्द्रियाँ
अपने-अपने अर्थोंमें बर्त रही हैं, इस प्रकार समझता हुआ, निःसंदेह
ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।'
(गीता ५। ८-९)
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥
'जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिके ही किये हुए
देखता है अर्थात् इस बातको तत्त्वसे समझ लेता है कि प्रकृतिसे
उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बर्तते हैं तथा आत्माको अकर्ता
देखता है, वही देखता है।'
(गीता १३। २९)
२३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
इसी प्रकार भगवद्गीतामें जगह-जगह जीवात्मामें कर्तापनका निषेध किया
है, इससे यही सिद्ध होता है कि जीवात्माका कर्तापन अन्तःकरण और
संस्कारोंके सम्बन्धसे है, केवल शुद्ध आत्मामें कर्तापन नहीं है।
(गीता १८। १६)
सम्बन्ध- पूर्वसूत्रोंसे यह निश्चय किया गया कि प्रकृति स्वतन्त्र कर्ता
नहीं है तथा जीवात्माका जो कर्तापन है वह भी बुद्धि, मन और इन्द्रिय
आदिके सम्बन्धसे है; स्वभावसे नहीं है, इस कारण यहाँ यह जिज्ञासा होती है
कि उपर्युक्त जीवात्माका कर्तापन स्वाधीन है या पराधीन, इसपर कहते हैं-
परात्तु तच्छ्रुतेः ॥ २ । ३ । ४१ ॥
तत्=वह जीवात्माका कर्तापन; परात्=परमेश्वरसे; तु=ही है; श्रुतेः=
क्योंकि श्रुतिके वर्णनसे यही सिद्ध होता है।
व्याख्या- बृहदारण्यकमें कहा है कि 'जो जीवात्मामें रहकर उसका
नियमन करता है, वह अन्तर्यामी तेरा आत्मा है' (३।७।२२); छान्दोग्यमें
कहा है कि 'मैं इस जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नाम-रूपको प्रकट
करूँगा। (६। ३। २) तथा केनोपनिषद्में जो यक्षकी आख्यायिका है,
उसमें भी यह सिद्ध किया गया है कि 'अग्नि और वायु आदि देवताओंमें
अपना कार्य करनेकी स्वतन्त्र शक्ति नहीं है, उस परब्रह्मसे शक्ति पाकर
ही वे अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं।' (३।१-१०) इत्यादि।
श्रुतियोंके इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा स्वतन्त्रतापूर्वक
कुछ भी नहीं कर सकता, वह जो कुछ करता है, परब्रह्म परमेश्वरके
सहयोगसे, उसकी दी हुई शक्तिके द्वारा ही करता है।
जीवका कर्तापन ईश्वराधीन है, यह बात गीतामें स्पष्ट कही गयी है-
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
'हे अर्जुन ! शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ़ हुए सब प्राणियोंको अपनी मायासे