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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

( ८ ) सतसई-सटीक ।
समवाचक धरम, वर्ण चारि इक ठौर । शशिसों निर्मल मुख
यथा, पूरण उपमा गौर ॥ ] हँसी उपमेय, विष उपमान, बुरा
लगना धर्म ॥ १३ ॥
स्वेदसलिल रोमांच कुश, गहि दुलहिन असनाथ।
दियो हियो सँग नाथके, हाथलियेही हाथ ॥१४॥
गंधर्वविवाह सात्त्विकभाव हे सखि! विवाहके समय दूलह
और दुलहीने ( स्वेद ) पसीनारूपी जल और रोमांचरूपी
कुश ग्रहण कर हाथमें हाथ लियेही अपना हिया स्वामीके
संग कर दिया। विवाहमें पाणिग्रहण होतेही दोनोंने मन दि-
या [ आसीद्धरः कंटकितः प्रकोष्ठे स्विन्नाङ्गुलिः संववृते
कुमारी ] रूपक अलंकार ॥ १४ ॥
कहत न देवरकी कुवत, कुलतिय कलह डराति ॥
पंजरगत मंजार ढिग, शुकलौं सूखति जाति १५
( कुलतिय ) कुलवधू देवरकी कुटिल बातें नहीं कहती
क्लेशसे डरती है बिलावके ढिग बैठेहुए पींजरेमें पड़े तोतेके
समान सूखती जातीहै, दृष्टान्तालंकार [ दोहा-सम बिम्बनि
प्रतिबिम्ब गति, है दृष्टान्त सुढंग । पंजरगत मंजारढिग, शुक
वर्णन कविरंग ] ॥ १५ ॥
पारयो शोर सुहागको, इन बिनही पिय नेह ॥
उन दोही अँखियाँकि कै, कै अलसोंही देह॥१६॥

प्रथमशतक १. ( ९ )
हे सखी! इसने पियाके स्नेह विनाही सुहागका शोर डाला,
अर्थात् प्रीति प्रसिद्ध की, उनींदी आँखों अथवा अलसानी
देहसे यह बात जानी जातीहै। यदि कहो कि प्रीतमके नेह
बिन सुहाग प्रसिद्ध नहीं होता, तो उत्तर यह कि, यह नाय-
काकी निज सखीकी वचन सौतकी सखीसे, है कि इसकी प्री-
तिको किसी सौतकी कुदृष्टि न लगे। पर्यायोक्ति। [ दोहा-
पर्यायोक्ति जहां नई, रचनासों कछु बात । साधै इष्ट
बनायकै, निज छल नहीं लखात ॥ ] ॥ १६ ॥
छुटी न शिशुताकी झलक, झलक्यो यौवन अंग।
दीपति देह दुहूँन मिलि, दिपति ताफता रंग १७
बालकपनकी झलक नहीं छुटी, कि अंगमें यौवन
छलका, दोनोंके मिलनेसे देहकी दीति ताफतारंगके
समान चमकतीहै, वयसन्धि वर्णन. ताफता-धूपछांहको
कहतेहैं जैसे इसमें ताने बानेके दोनों रंग चमकतेहैं इसप्रकार
उसके अंगमें बालपन और यौवन झलकताहै। वाचकलु-
प्तोपमा [दोहा-उपमे यरु उपमा धरमा, वाचक कह तहँ पाठ।
इकबिन द्वैबिन तीनबिन, सो लुप्तोपम पाठ ] ॥ यह जयपुरी
दृश्यहै ॥ १७ ॥
तिय तिथि तरणि किशोर वय, पुण्यकालसमदौन।
काहू पुण्यनि पाइयत, वय संधि संक्रॉन ॥१८॥

