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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र २ ] अध्याय ४ ४५३

सूत्र २ ] अध्याय ४ ४५३
बात स्पष्ट है। वहाँ जीवनकालमें ही उनका संकल्पसे उपस्थित होना कहा
है (छा० उ० ८।२।१ से १०)। इसके बाद उसके लिये प्रतिदिन यहाँ
हृदयमें ही परमानन्दकी प्राप्ति होनेकी बात कही है (छा० उ० ८।३।३)।
तदनन्तर शरीर छोड़कर परमधाममें जानेकी बात बतायी गयी है (छा०
उ० ८।३।४) और उसका नाम सत्य अर्थात् सत्यलोक कहा है। उसके
पूर्व जो यह कहा है कि 'जो यहाँ इस आत्माको तथा इन सत्यकामोंको
जानकर परलोकमें जाते हैं, उनका सब लोकोंमें इच्छानुसार गमन होता
है' (छा० उ० ८।१।६) यह वर्णन आत्मज्ञानकी महिमा दिखानेके लिये
है किंतु दूसरे खण्डका वर्णन तो स्पष्ट ही जीवनकालका है।
उक्त प्रकरण दहर-विद्याका है और 'दहर' यहाँ परब्रह्म परमेश्वरका
वाचक है, यह बात पहले सिद्ध की जा चुकी है, (ब्र० सू० १।३।१४)
इसलिये यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रकरण हिरण्यगर्भकी
या जीवात्माके अपने स्वरूपकी उपासनाका है।
सम्बन्ध—उस परमधाममें जो वह उपासक अपने वास्तविक
रूपसे सम्पन्न होता है, उसमें पहलेकी अपेक्षा क्या विशेषता होती है?
इस जिज्ञासापर कहते हैं—
मुक्तः प्रतिज्ञानात्॥ ४।४।२॥
प्रतिज्ञानात्=प्रतिज्ञा की जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि;
मुक्तः=(वह स्वरूप) सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त (होता) है।
व्याख्या—श्रुतिमें जगह-जगह यह प्रतिज्ञा की गयी है कि 'उस
परब्रह्म परमात्माके लोकको प्राप्त होनेके बाद यह साधक सदाके लिये
सब प्रकारके बन्धनोंसे छूट जाता है।' (मु० उ० ३।२।६) इसीसे यह
सिद्ध होता है कि अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न होनेपर उपासक सब
प्रकारके बन्धनोंसे रहित, सर्वथा शुद्ध, दिव्य, विभु और विज्ञानमय होता
है, उसमें किसी प्रकारका विकार नहीं रहता। पूर्वकालमें अनादिसिद्ध
कर्मसंस्कारोंके कारण जो इसका स्वरूप कर्मानुसार प्राप्त शरीरके अनुरूप

४५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
हो रहा था; (ब्र० सू० २।३।३०) परमधाममें जानेके बाद वैसा नहीं
रहता। यह सब बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।
सम्बन्ध—यह कैसे निश्चय होता है कि उस समय उपासक सब
बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है? इसपर कहते हैं—
आत्मा प्रकरणात्॥ ४।४।३॥
प्रकरणात्=प्रकरणसे (यह सिद्ध होता है कि वह); आत्मा=शुद्ध
आत्मा ही हो जाता है।
व्याख्या—उस प्रकरणमें जो वर्णन है उसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि
‘वह ब्रह्मलोकमें प्राप्त होनेवाला स्वरूप आत्मा है’ (छा० उ० ८।३।४)।
अतः उस प्रकरणसे ही यह सिद्ध होता है कि उस समय वह सब प्रकारके
बन्धनोंसे मुक्त होकर परमात्माके समान परम दिव्य शुद्ध स्वरूपसे युक्त हो
जाता है (गीता १४।२; मु० ३।१।३)।
सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकमें जाकर उस उपासककी
परमात्मासे पृथक् स्थिति रहती है या वह उन्हींमें मिल जाता है। इसका
निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं। पहले क्रमशः तीन
प्रकारके मत प्रस्तुत करते हैं—
अविभागेन दृष्टत्वात्॥४।४।४॥
अविभागेन=(उस मुक्तात्माकी स्थिति उस परब्रह्ममें) अविभक्त
रूपसे होती है; दृष्टत्वात्=क्योंकि यही बात श्रुतिमें देखी गयी है।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि—
'यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम॥'
‘हे गौतम! जिस प्रकार शुद्ध जलमें गिरा हुआ शुद्ध जल वैसा ही
हो जाता है, उसी प्रकार परमात्माको जाननेवाले मुनिका आत्मा हो जाता
है’ (क० उ० २।१।१५)। ‘जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नाम-रूपोंको

सूत्र ५-६ ] अध्याय ४ ४५५
छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही परमात्माको जाननेवाला विद्वान्
नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर, दिव्य, परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता
है'* (मु० उ० ३।२।८)। श्रुतिके इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि
मुक्तात्मा उस परब्रह्म परमात्मामें अविभक्त रूपसे ही स्थित होता है।
सम्बन्ध - इस विषयमें जैमिनिका मत बतलाते हैं-
ब्राह्मेण जैमिनिरूपन्यासादिभ्यः ॥४।४।५॥
जैमिनिः = आचार्य जैमिनि कहते हैं कि; ब्राह्मेण = ब्रह्मके सदृश रूपसे
स्थित होता है; उपन्यासादिभ्यः = क्योंकि श्रुतिमें जो उसके स्वरूपका निरूपण
किया गया है, उसे देखनेसे और स्मृति-प्रमाणसे भी यही सिद्ध होता है।
व्याख्या - आचार्य जैमिनिका कहना है कि श्रुतिमें 'वह निर्मल होकर
परम समताको प्राप्त हो जाता है।' (मु० उ० ३।१।३) ऐसा वर्णन
मिलता है तथा उक्त प्रकरणमें भी उसका दिव्य स्वरूपसे सम्पन्न होना
कहा गया है (छा० उ० ८।३।४) एवं गीतामें भी भगवान्ने कहा है
कि 'इस ज्ञानका आश्रय लेकर मेरे दिव्य गुणोंकी समताको प्राप्त हुए
महापुरुष सृष्टिकालमें उत्पन्न और प्रलयकालमें व्यथित नहीं होते' (गीता
१४। २)। इन प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि वह उपासक उस
परमात्माके सदृश दिव्य स्वरूपसे सम्पन्न होता है।
सम्बन्ध - इसी विषयमें आचार्य औडुलोमिका मत उपस्थित करते हैं-
चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ॥४।४।६॥
चितितन्मात्रेण = केवल चेतनमात्र स्वरूपसे स्थित रहता है; तदात्म-
कत्वात्=क्योंकि उसका वास्तविक स्वरूप वैसा ही है; इति = ऐसा;
औडुलोमिः = आचार्य औडुलोमि कहते हैं।
व्याख्या - परमधाममें गया हुआ मुक्तात्मा अपने वास्तविक चैतन्यमात्र
स्वरूपसे स्थित रहता है; क्योंकि श्रुतिमें उसका वैसा ही स्वरूप बताया गया

