वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र १९-२० ] अध्याय १ ६३
सूत्र १९-२० ] अध्याय १ ६३
सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी
ब्रह्म ही है। अब निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति
अन्तर्यामी नहीं हो सकती—
न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ॥ १ । २ । १९ ॥
स्मार्तम् = सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान (जड प्रकृति); च = भी;
न = अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्माभिलापात् = क्योंकि इस प्रकरणमें बताये हुए
द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं हैं।
व्याख्या-सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोंका वर्णन
वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है; अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोंका ही
विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी
प्रकृति नहीं हो सकती। अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमें 'अन्तर्यामी'-
के नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ है।
सम्बन्ध- यह ठीक है कि जड होनेके कारण प्रकृतिको अन्तर्यामी
नहीं कहा जा सकता, परंतु जीवात्मा तो चेतन है तथा वह शरीर और इन्द्रियोंके
भीतर रहनेवाला और उनका नियमन करनेवाला भी प्रत्यक्ष है, अतः उसीको
अन्तर्यामी मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं—
शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ १ । २ । २० ॥
शारीरः = शरीरमें रहनेवाला जीवात्मा; च = भी; ( न = ) अन्तर्यामी नहीं है;
हि = क्योंकि; उभयेऽपि = माध्यन्दिनी तथा काण्व दोनों ही शाखावाले; एनम् = इस
जीवात्माको; भेदेन = अन्तर्यामीसे भिन्न मानकर; अधीयते = अध्ययन करते हैं।
व्याख्या-माध्यन्दिनी१ और काण्व२-दोनों शाखाओंवाले विद्वान्
१. 'य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य
आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः।' (शतपथब्रा० १४। ५। ३०)
२. 'यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानँशरीरं यो विज्ञान-
अन्तर्यामीको पृथिवी आदिकी भाँति जीवात्माके भी भीतर रहकर
उसका नियमन करनेवाला मानते हैं। वहाँ जीवात्माको नियम्य और
अन्तर्यामीको नियन्ता बताया गया है। इस प्रकार जीवात्मा और
परमात्मा इन दोनोंका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण वहाँ 'अन्तर्यामी'
पद परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, जीवात्माका नहीं।
सम्बन्ध—उन्नीसवें सूत्रमें यह बात कही गयी है कि द्रष्टापन आदि
चेतनके धर्म जड प्रकृतिमें नहीं घट सकते; इसलिये वह अन्तर्यामी नहीं हो
सकती। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि मुण्डकोपनिषद्में जिसको अदृश्यता,
अग्राह्यता आदि धर्मोंसे युक्त बतलाकर अन्तमें भूतोंका कारण बताया गया
है, वह तो प्रकृति हो सकती है; क्योंकि उस जगह बताये हुए सभी धर्म
प्रकृतिमें पाये जाते हैं। इसपर कहते हैं—
अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॥ १ । २ । २१ ॥
अदृश्यत्वादिगुणकः = अदृश्यता आदि गुणोंवाला परब्रह्म परमेश्वर ही
है; धर्मोक्तेः = क्योंकि उस जगह उसीके सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में यह प्रसंग आया है कि महर्षि शौनक
विधिपूर्वक अंगिरा ऋषिकी शरणमें गये। वहाँ जाकर उन्होंने पूछा—
'भगवन् ! किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है?'
इसपर अंगिराने कहा—'जाननेयोग्य विद्याएँ दो हैं, एक अपरा, दूसरी परा।
उनमेंसे अपरा विद्या तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प,
व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष है और परा वह है, जिससे उस
अक्षर ब्रह्मको जाना जाता है।' यह कहकर उस अक्षरको समझानेके लिये
मन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥' (बृ० उ० ३। ७। २२)
'जो जीवात्मामें रहनेवाला, जीवात्माके भीतर है, जिसे जीवात्मा नहीं जानता,
जीवात्मा जिसका शरीर है और जो उसके भीतर रहकर जीवात्माका नियमन करता
है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।'