( १० ) सतसई-सटीक ।
सखीका कृष्णसे अन्य सखीका रूप कहना, वह सखी
तिथिहै तरुण अवस्था सूर्य है, पुण्यकाल समान दोनों अव-
स्था हैं, कोई किसी पुण्यसेही अवस्था और संक्रांतिकी संधि
पाताहै, अर्थात् ऐसे समय तियाका मिलना भाग्यसे होताहै
जब कि, बाल अवस्था छूटकर तरुणाई आती हो, सूर्य राशि
छोडकर दूसरीमें जाताहै यह संक्रान्तिका पुण्यकालहै सवि-
षय सावयव रूपकालंकार। [दोहा-रूपक सविषय सावयव,
सकल वस्तु जुवखाना रूप कीजिये ह्यां वयहि, अंग संक्रमण
जान ॥] ॥ १८ ॥
लालअलौकिक लरिकईं, लखिलाखिसखीसिहाँति
आज कालमें देखियत, उर उकसौहीं भांति १९
हे कृष्ण! उस सखीकी अलौकिक लोकोत्तर लरिकाई देखकर
सखी प्रसन्न होतीहै, कारण कि आज कलमेंही उरोज उकसे
से दीखनेवालेहैं। लोकोक्ति अलंकार [दोहा-लोक कहन वर्ण-
न जहां, लोकोक्ति कहि ताहि । आजकाल यह लोककी
कहन प्रसिद्ध चितचाहि॥] ॥ १९॥
अपने अंगके जानिक, यौवन नृपति प्रवीन ॥
स्तन नयन नितम्बको, बडो इजाफा कीन ॥२०॥
चतुर यौवन राजाने अपने (अंगके) सहायक जानकर

प्रथमशतक १. ( ११ )
कुच, मन, नेत्र (नितम्ब) कटिपश्चाद्भाग इनकी अधिक-
तर वृद्धि की। हेतूत्प्रेक्षालंकार ॥ २० ॥
नवनागरि तनु मुलक लहि, यौवन आमिल जोर।
घटि बढिते बढिघटि रकम, करी औरकी और २१

  • यौवनरूपी (आमिल) हाकिमने नवनागरीका शरीररूपी
    देश पाकर, अपने बलसे घटी बढी वस्तुकी बढा घटाकर और
    की और ही करडाली, अर्थात् लरिकाईंको निकालदिया,
    कमरको घटादिया, आंखें, केश, स्तन, नितम्ब, चतुराईको
    बढादिया, स्वाभाविक चेष्टा चाल चलनको औरका और ही
    करादिया। सविषयसावयवरूपकालंकार ॥ २१ ॥
    ज्यों २ यौवन जेठदिन,कुचमितअतिअधिकाति
    त्यों २ क्षण२ कटिक्षपा,क्षीण परत नित जाति २२
    जैसे जेठके महीनेमें दिनका प्रमाण चढता है तैसे यौवनके
    आनेसे कुचोंका प्रमाण बढताहै, जैसे २ जेठके महीनेकी रात
    घटतीहै त्यों त्यों उसकी कमर घटती जातीहै, अति
    अधिकात का भाव यह कि, यौवनसे स्तन बढे और
    स्तनसे शोभा बढी। तद्रूपरूपकालंकार ॥ २२ ॥
    बाढत तो उर उरज भर, भर तरुणईं बिकाम ॥
    बोझनि सौंतनिके हिये, आवत रुंध उमाग २३

( १२ ) सतसई-सटीक ।
तेरा हृदय कुचोंके बोझ और युवावस्थाके खिलनेकी चम-
कसे बढताहै. इन बोझोंसे सौतोंके हियेमें घुटकर श्वास
आताहै । असंगतिअलंकार ॥ २३ ॥
भावक उभरोहों भयो,कछुक पन्यो भरु आय॥
सीपहराके मिस हियो, निशदिन हेरतजाय २४
हृदय थोडासा एक ऊँचासा हुआ और कुछेक बोझ आ-
कर पड़ा, सीपके हारके बहानेसे छाती रात दिन देखते जा-
यहै, भरु-बोझ । पर्यायोक्ति । [ दोहा-छलकर साधिय इष्ट
जहँ, पर्यायोक्ति विशिष्ट । सीपहराके मिस हियो, लखति
सुसाधति इष्ट ] ज्ञातयौवनामुग्धाहै ॥ २४ ॥
देह दुल्हैयाकी बढै; ज्यों ज्यों यौवनज्योति ॥
त्योंत्यों लखि सौतैं सबै,वदन मलिनद्युतिहोति २५
ज्यों ज्यों दुलहिनकी देह बढतीहै, त्यों२ यौवनकी ज्योति
बढती है, तैसे तैसेही देखकर सौतोंके मुखकी कांति मलीन
होतीहै । नवोढा मुग्धा । उल्लासालंकार [ दोहा-इकके गुणसे
होय जहँ, औरहि दोष उलास । दुलहीके गणते बढ्यो, सौ-
तिन दोष प्रकास ॥ ] ॥ २५ ॥
मानो मुख दिखरावनो, दुलहिन करि अनुराग ॥
साससदन मन ललनहूं, सौतिन दियो सुहाग २६