  • यह मन्त्र सूत्र १। ४। २१ की व्याख्यामें अर्थसहित आया है।

४५६ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ४

४५६ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ४

है। बृहदारण्यकमें कहा है कि 'स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः
कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन
एव ।'—'जिस प्रकार नमकका डला बाहर-भीतरसे रहित सब-का-सब
रसघन है, वैसे ही यह आत्मा बाहर-भीतरके भेदसे रहित सब-का-
सब प्रज्ञानघन ही है।' (बृह० उ० ४।५।१३) इसलिये उसका अपने
स्वरूपसे सम्पन्न होना चैतन्य घनरूपमें ही स्थित होना है।
सम्बन्ध— अब आचार्य बादरायण इस विषयमें अपना सिद्धान्त प्रस्तुत
करते हैं—
एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं
बादरायणः ॥ ४ । ४ । ७॥
एवम्=इस प्रकारसे अर्थात् औडुलोमि और जैमिनिके कथनानुसार;
अपि=भी; उपन्यासात्= श्रुतिमें उस मुक्तात्माके स्वरूपका निरूपण होनेसे
तथा; पूर्वभावात्= पहले (चौथे सूत्रमें) कहे हुए भावसे भी; अविरोधम्=सिद्धान्तमें
कोई विरोध नहीं है; बादरायणः ( आह )=यह बादरायण कहते हैं।
व्याख्या—आचार्य जैमिनिके कथनानुसार मुक्तात्माका स्वरूप परब्रह्म
परमात्माके सदृश दिव्यगुणोंसे सम्पन्न होता है—यह बात श्रुतियों और स्मृतियोंमें
कही गयी है तथा आचार्य औडुलोमिके कथनानुसार चेतनमात्र स्वरूपसे स्थित
होनेका वर्णन भी पाया जाता है। इसी प्रकार पहले (४।४।४) सूत्रमें जैसा
बताया गया है, उसके अनुसार परमेश्वरमें अभिन्नरूपसे स्थित होनेका वर्णन
भी मिलता है। इसलिये यही मानना ठीक है कि उस मुक्तात्माके भावानुसार
उसकी तीनों ही प्रकारसे स्थिति हो सकती है। इसमें कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—यहाँतक परमधाममें जानेवाले उपासकोंके विषयमें निर्णय
किया गया। अब जो उपासक प्रजापति ब्रह्माके लोकको प्राप्त होते हैं,
उनके विषयमें निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता
है। यहाँ प्रश्न होता है कि उन उपासकोंको ब्रह्मलोकोंके भोगोंकी प्राप्ति
किस प्रकार होती है, इसपर कहते हैं—

सूत्र ८–१०] अध्याय ४ ४५७

सूत्र ८–१०] अध्याय ४ ४५७
संकल्पादेव तु तच्छ्रुतेः ॥४।४।८॥
तु = (उन भोगोंकी प्राप्ति) तो; संकल्पात् = संकल्पसे; एव = ही होती
है; तच्छ्रुतेः = क्योंकि श्रुतिमें यही बात कही गयी है।
व्याख्या—'यह आत्मा मनरूप दिव्य नेत्रोंसे ब्रह्मलोकके
समस्त भोगोंको देखता हुआ रमण करता है।' (छा० उ० ८। १२। ५, ६)
यह बात श्रुतिमें कही गयी है; इससे यह सिद्ध होता है कि मनके द्वारा
केवल संकल्पसे ही उपासकको उस लोकके दिव्य भोगोंका
अनुभव होता है।
सम्बन्ध—युक्तिसे भी उसी बातको दृढ़ करते हैं—
अत एव चानन्याधिपतिः ॥ ४।४।९॥
अत एव = इसीलिये; च = तो; अनन्याधिपतिः = (मुक्तात्माको) ब्रह्माके
सिवा अन्य स्वामीसे रहित बताया गया है।
व्याख्या—'वह स्वराज्यको प्राप्त हो जाता है, मनके स्वामी
हिरण्यगर्भको प्राप्त हो जाता है; अतः वह स्वयं बुद्धि, मन, वाणी, नेत्र
और श्रोत्र—सबका स्वामी हो जाता है' (तै० उ० १। ६)। भाव यह कि
एक ब्रह्माजीके सिवा अन्य किसीका भी उसपर आधिपत्य नहीं
रहता, इसीलिये पूर्वसूत्रमें कहा गया है कि 'वह मनके द्वारा संकल्पमात्रसे
ही सब दिव्य भोगोंको प्राप्त कर लेता है।'
सम्बन्ध—उसे संकल्पमात्रसे जो दिव्य भोग प्राप्त होते हैं, उनके उपभोगके
लिये वह शरीर भी धारण करता है या नहीं? इसपर आचार्य बादरिका मत
उपस्थित करते हैं—
अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ ४।४।१०॥
अभावम् = उसके शरीर नहीं होता ऐसा; बादरिः = आचार्य बादरि
मानते हैं; हि = क्योंकि; एवम् = इसी प्रकार; आह = श्रुति कहती है।
व्याख्या—आचार्य बादरिका कहना है कि उस लोकमें स्थूल शरीरका
अभाव है, अतः बिना शरीरके केवल मनसे ही उन भोगोंको भोगता है;

