वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र २३-२४] अध्याय ३ २७९
सूत्र २३-२४] अध्याय ३ २७९
सम्बन्ध- अब यह जिज्ञासा होती है कि वे जीव उन-उन तत्त्वोंके
आकारमें बहुत दिनोंतक टिके रहते हैं या तत्काल ही क्रमसे नीचे उतरते
जाते हैं, इसपर कहते हैं—
नातिचिरेण विशेषात् ॥ ३ । १ । २३ ॥
विशेषात् = ऊपर गमनकी अपेक्षा नीचे उतरनेकी परिस्थितिमें भेद
होनेके कारण; नातिचिरेण = जीव उन आकाश, वायु आदिके रूपमें अधिक
कालतक न रहकर क्रमश: नीचे उतर आते हैं।
व्याख्या—ऊपरके लोकमें जानेका जो वर्णन है, वह कर्मोंके फलभोगसे
सम्बन्ध रखता है, इसलिये बीचमें आये हुए पितृलोक आदिमें विलम्ब होना
भी सम्भव है, परंतु लौटते समय कर्मभोग तो समाप्त हो जाते हैं, इसलिये
बीचमें कहीं विलम्ब होनेका कोई कारण नहीं रहता। इस प्रकार ऊपरके
लोकोंमें जाने और वहाँसे लौटनेकी गतिमें विशेषता होनेके कारण यही सिद्ध
होता है कि लौटते समय रास्तेमें विलम्ब नहीं होता।
सम्बन्ध— अब यह जिज्ञासा होती है कि परलोकसे लौटनेवाले उस
जीवात्माका जो धान, जौ, तिल और उड़द आदिके रूपमें होना कहा गया है,
उसका क्या भाव है। क्या वह स्वयं वैसा बन जाता है या उस योनिको
भोगनेवाला जीवात्मा कोई दूसरा होता है, जिसके साथमें यह भी रहता है?
इसपर कहते हैं—
अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् ॥ ३ । १ । २४ ॥
पूर्ववत् = पहलेकी भाँति ही; अभिलापात् = यह कथन है इसलिये;
अन्याधिष्ठितेषु = दूसरे जीवात्मा अपने कर्मफलभोगके लिये जिनमें स्थित
हो रहे हैं, ऐसे धान, जौ आदिमें केवल सन्निधिमात्रसे इसका निवास है।
व्याख्या-जिस प्रकार पूर्वसूत्रमें यह बात कही गयी है कि वह
लौटनेवाला जीवात्मा आकाश आदि नहीं बनता, उनके सदृश होकर ही
उनसे संयुक्त होता है, उसी प्रकार यहाँ धान आदिके विषयमें भी समझना
चाहिये; क्योंकि यह कथन भी पहलेके सदृश ही है। इसलिये यही सिद्ध
होता है कि उन धान, जौ आदिमें अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये जो
दूसरे जीव पहलेसे ही स्थित हैं उनके रहते हुए ही यह चन्द्रलोकसे लौटनेवाला
जीवात्मा उनके साथ-साथ पुरुषके उदरमें चला जाता है; धान, जौ आदि
स्थावरयोनियोंको प्राप्त नहीं होता।
सम्बन्ध- इसपर शंका उपस्थित करके ग्रन्थकार उसका निराकरण
करते हैं-
अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥ ३ । १ । २५ ॥
चेत् = यदि कहा जाय कि; अशुद्धम् = यह तो अशुद्ध (पाप) कर्म
होगा; इति न = तो ऐसी बात नहीं है; शब्दात् = श्रुतिके वचनसे इसकी
निर्दोषता सिद्ध होती है।
व्याख्या-यदि यह शंका की जाय कि 'अनाजके प्रत्येक दानेमें जीव
रहता है, इस मान्यताके अनुसार अन्नको पीसना, पकाना और खाना तो बड़ा
अशुद्ध (पाप) कर्म होगा, क्योंकि उसमें तो अनेक जीवोंकी हिंसा करनेपर
एक जीवकी उदरपूर्ति होगी' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि इस प्रकरणमें
पुरुषको 'अग्नि' बताकर उसमें अन्नको हवन करना बताया है तथा श्रुतिमें
जगह-जगह अन्नके खाये जानेका वर्णन है। (छा० उ० ६।६।२) अतः
श्रुतिका विधान होनेके कारण उसमें हिंसा नहीं होती तथा उन जीवोंकी उस
कालमें सुषुप्ति-अवस्था रहती है, जब वे पृथिवी और जलके सम्बन्धसे
अंकुरित होते हैं, तब उनमें चेतना आती है और सुख-दुःखका ज्ञान होता है,
पहले नहीं। अतः अन्नभक्षणमें हिंसा नहीं है।
सम्बन्ध-अन्नसे संयुक्त होनेके बाद वह किस प्रकार कर्मफलभोगके
लिये शरीर धारण करता है, उसका क्रम बतलाते हैं-
रेतःसिग्योगोऽथ ॥ ३ । १ । २६ ॥
अथ = उसके बाद; रेतःसिग्योगः = वीर्यका सेचन करनेवाले पुरुषके
साथ उसका सम्बन्ध होता है।
सूत्र २७ ] अध्याय ३ २८१
व्याख्या—उसके अनन्तर वह जीवात्मा अन्नके साथ पुरुषके
पेटमें जाकर उसके वीर्यमें प्रविष्ट हो उस पुरुषसे संयुक्त होता है,
इस कथनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि आकाश आदिसे लेकर
अन्नतक सभी जगह केवल संयोगसे ही उसका तदाकार होना कहा
है; स्वरूपसे नहीं।
सम्बन्ध—उसके बाद—
योनेः शरीरम् ॥ ३ । १ । २७ ॥
योनेः=स्त्रीकी योनिमें प्रविष्ट होनेके अनन्तर; शरीरम्=वह जीवात्मा
कर्मफलभोगके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है।
व्याख्या—इस प्रकार वह स्वर्गसे आनेवाला जीवात्मा पहले
पुरुषके वीर्यके आश्रित होता है। फिर उस पुरुषद्वारा गर्भाधानके समय
स्त्रीकी योनिमें वीर्यके साथ प्रविष्ट करा दिया जाता है। वहाँ
गर्भाशयसे सम्बन्ध होकर उक्त जीव अपने कर्मफलोंके अनुरूप
शरीरको प्राप्त होता है। यहींसे उसके कर्मोंके फलका भोग आरम्भ
होता है। इसके पहले स्वर्गसे उतरकर वीर्यमें प्रविष्ट होनेतक उसका
कोई जन्म या शरीर धारण करना नहीं है, केवल उन-उन आकाश
आदिके आश्रित रहना मात्र कहा गया है; उन धान आदि शरीरोंके
अधिष्ठाता जीव दूसरे ही हैं।
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