प्रथमशतक १. (१३)
मानो मुख दिखानेके बहानेसे प्रेमकरके दुलहीको सासने
घर, पतिने मन, और सौतोंने सुहाग अर्थात् पतिका प्यार
दियाहै, प्रसिद्धहै कि, नई बहूको मुख दिखरावनी दीजातीहै।
हेतूत्प्रेक्षालंकार ॥ २६ ॥
निरखि नवोढा नारि तनु,छुटत लरकईं लेस ॥
भो प्यारो प्रीतम तियन,मानहुँ चलत विदेस॥२७
नवोढा स्त्रीका शरीर देखकर लरिकाईंका लगाव छूटने
लगा तब प्रियतम स्त्रियोंको इसप्रकार प्यारा लगने लगा
मानो परदेशको चलताहै,परदेश जातेसमय पुरुष बहुत प्रिय
लगताहै । हेतूत्प्रेक्षा ॥ २७ ॥
ढीठो दै बोलति हँसति,प्रौढ विलास अप्रौढ ॥
त्योंत्योंचलतनपियनयन, छकयेछकीनवौढ २८
यह सखी ढिठाई देकर बोलती और हँसती है इसकी
लीला प्रौढाकीसीहै, औरयह प्रौढा नहीं है, जैसेयह लीला क-
रतीहै तैसे २ प्रीतमके नयन इसकी ओर लगनेसे चलायमान
नहीं होते, यौवन रूपकी मतवाली नवोढाने मतवाला कि-
याहै।स्वभावोक्ति[दोहा-सुधी सुधी बातसे, स्वभावोक्ति पहि-
चान। लीला बोलन हँसनकी, तिय स्वभावमें मान॥ २८ ॥
चालकी बातें चलीं, सुनत सखिनके टोल ॥

( १४ ) सतसई-सटीक ।
गोयेहू लोचन हँसति, विहँसत जात कपोल २९॥
सखियोंके समूहमें गौनेकी बातें सुनकर आंखें छिपाकर
भी हँसती है, और गाल हँसीसे मानों मुसकुराते जातेहैं। स्व-
भावोक्ति । छलिता कामामुग्धाहै ॥ २९ ॥
लखि दौरत पियकर कटक, वास छुडावनकाज॥
वरुनी वन दृगगढनिमैं, रही पैठिकरि लाज ३०
देखकर प्रीतमका हाथरूपी कटक जो वस्त्र और ठौर छु-
टानेके कामको दौडताहै, उस समय वरौनियोंके वन और
नेत्ररूपी दुर्गमें मानो भाजकर लाजने वास कियाहै। सुरतके
समय लाज मानों पलकोंके बालोंमें छिपी । सविषय सावयव
रूपक ॥ ३० ॥
दीप उजेरेहू पतिहि, हरत वसन रतिकाज ॥
रही लपटि छबिकी छटानि, नेकौ छूटी न लाज ३१
दीप उजेरेहीमें जब पतिने रतिके निमित्त वस्त्र हरणकिये,
तबभी वह छबिकी छटाकी ज्योतिसे लिपटीही रही नेकभी
लाज न छूटी इसकारण पतिका यत्न न पूरा हुआ । विशे-
षोक्ति [ दोहा-विशेषोक्ति कारज नहीं, कारणकी अधिकाय ।
निलज करनको यत्न किय, लाज न छूटन पाय ] ॥ ३१ ॥
समरस समर संकोचवश, विवसन ठिकुठहराय।