४५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

क्योंकि श्रुतिमें इस प्रकार कहा है—'स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा
मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ य एते ब्रह्मलोके ।' (छा० उ० ८।
१२। ५-६) 'निश्चय ही वह यह आत्मा इस दिव्य नेत्र मनके द्वारा जो
ये ब्रह्मलोकके भोग हैं, इनको देखता हुआ रमण करता है।' इसके सिवा
उसका अपने दिव्य्यरूपसे सम्पन्न होना भी कहा है (८।१२।२)। दिव्य
रूप स्थूल देहके बन्धनसे रहित होता है। इसलिये कार्यब्रह्मके लोकमें गये
हुए मुक्तात्माके स्थूल शरीरका अभाव मानना ही उचित है (८।१३।१)।
सम्बन्ध—इस विषयमें आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं—
भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ॥ ४।४।११ ॥
जैमिनिः=आचार्य जैमिनि; भावम्=मुक्तात्माके शरीरका अस्तित्व
मानते हैं; विकल्पामननात्=क्योंकि कई प्रकारसे स्थित होनेका श्रुतिमें
वर्णन आता है।
व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कहना है कि 'मुक्तात्मा एक
प्रकारसे होता है, तीन प्रकारसे होता है, पाँच प्रकारसे होता है, सात
प्रकारसे, नौ प्रकारसे तथा ग्यारह प्रकारसे होता है, ऐसा कहा गया
है।' (छा० उ० ७। २६ । २) इस तरह श्रुतिमें उसका नाना भावोंसे युक्त
होना कहा है, इससे यही सिद्ध होता है कि उसके स्थूल शरीरका
भाव है अर्थात् वह शरीरसे युक्त होता है, अन्यथा इस प्रकार श्रुतिका
कहना संगत नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—अब इस विषयमें आचार्य बादरायण अपना मत प्रकट करते हैं—
द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥ ४।४।१२ ॥
बादरायणः=वेदव्यासजी कहते हैं कि; अतः=पूर्वोक्त दोनों मतोंसे;
द्वादशाहवत्=द्वादशाह यज्ञकी भाँति; उभयविधम्=दोनों प्रकारकी स्थिति उचित है।
व्याख्या—वेदव्यासजी कहते हैं कि दोनों आचार्योंका कथन प्रमाणयुक्त है;
अतः उपासकके संकल्पानुसार शरीरका रहना और न रहना दोनों ही सम्भव

सूत्र १३-१४ ] अध्याय ४ ४५९

सूत्र १३-१४ ] अध्याय ४ ४५९
है। जैसे द्वादशाह-यज्ञ श्रुतिमें कहीं अनेककर्तृक होनेपर ‘सत्र’ और
नियतकर्तृक होनेपर ‘अहीन’ माना गया है, उसी तरह यहाँ भी श्रुतिमें
दोनों प्रकारका कथन होनेसे मुक्तात्माका स्थूल शरीरसे युक्त होकर
दिव्य भोगोंका भोगना और बिना शरीरके केवल मनसे ही उनका
उपभोग करना भी सम्भव है। उसकी यह दोनों प्रकारकी स्थिति
उचित है, इसमें कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—बिना शरीरके केवल मनसे उपभोग कैसे होता है? इस
जिज्ञासापर कहते हैं—
तन्वभावे संध्यवदुपपत्तेः ॥ ४।४।१३ ॥
तन्वभावे = शरीरके अभावमें; संध्यवत् = स्वप्नकी भाँति (भोगोंका
उपभोग होता है); उपपत्तेः = क्योंकि यही मानना युक्तिसंगत है।
व्याख्या—जैसे स्वप्नमें स्थूल शरीरके बिना मनसे ही समस्त
भोगोंका उपभोग होता देखा जाता है, वैसे ही ब्रह्मलोकमें भी बिना
शरीरके समस्त दिव्य भोगोंका उपभोग होना सम्भव है; इसलिये
बादरिकी यह मान्यता सर्वथा उचित ही है।
सम्बन्ध—शरीरके द्वारा किस प्रकार उपभोग होता है? इस जिज्ञासापर
कहते हैं—
भावे जाग्रद्वत् ॥ ४।४।१४॥
भावे=शरीर होनेपर; जाग्रद्वत्=जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति (उपभोग
होना युक्तिसंगत है)।
व्याख्या—आचार्य जैमिनिके मतानुसार जिस मुक्तात्माको शरीरकी
उपलब्धि होती है, वह उसके द्वारा उसी प्रकार भोगोंका उपभोग
करता है, जैसे यहाँ जाग्रत्-अवस्थामें साधारण मनुष्य विषयोंका
अनुभव करता है। ब्रह्मलोकमें ऐसा होना भी सम्भव है; इसलिये दोनों
प्रकारकी स्थिति माननेमें कोई आपत्ति नहीं है।
सम्बन्ध—जैमिनिने जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है, उसके अनुसार मुक्तात्माके

४६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
अनेक शरीर होनेकी बात ज्ञात होती है, इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि वे
अनेक शरीर निरात्मक होते हैं या उनका अधिष्ठाता इससे भिन्न होता है ?
इसपर कहते हैं—
प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति ॥ ४।४।१५ ॥
प्रदीपवत् = दीपककी भाँति; आवेशः = सभी शरीरोंमें मुक्तात्माका
प्रवेश हो सकता है; हि = क्योंकि; तथा दर्शयति = श्रुति ऐसा दिखाती है।
व्याख्या—जैसे अनेक दीपकोंमें एक ही अग्नि प्रकाशित होती
है अथवा जिस प्रकार अनेक बल्बोंमें बिजलीकी एक ही शक्ति व्याप्त
होकर उन सबको प्रकाशित कर देती है, उसी प्रकार एक ही मुक्तात्मा
अपने संकल्पसे रचे हुए समस्त शरीरोंमें प्रविष्ट होकर दिव्यलोकके
भोगोंका उपभोग कर सकता है; क्योंकि श्रुतिमें उस एकका ही अनेक
रूप होना दिखाया गया है (छा० उ० ७।२६।२)।
सम्बन्ध—मुक्तात्मा तो समुद्रमें नदियोंकी भाँति नाम-रूपसे मुक्त होकर
उस परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन हो जाता है (मु० उ० ३।२।८), यह बात
पहले कह चुके हैं। इसके सिवा और भी जगह-जगह इसी प्रकारका वर्णन
मिलता है। फिर यहाँ उनके नाना शरीर धारण करनेकी और यथेच्छ भोगभूमियोंमें
विचरनेकी बात कैसे कही गयी है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ॥ ४।४।१६ ॥
स्वाप्ययसम्पत्त्योः = सुषुप्ति और परब्रह्मकी प्राप्ति—इन दोनोंमेंसे;
अन्यतरापेक्षम् = किसी एककी अपेक्षासे कहे हुए (वे वचन हैं);
हि = क्योंकि; आविष्कृतम् = श्रुतियोंमें इस बातको स्पष्ट किया गया है।
व्याख्या—श्रुतिमें जो किसी प्रकारका ज्ञान न रहनेकी और समुद्रमें
नदीकी भाँति उस परमात्मामें मिल जानेकी बात कही गयी है, वह कार्यब्रह्मके
लोकोंको प्राप्त होनेवाले अधिकारियोंके विषयमें नहीं है; अपितु लय-अवस्थाको
लेकर वैसा कथन है (छा० उ० ६।८।१; प्र० उ० ४।७, ८)। (प्रलयकालमें