प्रथमशतक १. ( १५ )
फिरिफिरिउझकतिफिरिदुरति, दुरिडरिउझकतिजाय
समान गुणवाले काम और संकोच (लाज) के वड़ासे
अवश हो ठीक नहीं ठहरती, फिर फिरकर झाँकतीहै, फिर
छिपतीहै फिर आके छिप २ कर झाँकतीहै, आशय यह कि,
प्रीतम मुझे न देखें न प्रीतमके देखतेमें कोई मुझे देखे। य-
मकालंकार लाटानुप्रास[दोहा-वहै शब्द फिरि फिरि परै, अर्थ
और ही और। सो यमकानुप्रासै, भेद अनेकन ठौर॥ १॥ एक
शब्द बहुवार जो, सो लाटानुप्रास। तात्पर्यते होत है, और
अर्थ प्रकास २॥ ] ॥ ३२ ॥
करे चाहसों चुटिकिकै, खरे उडौहैं मैन ॥
लाज नवाये तरफरत, करत खूंदसी नैन ॥३३॥
मैन अर्थात् कामदेवने चाहसे चुटकाकर उड़ते वा उठतेहु
येसे खडे किये, लज्जाके नवाये पर खुदीसी करतेहुए नेत्र
तडफडाते हैं । इसमें नेत्रोंको घोडेके समान निरूपित
कियाहै उन्हें कामरूपी चाबुककी चाहसे चाबुक मार उडौ हैं
परन्तु लाज झुकादेतीहै चुटकीके चाबुकका चटाका करके
खुदी खूँदनीहुई चाल अथवा पैरमें नख गढजानेकी चाल,
उपमान लुप्तालंकार [दोहा-नैन यहां उपमेय हैं, सो वाचक
परमान । खुंदधर्म हय ना कह्यो, लुप्ता यह उपमान] ॥ ३३ ॥

( १६ ) सतसई-सटीक ।
छुटी न लाजन लालचौ, प्यौलखि नैहर गेह ॥
सटपटात लोचन खरे, भरे सकोच सनेह ॥ ३४ ॥
नैहरके घरमें पियाको देखकर न तो लाजही छुटी; और
न लालचही छूटा, संकोच और सनेहसे भरेहुए नेत्र आगे
सटपटाते रहे, पर्यायोक्तिअलंकार ॥ ३४ ॥
पिय बिछुरनको दुसह दुख, हरषजात प्यौसार ॥
दुर्योधनलौं देखियत, तजत प्राण इहिवार ॥३५॥
पियाके बिछुरनेका महादुःख है; और प्यौसार माके जानेका
महासुखहै, इस समय दुर्योधनके प्राण छूटनेकीसी दशा
होरहीहै दुर्योधनका मरण हर्ष शोकके मध्यमें था । अथवा
इहिवार नाम यह बाला दुर्योधनके समानहै, पहलेमें उपमेय
लुप्ता और दूसरेमें पूर्णोपमा ॥ ३५ ॥
पति रतिकी बतियां कहीं, सखी लखी मुसकाय॥
करिकै सबै टलाटली, अलींचलीं सुख पाय॥ ३६॥
पतिने जो रतिकी बातें कहीं, सो प्यारीने सखीको मुसका-
कर देखा, तब सब आली टालाटाली करके सुखपाय घर
चलीं पर्यायोक्ति ॥ ३६ ॥
सकुच सुरत आरंभही, बिछुरी लाज लजाय ।
ठरकि ढार ढुरि ढिगभई, ढीठ ढिठाई आय॥३७॥

प्रथमशतक १. ( १७ )
संकोच कामकेलिके आरंभहीमें बिछुरगई जातीरही लाज
से लजित होके लुढ़कनेकी भाँति प्रसन्न होकर निर्लज्ज ढिठाई
मानो प्रियाके निकट आकर स्थितहुई, वृत्ति अनुप्रास
[ दोहा-कहूँ सरि वर्ण अनेककी, परै अनेकन बार। एकहिकी
आवृत्ति कहुं, वृत्ती दोइप्रकार ] ॥ ३७ ॥
सब अँग करि राखी सुघर, नायक नेह सिखाय ।
रसयुत लेति अनन्त गति, पुतरी पातुरराय॥३८॥
नायक (संगीतादि सब भेदके ज्ञाता) नेहने सिखाकर उसे
सब अंगसे चतुरकर रक्खी है अनुरागके साथ अनन्तगति
लेती है वह नृत्य करनेवालीयोंकी सरदारहै सविषय सावयव
रूपक ॥ ३८ ॥
विहँसि बुलाय विलोकउत, प्रौढतिया रसघूमि ।
पुलकि पसीजति पूतको, पियचूम्यो मुखचूमि ३९
सौतके बेटेका मुख पतिने चूमा तब प्रौढतिया रसमें घूमि
मत्त होकर उसे देख हँसकर बुलाय उस पियके चूमे पूतके
मुखको चूमकर पुलकितहो पसीजी सात्विकभाव असंगति
अलंकार [ दोहा-हियमें काम प्रकाशरो, चाहिये पियमुख
चूमि । संगति तज प्रौढा सुवन, मुख चूम्यो रसघूमि ] ॥३९॥
सोवत लखि मनमान धर, ढिग सोयो प्यों आय।