सूत्र १७] अध्याय ४ ४६१

सूत्र १७] अध्याय ४ ४६१
भी प्राणियोंकी स्थिति सुषुप्तिकी भाँति ही रहती है, इसलिये उसका पृथक्
उल्लेख सूत्रमें नहीं किया, यही अनुमान होता है)। अथवा परब्रह्मकी प्राप्ति
अर्थात् सायुज्य मुक्तिको लेकर वैसा कहा गया है (मु० उ० ३।२।८; बृह०
उ० २।४।१२)। भाव यह कि लय-अवस्था और सायुज्य मुक्ति इन
दोनोंमेंसे किसी एकके उद्देश्यसे वैसा कथन है; क्योंकि ब्रह्मलोकोंमें जानेवाले
अधिकारियोंके लिये तो स्पष्ट शब्दोंमें वहाँके दिव्य भोगोंके उपभोगकी,
अनेक शरीर धारण करनेकी तथा यथेच्छ लोकोंमें विचरण करनेकी बात
श्रुतिमें उन-उन स्थलोंमें कही गयी है। इसलिये किसी प्रकारका विरोध या
असम्भव बात नहीं है।
सम्बन्ध — यदि ब्रह्मलोकमें गये हुए मुक्त आत्माओंमें इस प्रकार अपने
अनेक शरीर रचकर भोगोंका उपभोग करनेकी सामर्थ्य है, तब तो उनमें
परमेश्वरकी भाँति जगत्की रचना आदि कार्य करनेकी भी सामर्थ्य हो जाती
होगी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ॥४।४।१७॥
जगद्व्यापारवर्जम् = जगत्की रचना आदि व्यापारको छोड़कर और बातोंमें
ही उनकी सामर्थ्य है; प्रकरणात् = क्योंकि प्रकरणसे यही सिद्ध होता है;
च = तथा; असन्निहितत्वात् = जगत्की रचना आदि व्यापारसे इनका कोई
निकट सम्बन्ध नहीं दिखाया गया है (इसलिये भी वही बात सिद्ध होती है)।
व्याख्या — जहाँ-जहाँ इस जड-चेतनात्मक समस्त जगत्की उत्पत्ति,
संचालन और प्रलयका प्रकरण श्रुतियोंमें आया है (तै० उ० ३।१; छा०
उ० ६।२।१—३; ऐ० उ० १।१; बृह० उ० ३।७।३ से २३ तक;
शतपथ० १४।३।५।७ से ३१ तक); वहाँ सभी जगह यह कार्य उस
परब्रह्म परमात्माका ही बताया गया है। ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले
मुक्तात्माओंका सृष्टिरचनादि कार्यसे सम्बन्ध कहीं नहीं बताया गया है।
इन दोनों कारणोंसे यही बात सिद्ध होती है कि इस जड-चेतनात्मक

४६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
समस्त जगत्की रचना, उसका संचालन और प्रलय आदि जितने भी कार्य
हैं, उनमें उन मुक्तात्माओंका कोई हाथ या सामर्थ्य नहीं है; वे केवल
वहाँके दिव्य भोगोंका उपभोग करनेकी ही यथेष्ट सामर्थ्य रखते हैं।
सम्बन्ध — इसपर पूर्वपक्ष उठाकर उसके समाधानपूर्वक पूर्व सूत्रमें
कहे हुए सिद्धान्तको पुष्ट करते हैं—
प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डल-
स्थोक्तेः ॥ ४ । ४ । १८ ॥
चेत् = यदि कहो कि; प्रत्यक्षोपदेशात् = वहाँ प्रत्यक्षरूपसे इच्छानुसार
लोकोंमें विचरनेका उपदेश है, अर्थात् वहाँ जाकर इच्छानुसार कार्य
करनेका अधिकार बताया गया है; इति न = तो यह बात नहीं है;
आधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः = क्योंकि वह कहना अधिकारियोंके लोकोंमें
स्थित भोगोंका उपभोग करनेके लिये ही है।
व्याख्या — यदि कोई ऐसी शंका करे कि 'वह स्वराट् हो जाता
है, उसकी समस्त लोकोंमें इच्छानुसार गमन करनेकी शक्ति हो जाती
है।' (छा० उ० ७।२५।२) 'वह स्वराज्यको प्राप्त हो जाता है।'
(तै० उ० १।६।२) इत्यादि श्रुतिवाक्योंमें उसे स्पष्ट शब्दोंमें स्वराट्
और स्वराज्यको प्राप्त बताया है तथा इच्छानुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें
विचरनेकी सामर्थ्यसे सम्पन्न कहा गया है, इससे उसका जगत्की
रचना आदिके कार्यमें अधिकार है, यह स्वतः सिद्ध हो जाता है, तो
ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ यह भी कहा है कि 'वह सबके मनके
स्वामीको प्राप्त हो जाता है' (तै० उ० १।६।२)। अतः उसकी सब
सामर्थ्य उस ब्रह्मलोककी प्राप्तिके प्रभावसे है और ब्रह्माके अधीन है,
इसलिये जगत्के कार्यमें हस्तक्षेप करनेकी उसमें शक्ति नहीं है। उसे
जो शक्ति और अधिकार दिये गये हैं, वे केवल उन-उन अधिकारियोंके
लोकोंमें स्थित भोगोंका उपभोग करनेकी स्वतन्त्रताके लिये ही हैं।
अतः वह कथन वहींके लिये है—

सूत्र १९-२०] अध्याय ४ ४६३

सूत्र १९-२०] अध्याय ४ ४६३
सम्बन्ध - यदि इस प्रकार उन-उन लोकोंके विकारमय भोगोंका उपभोग
करनेके लिये ही वे सब शरीर, शक्ति और अधिकार आदि उसे मिले हैं, तब
तो देवलोकोंको प्राप्त होनेवाले कर्माधिकारियोंके सदृश ही ब्रह्मविद्याका भी
फल हुआ, इसमें विशेषता क्या हुई ? इस जिज्ञासापर कहते हैं-
विकारावर्ति च तथा हि स्थितिमाह ॥४।४।१९॥
च = इसके सिवा; विकारावर्ति = वह मुक्तात्मा जन्मादि विकारोंसे
रहित ब्रह्मरूप फलका अनुभव करता है; हि= क्योंकि; तथा=उसकी
वैसी; स्थितिम् = स्थिति; आह = श्रुति कहती है।
व्याख्या - श्रुतिमें ब्रह्मविद्याका मुख्य फल परब्रह्मकी प्राप्ति बताया
गया है, 'जो जन्म, जरा आदि विकारोंको न प्राप्त होनेवाला, अजर-अमर,
समस्त पापोंसे रहित तथा कल्याणमय दिव्य गुणोंसे सम्पन्न है।' (छा०
उ० ८।१।५) इसलिये यही सिद्ध होता है कि उसको प्राप्त होनेवाला
फल कर्मफलकी भाँति विकारी नहीं है। ब्रह्मलोकके भोग तो आनुषंगिक
फल हैं। ब्रह्मविद्याकी सार्थकता तो परब्रह्मकी प्राप्ति करानेमें ही है। श्रुतिमें
उस मुक्तात्माकी ऐसी ही स्थिति बतायी गयी है- 'यदा ह्येवैष
एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ
सोऽभयं गतो भवति ॥' (तै० उ० २।७) अर्थात् 'जब यह जीवात्मा
इस देखनेमें न आनेवाले, शरीररहित बतलानेमें न आनेवाले तथा दूसरेका
आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें निर्भयतापूर्वक स्थिति लाभ करता
है, तब वह निर्भय पदको प्राप्त हो जाता है।'
सम्बन्ध - पहले कहे हुए सिद्धान्तको ही प्रमाणसे दृढ़ करते हैं-
दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॥ ४।४।२०॥
प्रत्यक्षानुमाने = श्रुति और स्मृति; च=भी; एवम् = इसी प्रकार; दर्शयतः =
दिखलाती हैं।
व्याख्या - श्रुतिमें स्पष्ट कहा है कि 'वह परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने

४६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
वास्तविक रूपसे सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा है, यही अमृत एवं अभय
है और यही ब्रह्म है।' (छा० उ० ८।३।४) ब्रह्मलोक अन्य लोकोंकी भाँति
विकारी नहीं है। श्रुतिमें उसे नित्य (छा० उ० ८।१३।१), सब पापोंसे रहित
(छा० उ० ८।४।१) तथा रजोगुण आदिसे शून्य—विशुद्ध (प्र० उ० १।१६)
कहा गया है। गीतामें भी कहा है कि 'इस ज्ञानकी उपासना करके मेरे सदृश
धर्मोंको अर्थात् निर्लेपता आदि दिव्य कल्याणमय भावोंको प्राप्त हो जाते हैं,
अतः वे न तो जगत्की रचनाके कालमें उत्पन्न होते हैं और न प्रलयकालमें
मरनेका दुःख ही भोगते हैं।'* इस प्रकार श्रुतियों और स्मृतियोंमें जगह-
जगह मुक्तात्माकी वैसी स्थिति दिखायी गयी है। उसका जो उन-उन
अधिकारिवर्गोंके लोकोंमें जाना-आना और वहाँके भोगोंका उपभोग करना
है, वह लीलामात्रा है, बन्धनकारक या पुनर्जन्मका हेतु नहीं है।
सम्बन्ध—ब्रह्मलोकमें जानेवाले मुक्तात्माका जगत्की उत्पत्ति आदिमें
अधिकार या सामर्थ्य नहीं है, इस पूर्वोक्त बातको इस प्रकरणके अन्तमें पुनः
सिद्ध करते हैं—
भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च ॥ ४।४।२१ ॥
भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् = भोगमात्रमें समतारूप लक्षणसे; च = भी (यही
सिद्ध होता है कि उसका जगत्की रचना आदिमें अधिकार नहीं होता)।
व्याख्या—जिस प्रकार वह ब्रह्मा समस्त दिव्य कल्याणमय
भोगोंका उपभोग करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार
यह मुक्तात्मा भी उस ब्रह्मलोकमें रहते समय, उपासनाकालमें की हुई
भावनाके अनुसार प्राप्त हुए वहाँके दिव्य भोगोंका बिना शरीरके
स्वप्नकी भाँति केवल संकल्पसे या शरीर-धारणपूर्वक जाग्रत्की
भाँति उपभोग करके भी उनसे लिप्त नहीं होता। इस प्रकार
भोगमात्रमें उस ब्रह्माके साथ उसकी समानता है। इस लक्षणसे भी

  • इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।
    सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥ (गीता १४। २)

सूत्र २२ ] अध्याय ४ ४६५

सूत्र २२ ] अध्याय ४ ४६५
यही सिद्ध होता है कि जगत्की रचना आदि कार्यमें उसका ब्रह्माके
समान किसी भी अंशमें अधिकार या सामर्थ्य नहीं है।
सम्बन्ध — यदि ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले मुक्त आत्माकी सामर्थ्य सीमित
है, परमात्माके समान असीम नहीं है, तब तो उसके उपभोगका समय पूर्ण
होनेपर उसका पुनर्जन्म भी हो सकता है? इसपर कहते हैं—
अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ॥ ४ । ४ । २२ ॥
अनावृत्तिः = ब्रह्मलोकमें गये हुए आत्माका पुनरागमन नहीं होता;
शब्दात् = यह बात श्रुतिके वचनसे सिद्ध होती है; अनावृत्तिः = पुनरागमन
नहीं होता; शब्दात् = यह बात श्रुतिके वचनसे सिद्ध होती है।
व्याख्या—श्रुतिमें बार-बार यह बात कही गयी है कि ब्रह्मलोकमें
गया हुआ साधक वापस नहीं लौटता (बृह० उ० ६।२।१५; प्र० उ०
१।१०; छा० उ० ८।६।६; ४।१५।६; ८।१५।१)। इस शब्द-प्रमाणसे
यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मलोकमें जानेवाला अधिकारी वहाँसे इस लोकमें
नहीं लौटता। 'अनावृत्तिः शब्दात्' इस वाक्यकी आवृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति
सूचित करनेके लिये है।
चौथा पाद सम्पूर्ण
श्रीवेदव्यासरचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-का चौथा
अध्याय पूरा हुआ।
॥ वेदान्त-दर्शन सम्पूर्ण ॥