( १८ ) सतसई-सटीक ।
रहीसुपनकीमिलनमिलि,पियहियसोंलिपटाय ४०
प्यारीको सोया देखकर पतिमानसे उसके निकट आ सोया
उससमय स्वामीको हृदयसे लगाकर प्यारी नींदकी मिलनसे
मिलरही पर्यायोक्ति ॥ ४० ॥
त्रिवलीनाभि दिखायके,शिरढकिसकुचिसमाहि।
गलीअलीकी ओटह्वै,चलीभलीविधि चाहि॥४१॥
उदरकी त्रिवली और नाभि दिखाके शिरढक सकुचमें
आके गलीमें आलीकी ओटमें प्यारी पियाको भलीप्रकार
देखकर चली स्वभावोक्ति अलंकार ॥ ४१ ॥
देखत कछु कौतुक इतै, देखो नेक निहारि ॥
कबकी इकटक डटिरही,टटियाअँगुरिनिफारि४२
सखी बोली प्यारे देखतेहो कुछ कौतुक तनक इधर
निहारके तो देखो तुम्हारी प्यारी अँगुरीसे टट्टीको फारकर
कबसे टकटकी लगाये अटकरही है स्वभावोक्ति ॥ ४२ ॥
भौंहनि त्रासति मुख नटति,आँखिनसोंलपटाति ।
ऐंच छुरावत कर इची, आगे आवति जाति॥४३॥
भौंहसे डरती है,मुखसे नाहीं करती है,अँखियासे लिपटती
है, खैंचकर छुडावती है परन्तु खिंचीहुई स्वामीके पास आती
जाती है, स्वभावोक्ति ॥ ४३ ॥

प्रथमशतक १. (१९)
देख्यो अनदेख्यो कियो, अँग अँग सबै दिखाय ।
पैठतिसी तनुमें सकुचि,बैठिचितहि लजाय॥४४॥
सखी तुमने देखा कि,प्यारीने अपना सब अंग अंग दिखा-
कर हमारा देखा अनदेखा किया, सकुचाकर शरीरमें पैठती
हुईसी अपने मनको लजाकर बैठी स्वभावोक्ति अलंकार
अप्राकृतगुप्ता ॥ ४४ ॥
कारे वर्ण डरावनो, कत आवत इहि गेह ॥
कै वा लख्यो सखी लखे, लगै थरहरी देह ॥४५॥
कृष्णको देख प्यारी बोली सखी कारावर्ण डरावनाहै इस
घरमें क्यों आवै है? सखी मैंने कईबार देखा कि इसके देखने
से मेरे शरीरमें कपकपी लगतीहै;व्याजोक्ति [दोहा-व्याजव-
चन कछु कह जहाँ, मनको भाव दुराय । व्याजोक्ति जैमे
यहां, श्याम वर्ण डर पाय ] ॥ ४५ ॥
देवर फूल हने जु शिशु, उठी हर्षि अँगफूल ॥
हँसी करत ओषधि सखिनि,देह ददोरनि भूल४६
सखी पडोसिनसे बोली कि,मेरे बालक देवरने जो मेरे फूल
मारे अथवा फूलोंकी कलीमारी सो में हर्षउठी और अंग
फलिआये सात्विक भाव हुआ सखियां देहके ददोरोंसे भूल
कर औषध और हँसी करतीहैं फूल लगनेमें अंग फूले और
ददोरे पडे ॥ ४६ ॥