श्रीमद्बादरायणप्रणीतब्रह्मसूत्राणां वर्णानुक्रमणिका

श्रीमद्बादरायणप्रणीतब्रह्मसूत्राणां वर्णानुक्रमणिका
अ० पा० सू० अ० पा० सू०
अ० अत एव प्राणः ........................... १ १ २३
अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि अतः प्रबोधोऽस्मात् ................... ३ २ ८
दाशकितवादित्वमधीयत एके ... २ ३ ४३ अतश्चायनेऽपि दक्षिणे ............ ४ २ २०
अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि अतस्त्वितरज्जायो लिंगाच्च ..... ३ ४ ३९
दर्शयति ................................... २ ४ ११ अतिदेशाच्च ............................... ३ ३ ४६
अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्य- अतोऽनन्तेन तथा हि लिंगम् .... ३ २ २६
तद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम् .. ३ ३ ३३ अतोऽन्यापि ह्येकेषामुभयोः ..... ४ १ १७
अक्षरमम्बरान्तधृतेः ................. १ ३ १० अत्ता चराचरग्रहणात् ............. १ २ ९
अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ............. १ १ १
तद्दर्शनात् ................................ ४ १ १६ अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ... १ २ २१
अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न अदृष्टानियमात् .......................... २ ३ ५१
भाक्तत्वात् ................................ ३ १ ४ अधिकं तु भेदनिर्देशात् ............ २ १ २२
अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं
प्रतिवेदम् ................................. ३ ३ ५५ तद्दर्शनात् ................................ ३ ४ ८
अंगित्वानुपपत्तेश्च .................... २ २ ८ अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ............... २ २ ३९
अंगेषु यथाश्रयभावः ............... ३ ३ ६१ अध्ययनमात्रवतः ................... ३ ४ १२
अचलत्वं चापेक्ष्य .................... ४ १ ९ अनभिभवं च दर्शयति ........... ३ ४ ३५
अणवश्च .................................. २ ४ ७ अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः .. १ २ १७
अणुश्च .................................... २ ४ १३ अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे
अतएव च नित्यत्वम् ............ १ ३ २९ तदवधेः ................................... ४ १ १५
अत एव च सर्वाण्यनु ............. ४ २ २ अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ............ ३ ४ ५०
अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा .... ३ ४ २५ अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः
अत एव चानन्याधिपतिः ........ ४ ४ ९ शब्दात् ................................... ४ ४ २२
अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ... ३ २ १८ अनियमः सर्वेषामविरोधः
अत एव न देवता शब्दानुमानाभ्याम् .................. ३ ३ ३१
भूतं च .................................... १ २ २७ अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ३ १ १२

( ४६७ )
अ० पा० सू० | अ० पा० सू०
अनुकृतेस्तस्य च .................... १ ३ २२ | अन्यभावव्यावृत्तेश्च ............... १ ३ १२
अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धा- | अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् ३ १ २४
ज्ज्योतिरादिवत् .................... २ ३ ४८ | अन्यार्थं तु जैमिनिः प्रश्न-
अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ............ १ २ ३ | व्याख्यानाभ्यामपि चैवमेके .... १ ४ १८
अनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तर- | अन्यार्थश्च परामर्शः ............ १ ३ २०
पृथक्त्ववद् दृष्टश्च तदुक्तम् .... ३ ३ ५० | अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात् ३ ३ १७
अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ३ ४ १९ | अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ..... २ २ १७
अनुस्मृतेर्बादरिः .................... १ २ ३० | अपि च सप्त .................... ३ १ १५
अनुस्मृतेश्च ........................... २ २ २५ | अपि च स्मर्यते .................... १ ३ २३
अनेन सर्वगतत्वमायाम- | अपि च स्मर्यते .................... २ ३ ४५
शब्दादिभ्यः .......................... ३ २ ३७ | अपि च स्मर्यते .................... ३ ४ ३०
अन्तर उपपत्तेः .................... १ २ १३ | अपि च स्मर्यते .................... ३ ४ ३७
अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ..... ३ ४ ३६ | अपि चैवमेके .................... ३ २ १३
अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः .... ३ ३ ३५ | अपि च संराधने प्रत्यक्षानु-
अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण | मानाभ्याम् .......................... ३ २ २४
तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ... २ ३ १५ | अपीतौ तद्वत्प्रसंगादसमंजसम् २ १ ८
अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्म- | अप्रतीकालम्बनान्नयतीति
व्यपदेशात् .......................... १ २ १८ | बादरायण उभयथाऽदोषात्तत्क्रतुश्च ४ ३ १५
अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ............ २ २ ४१ | अबाधाच्च .......................... ३ ४ २९
अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ............ १ १ २० | अभावं बादरिराह ह्येवम् ...... ४ ४ १०
अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वा- | अभिध्योपदेशाच्च ................... १ ४ २४
दविशेषः ............................ २ २ ३६ | अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानु-
अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् २ २ ५ | गतिभ्याम् ............................. २ १ ५
अन्यथात्वं शब्दादिति | अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ......... १ २ २९
चेन्नाविशेषात् .................... ३ ३ ६ | अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ..... २ ३ ५२
अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्ति- | अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ....... २ २ ६
वियोगात् ........................... २ २ ९ | अम्बुवद्ग्रहणात्तु न तथात्वम् ३ २ १९
अन्यथाभेदानुपपत्तिरिति चेन्नोप- | अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ३ २ १४
देशान्तरवत् ........................ ३ ३ ३६ | अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ......... ४ ३ १