(२०) सतसई-सटीक ।
इहि काँटे मो पाय लगि, लीनी मरति जिवाय ॥
प्रीति जनावति भीतिसों, मीत जु काढ्यो आय ४७
सखी इस कांटे ने मेरे पांवमें लगकर मुझे मरतेसे जिवालिया
सखी सखीसे बोली देखो इसकी बातें इसके प्रीतमने जो
आनकर कांटा काढा इसकारण यह डरसे प्रीति जनाती है
विभावनालंकार [दोहा-कारज बनै विरुद्धते, विभावना
विस्तार। कांटेते जीवन भयो, यह विरुद्ध निरधार] ॥४७॥
घाम घरीक निवारिये, कलित ललित अलिपुंज।
यमुनातीर तमालतरु, मिलति मालती कुंज ४८
प्यारे यहां एक घरी ठहरकर घाम (धूप) निवारण करो
सुन्दर भौरोंके झुंड यहां गूँजरहे हैं, और तमालवृक्षोंमें
चमेलीकी कुंजैं मिलरही हैं. आशय यह कि, एकांत ठौर है
गूढोक्ति [दोहा-गूढवचन कहि भाव निज, प्रगट करत जो
तीय। गूढोक्ति सो जानिये, रसिकनको कमनीय] ॥४८॥
क्रिया विदग्धा।
हरषिन बोलीलखिललन, निरखिअमिलसँगसाथ
आंखनहीमें हँसिधस्यो, शीश हिये पर हाथ ४९॥
हे सखी प्यारी! अपने संगमें अनमिल समूह देखकर प्यारे
को देख प्रसन्न हुई और बोली नहीं आँखोंहीमें हँसकर शिर

प्रथमशतक १. (२१)
और छातीपर हाथ रक्खा. तात्पर्य यह कि, प्रणामकर कहा
तुम मेरे मनमें बसतेहो मैं तुमसे रातको मिलूँगी सूक्ष्मालंकार
[ दोहा-इंगित हावनसों जहां, मनको भाव बताय। सो सूक्ष्मा
लंकारहै, गुणियनको सुखदाय ] ॥ ४९ ॥
न्हायपहरिपट उठ कियो, बेंदी मिस परणाम ।
दृगचलायघरको चली, बिदाकिये घनश्याम॥५०.
प्रियाने स्नानकर वस्त्र पहर बेंदीके मिससे प्रणाम किया नेत्र
मटकाय अपने घरको कृष्णको विदाकर चली, पर्यायोक्ति५०
चितवत जितवत हितहिये, किये तिरीछे नैन ।
भीजे तनु दोऊ कँपे, क्यों हू जप नियरेन ॥५१॥
दोनों स्त्री पुरुष एक दूसरेको तिरछे देखकर हृदयका हित
जनाते हैं भीजे शरीरसे दोनों कांपते हैं परन्तु किसी भांति
जप संपूर्ण नहीं होता पूर्वार्द्धमें जाति उत्तरार्द्धमें विशेषोक्ति
अलंकार है ॥ ५१ ॥
मुखधोवत एँडीधसति, हँसति अनँगवति तीर ।
धसतिनइन्दीवरनयनि, कालिन्दीके नीर ॥५२॥
मुँह धोती और एँडी घिसती है किनारेपर वह कामवती
स्त्री खेलकरती है परन्तु वह नीलकमललोचना यमुनाके
जलमें प्रवेश नहीं करती जाति और पर्यायोक्ति ॥ ५२ ॥

( २२ ) सतसई-सटीक ।
नहिं अन्हाय नहिं जायघर, चित चहुँट्यो तकितीर
परशिफुरहरी लेफिरति, विहँसति धसतिननीर ५३
नतो स्नान करतीहै न घरजाती है प्यारेको तकनेसे तीरपरही
मन लगाहै, जलको छूतेही फुरहरीले पीछेको हँसकर हटती
है पानीमें नहीं घुसती पर्यायोक्ति चहुँट्यो-चुभगया ॥ ५३ ॥
चितईललचौहैं चखनि, डटि घूँघट पटमांहि ।
छलसोंचलीछुवायके, क्षणक छबीली छांहि ५४॥
लाजभरे नेत्रोंसे देखा घूँघट के पटमें डटकर प्यारीने फिर
छलसे क्षणेक अपनी छबीली छाँह छुआके चली. आशय
यह कि प्रीतमकी छाँहसे छांह छुआके चली इसमें यह दि-
खाया कि मैं तुम्हारे साथ छांहके समानहूं स्वभावोक्ति ॥५४॥
लाजगहो बेकाजकत, घेररहे घर जाहिं ।
गोरस चाहतफिरतहो, गोरस चाहत नाहिं॥५५॥
हे कृष्ण! तनकतो लाज गहो बिना काज हमें क्यों घेर
रहे हो, हम अपने घरजाँय तुम बातोंके रसको अथवा इन्द्रि-
योंके रसके चाहते फिरोहो गोरस दूध दही नहीं चाहतेहो
यमकालंकार [दोहा-पृथक २ हों अर्थ जहँ, पदहों एक
समान। सो यमकालंकार है, कविजन करत बखान ]॥५५॥