( ४६८ )
अ० पा० सू० | अ० पा० सू०
अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च | देशात् ................................ १ ३ ४१
नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं | आचारदर्शनात् ..................... ३ ४ ३
व्योमवच्च ...................१ २ ७ | आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात् ....... ४ ३ ४
अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ...... १ ३ २१ | आत्मकृतेः ........................... १ ४ २६
अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्ना- | आत्मगृहीतिरित्यरवदुत्तरात् ....... ३ ३ १६
ध्युपगमाद्धृदि हि ............. २ ३ २४ | आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि २ १ २८
अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः .... १ ४ २२ | आत्मशब्दाच्च ...................... ३ ३ १५
अविभागेन दृष्टत्वात् ........... ४ ४ ४ | आत्मा प्रकरणात् ................. ४ ४ ३
अविभागो वचनात् ............. ४ २ १६ | आत्मेति तूपगच्छन्ति
अविरोधश्चन्दनवत् ............. २ ३ २३ | ग्राहयन्ति च ......................... ४ १ ३
अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ..... ३ १ २५ | आदरादलोपः ....................... ३ ३ ४०
अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ..... २ १ २३ | आदित्यादिमतयश्चांग उपपत्तेः ४ १ ६
अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां | आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ... ३ ३ १४
प्रतीतेः ............................... ३ १ ६ | आनन्दमयोऽभ्यासात् ............ १ १ १२
असति प्रतिज्ञोपरोधो यौग- | आनन्दादयः प्रधानस्य ......... ३ ३ ११
पद्यमन्यथा .......................... २ २ २१ | आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ३ १ १०
असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् २ १ ७ | आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न
असद्व्यपदेशानेति चेन्न | शरीररूपकविन्यस्तगृहीते-
धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ......... २ १ १७ | र्दर्शयति च ......................... १ ४ १
असंततेश्चाव्यतिकरः ............. २ ३ ४९ | आपः ................................ २ ३ ११
असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः .... २ ३ ९ | आ प्रायणात्तत्रापि हि
असार्वत्रिकी ......................... ३ ४ १० | दृष्टम् ................................. ४ १ १२
अस्ति तु ............................ २ ३ २ | आभासा एव च .................. २ ३ ५०
अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति १ १ १९ | आमनन्ति चैनमस्मिन् ............ १ २ ३२
अस्यैव चोपपत्तेरेष ऊष्मा .... ४ २ ११ | आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि
आ० | परिक्रीयते ........................... ३ ४ ४५
आकाशस्तल्लिङ्गात् ............. १ १ २२ | आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ............. ४ १ १
आकाशे चाविशेषात् ............२ २ २४ | आसीनः सम्भवात् .............. ४ १ ७
आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यप- | आह च तन्मात्रम् ............. ३ २ १६

( ४६९ )
अ० पा० सू० अ० पा० सू०
इ० तदुक्तम् ३ ४ ४२
इतरपरामर्शात् स इति उपमर्दं च ३ ४ १६
चेन्नासम्भवात् १ ३ १८ उपलब्धिवदनियमः २ ३ ३७
इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादि- उपसंहारदर्शनानेति चेन्न
दोषप्रसक्तिः २ १ २१ क्षीरवद्धि २ १ २४
इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तु ४ १ १४ उपसंहारोऽर्थभेदाद्विधिशेष-
इतरेतरप्रत्ययत्वादितिचेन्नो- वत्समाने च ३ ३ ५
त्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् २ २ १९ उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ३ ३ ४१
इतरे त्वर्थसामान्यात् ३ ३ १३ उपादानात् २ ३ ३५
इतरेषां चानुपलब्धेः २ १ २ उभयथा च दोषात् २ २ १६
इयदामननात् ३ ३ ३४ उभयथा च दोषात् २ २ २३
ई० उभयथापि न कर्मातस्तदभावः २ २ १२
ईक्षकतिकर्मव्यपदेशात् सः १ ३ १३ उभयव्यपदेशात्वहिकुण्डलवत् ३ २ २७
ईक्षतेर्नाशब्दम् १ १ ५ उभयव्यामोहात्तत्सिद्धेः ४ ३ ५
उ० ऊ०
उत्क्रमिष्यत एवं भावादित्यौ- ऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि ३ ४ १७
डुलोमिः १ ४ २१ ए०
उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् २ ३ १९ एक आत्मनः शरीरे भावात् ३ ३ ५३
उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु १ ३ १९ एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः २ ३ ८
उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् २ २ २० एतेन योगः प्रत्युक्तः २ १ ३
उत्पत्त्यसम्भवात् २ २ ४२ एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि
उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः २ २ २७ व्याख्याताः २ १ १२
उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मि- एतेन सर्वे व्याख्याता
न्नप्यविरोधात् १ १ २७ व्याख्याताः १ ४ २९
उपपत्तेश्च ३ २ ३५ एवं चात्माकात्स्न्र्यम् २ २ ३४
उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च २ १ ३६ एवं मुक्तिफलानियमस्तदवस्थाय-
उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धे- वधृतेस्तदवस्थावधृतेः ३ ४ ५२
र्लोकवत् ३ ३ ३० एवमप्युपन्यासात्पूर्वभावा-
उपपूर्वमपि त्वेके भावमशनव- दविरोधं बादरायणः ४ ४ ७

( ४७० )
अ० पा० सू० अ० पा० सू०
ऐ० क्षणिकत्वाच्च ............................ २ २ ३१
ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन
तद्दर्शनात् ................................ ३ ४ ५१ लिंगात् .................................... १ ३ १५
क० ग०
कम्पनात् ................................ १ ३ ३९ गतिशब्दाभ्यां तथा दृष्टं लिंगं च १ ३ १५
करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ...... २ २ ४० गतिसामान्यात् ........................ १ १ १०
कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ......... २ ३ ३३ गतेरर्थवत्त्वमुभयथान्यथा हि
कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ................. १ २ ४ विरोधः .................................... ३ ३ २९
कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिव- गुणसाधारण्यश्रुतेश्च ................. ३ ३ ६४
दविरोधः ................................ १ ४ १० गुणाद्वा लोकवत् .................... २ ३ २५
कामकारेण चैके .................... ३ ४ १५ गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि
कामाच्च नानुमानापेक्षा ......... १ १ १८ तद्दर्शनात् ................................. १ २ ११
कामादीतरत्र तत्र गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ................. १ १ ६
चायतनादिभ्यः .................. ३ ३ ३९ गौण्यसम्भवात् ........................ २ ३ ३
काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेर- गाण्यसम्भवात् ........................ २ ४ २
न वा पूर्वहेत्वभावात् ......... ३ ३ ६० च०
कारणत्वेन चाकाशादिषु यथा- चक्षुरादिवत्तु तत्सहशिष्ट्या-
व्यपदिष्टोक्तेः ........................ १ ४ १४ दिभ्यः .................................... २ ४ १०
कार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः .. ४ ३ ७ चमसवदविशेषात् ................... १ ४ ८
कार्याख्यानादपूर्वम् .............. ३ ३ १८ चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति
कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः कार्ष्णाजिनिः ........................... ३ १ ९
परमभिधानात् ...................... ४ ३ १० चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात्तद्व्यपदेशो-
कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रति- भाक्तस्तद्भावभावित्वात् ......... २ ३ १६
षिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः .............. २ ३ ४२ चितितन्मात्रेण तदात्म-
कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां कत्वादित्यौडुलोमिः .............. ४ ४ ६
यथेतमनेवं च ...................... ३ १ ८ छ०
कृत्स्नभावात्तु गृहिणोपसंहारः ३ ४ ४८ छन्दत उभयथाविरोधात् ....... ३ ३ २८
कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्द- छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा
कोपो वा .............................. २ १ २६ चेतोऽर्पणनिगदात्तथा हि दर्शनम् १ १ २५