मध्य भाग: दोहा १५१ से ३५० (नायिका-भेद एवं शृंगार-चित्रण)

प्रथमशतक १. ( २३ )
सबही तनु समुहाति क्षण, चलति सबनिदै पीठ।
वाही तनु ठहराति यह, किवलनु मालौं दीठ ५६
क्षणमात्र सबहीकी ओर देखती है और क्षणमें
सबहीकी ओर पीठ दे चलतीहै, परन्तु यह किवलनुमासी
दृष्टि उन्हीं (कृष्ण) की ओर ठहरतीहै, किवलनुमा सदा
पश्चिमहीकी ओर रहताहै पूर्णोपमा, दृष्टि उपमेय किवलनुमा
उपमान, लौं वाचक, समुहातिधर्म है ॥ ५६ ॥
खरी भीरहू भेदिकै, कितहूं है इत आय।
फिरै दीठ जुरि दीठसों, सबकी दीठ बचाय॥५७
प्यारीकी दृष्टि कितहूं होय बहुतसी भीड़को भेदकर भी
इधर आती है और सबकी दृष्टि बचाकर स्वामीकी दृष्टिसे
प्रियाकी दृष्टि मिलकर फिरती है विभावनालंकार ॥ ५७ ॥
कहतनटतरीझतखिजत,मिलतखिलतलजियात।
भरे भौनमें करतहैं, नैननिमें सबवात ॥५८
कहते हैं, नाहीं करते हैं, प्रसन्न होते, खीजते, मिलने,
खिलते और लजातेहैं, भरे घरमें सब बातें नेत्रों मेंही करते हे,
आशय यह कि, प्यारेने चलनेका संकेत किया प्यारीने नाहीं
कही, इस भावसे प्यारे रीझे, तब प्यारी खीजी, फिर मिल-
कर नायक प्रसन्न हुए, प्यारी लजाई पूर्वार्द्धमें कारकदीपक

( २४ ) सतसई-सटीक ।
अलंकार [दोहा-जहां कहूं इक वाक्यमें, भाव अनेक दिखाहिं।
कारक दीपक कहतहैं, कविजन ताहि सराहिं ] उत्तरार्द्धमें
विभावना है ॥ ५८ ॥
दीठ बरत बांधी अटनि, चढि आवत न डरात।
इत उतते चित दुहुँनके, नटलों आवतजात ५९॥
दोनों ने अटारीपरसे दृष्टिकी रस्सी बांधी है, उसपर बरा-
बर चढ़ते आते हैं डरते नहीं इधर उधरसे ( उनरस्सोंपर )
दोनोंके मन नटके समान आते जाते हैं, रूपकालंकार पूर्णो-
पमालंकार है ॥ ५९ ॥
संजनयनि मज्जन किये, बैठी व्यौरति बार ।
कच अँगुरिन बिचदीठदे,चितवति नंदकुमार६०
कमललोचनि स्नानकर बैठकर बार व्योरने ( सुलझाने )
लगी, परन्तु बालोंमें अंगुलियोंके लगानेमें जो छिद्र
होते हैं उन छिद्रोंमें दृष्टि लगाकर कृष्णको देख रही है
पर्यायोक्ति ॥ ६० ॥
जुरे दुहुँनके दृग झमकि, रुके न झीने चीर ।
हलकी फौज हरोल ज्यों,परति गोलपर भीर६१
दोनोंके नेत्र झमककर जुरे झीने वस्त्रमें रुके नहीं, जैसे
सेनाकी हलकी हरावलके समान गोलपर भीर पड़ती है.