( ४७१ )
अ० पा० सू० अ० पा० सू०
ज० तथा च दर्शयति ..................... २ ३ २७
जगद्वाचित्वात् ..................... १ ४ १६ तथा चैकवाक्यतोपबन्धात् ..... ३ ४ २४
जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादस- तथान्यप्रतिषेधात् ................... ३ २ ३६
न्निहितत्वाच्च ..................... ४ ४ १७ तथा प्राणाः ......................... २ ४ १
जन्माद्यस्य यतः ................... १ १ २ तदधिगमे उत्तरपूर्वाघयोरश्लेष-
जीवमुख्यप्राणलिंगान्नेति विनाशौ तद्व्यपदेशात् .......... ४ १ १३
चेत्तद् व्याख्यातम् ................. १ ४ १७ तदधीनत्वादर्थवत् ................... १ ४ ३
जीवमुख्यप्राणलिंगान्नेति तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः २ १ १४
चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्त्वादिह तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति सम्परि-
तद्योगात् ............................. १ १ ३१ ष्क्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ..... ३ १ १
ज्ञेयत्वावचनाच्च ................. १ ४ ४ तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च... ३ २ ७
ज्ञोऽत एव ......................... २ ३ १८ तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ... १ ३ ३७
ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् २ ४ १४ तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात्सः २ ३ १३
ज्योतिरूपक्रमा तु तथा तद्व्यक्तमाह हि ..................... ३ २ २३
ह्यधीयत एके ....................... १ ४ ९ तदापीतेः संसारव्यपदेशात् ...... ४ २ ८
ज्योतिर्दर्शनात् ...................... १ ३ ४० तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात् १ ३ २६
ज्योतिश्चरणाभिधानात् .......... १ १ २४ तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो
ज्योतिषि भावाच्च ................. १ ३ ३२ विद्यासामर्थ्यात्तच्छेषगत्यनुस्मृति-
ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ........... १ ४ १३ योगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ४ २ १७
त० तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेशः
त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशादन्यत्र प्राज्ञवत् ................................. २ ३ २९
श्रेष्ठात् ........................... २ ४ १७ तद्धेतुव्यपदेशाच्च ..................... १ १ १४
तच्छ्रुतेः ............................ ३ ४ ४ तद्भूतस्य नातद्भावो जैमिनेरपि
तडितोऽधि वरुणः सम्बन्धात् ४ ३ ३ नियमाद्रूपाभावेभ्यः .......... ३ ४ ४०
तन्तु समन्वयात् .................... १ १ ४ तद्गतो विधानात् ................... ३ ४ ६
तत्पूर्वकत्वाद्वाचः .................. २ ४ ४ तन्निर्धारणा नियमस्तद्दृष्टेः पृथ-
तत्प्राक्छुतेश्च ...................... २ ४ ३ ग्ध्यप्रतिबन्धः फलम् ........... ३ ३ ४२
तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ३ १ १६ तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ........ १ १ ७
तत्साभाव्यापत्तिरुपपत्तेः .......... ३ १ २२ तन्मनः प्राण उत्तरात् ............ ४ २ ३

( ४७२ )
अ० पा० सू० अ० पा० सू०
तन्वभावे संध्यवदुपपत्तेः ....... ४ ४ १३ धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः १ ३ १६
तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथानुमेयमिति ध्यानाच्च ............................... ४ १ ८
चेदेवमप्यनिर्मोक्षप्रसंगः .. २ १ ११ न०
तस्य च नित्यत्वात् ............. २ ४ १६ न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात्....२ १ ३५
तानि परे तथा ह्याह ............ ४ २ १५ न च कर्तुः करणम् .......... २ २ ४३
तुल्यं तु दर्शनम् .............. ३ ४ ९ न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः ४ ३ १४
तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ३ १ २१ न च पर्यायादप्यविरोधो
तेजोऽतस्तथा ह्याह ............ २ ३ १० विकारादिभ्यः .................. २ २ ३५
त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च १ ४ ६ न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् १ २ १९
त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ..... ३ १ २ न चाधिकारिकमपि पतनानु-
द० मानात्तदयोगात् ................ ३ ४ ४१
दर्शनाच्च ............................. ३ १ २० न तु दृष्टान्तभावात् .......... २ १ ९
दर्शनाच्च ............................. ३ २ २१ न तृतीये तथोपलब्धेः ........ ३ १ १८
दर्शनाच्च ............................. ३ ३ ४८ न प्रतीके न हि सः ......... ४ १ ४
दर्शनाच्च ............................. ३ ३ ६६ न प्रयोजनवत्त्वात् ............. २ १ ३२
दर्शनाच्च ............................. ४ ३ १३ न भावोऽनुपलब्धेः ............ २ २ ३०
दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ..... ४ ४ २० न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमत्तद्वचनात् ३ २ १२
दर्शयति च ........................... ३ ३ ४ न वक्तुरात्मोपदेशादिति
दर्शयति च ........................... ३ ३ २२ चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन् १ १ २९
दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ३ २ १७ न वा तत्सहभावाश्रुतेः ........ ३ ३ ६५
दहर उत्तरेभ्यः ................... १ ३ १४ न वा प्रकरणभेदात्परोऽवरीय-
दृश्यते तु ........................... २ १ ६ स्त्वादिवत् ........................ ३ ३ ७
देवादिवदपि लोके .............. २ १ २५ न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ..... २ ४ ९
देहयोगाद्वा सोऽपि ............. ३ २ ६ न वा विशेषात् ................. ३ ३ २१
द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ....... १ ३ १ न वियदश्रुतेः .................... २ ३ १
द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ४ ४ १२ न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च
ध० शब्दात् ............................. २ १ ४
धर्मं जैमिनिरत एव ......... ३ २ ४० न संख्योपसंग्रहादपि नाना-
धर्मोपपत्तेश्च ................. १ ३ ९ भावादतिरेकाच्च ................... १ ४ ११