प्रथमशतक १. ( २५ )
हरौल सेनाका अग्रभाग प्यारीके नेत्र राजाकी सेना, चूँटपट
हरौल, और प्रियके नेत्र दक्षिणी कटक दृष्टान्तालंकार ॥ ६१॥
पहुँचति डटि रण सुभटलों, रोंकि सके सब नाहिं
लाखनहूकी भीरमें, आँखि वहीं चलिजाहिं ॥ ६२ ॥
रणके शूरमाके समान वहीं डटके पहुँचती है, सबभी नहीं
रोकसकते। लाखोंकीभी भीरमें आंखें वहीं चलकर जाती हैं,
विशेषोक्ति विभावना पूर्णोपमा ॥ ६२ ॥
ऐंचतिसी चितवन चितै, भई ओट अरसाय ।
फिर उझकनको मृगनयनि, दृगनि लगनियां लाय ॥
खैंचतीसी दृष्टिसे देखकर फिर अलसाकर ओटमें हुई मृग-
नयनी मेरे नेत्रोंमें लगनियां लगाकर फिर देखनेके निमित्त
अथवा हे सखी ! मृगनयनी मैं फिर उसके झाँकनेके निमित्त
अपने नेत्रोंमें लगन लगा रहाहूं कि वह मुझे प्यार करती
है फिर उझकेगी. अनुमानालंकार, जहां किसी बातसे कुछ
मनमें होनहार विचारी जाय वह अनुमान है ॥ ६३ ॥
दूरौ खरे समीपको, मानलेत मन मोद ।
होत दुहुँनके दृग नहीं, बंतरस हँसी विनोद ॥ ६४ ॥
यद्यपि वे दोनों दूर खड़े हैं, परन्तु समीपका मनमें आनंद

( २६ ) सतसई-सटीक ।
मानतेहैं, दोनोंके नेत्रोंमेंही बातोंका रस और हँसीका आनंद
होताहै प्रथम विभावनालंकार ॥ ६४ ॥
यदपि चवायनि चोकनी, चलति चहूँ दिशसैन ।
तदपि न छाँडत दुहुँनके, हँसी रसीले नैन ॥६५॥
यद्यपि चबाव करनेमें चिकनी चुटपटी चतुरहैं, यद्यपि
चारों ओर उँगुली उठा उठाकर, लोगोंकी सैन चलती है,
तौभी दोनोंके रसीले नेत्र हँसी नहीं छोड़ते तीसरी विभा-
वना ॥ ६५ ॥
सटपटातसी शशिमुखी, मुख घूँघटपट ढांकि ।
पावक झरसी झमकिकै, गई झरोखे झांकि ॥६६॥
चन्द्रमुखी सटपटातीसी घूँघटके पटसे मुख ढककर अग्नि
की झरसी झमककै झरोखेमें झांककर गई पूर्णोपमा॥ ६६ ॥
कबकी ध्यान लगी लखौं, यह घर लगिहै काहि ।
डरियतभृंगी कीटलों, जिन वहई ह्वैजाहि ॥६७॥
हे सखी! मैं इसे कबकी ध्यान लगाये देखरही हूं यह इस-
का घर कौन संभालेगा. मुझे डरहै कि, भृंगी कीटके समान
ध्यान करते करते कहीं जिसका ध्यान करती है वही न हो-
जाय भृंगी कीडा जिसे पकड़ताहै क्षणमें उसे अपना स्वरूप
बनालेताहै स्मृति अलंकार ॥ ६७ ॥

प्रथमशतक १. ( २७ )
रही अचलसी ह्वै मनो, लिखी चित्रकी आहि ।
तजे लाज डर लोकको, कहो विलोकति काहि ६८
वह ऐसी अचलसी होरहींहैं, मानो चित्रकी लिखीहो,
लोककी लाज और लोकका भय छोड़कर कहो किसको
देखतीहो, उत्प्रेक्षालंकार ॥ ६८ ॥
पल न चलै जकिसीरही, थकिसीरही उसाँस ।
अबही तन रितयो कहा,मन पठयोकिहिं पास६९
हे प्यारी! तुम्हारी पलक नहीं चलती, जड़सी होरही हो,
तथा उसाँस थकसा रहाहै; क्या अबही किसीके पास अपना
मन भेजकर तनु रीता किया है स्मृतिछेकानुप्रास ॥ ६९ ॥
नाम सुनतही ह्वै गयो, तनु औरै मन और ।
दबै नहीं चित चढरह्यो, अबै चढाये त्योर॥७०॥
प्यारी उनका नाम सुनतेही तुम्हारा तन और मन और
और होगया, त्यौरीके चढ़ायेसे जो चित्तपर चढ़रहाहै सो दबता
नहीं भेदकांति और छेकानुप्रास अलंकार ॥ ७० ॥
पूछे क्यों रूखी परति, सगबग रही सनेह ।
मनमोहन छवि पर कटी, कहै कट्यानी देह ७१
मेरे पूछनेसे क्यों रूखी होती है तूतो सनेहमें सगबग हो