बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १० ) सतसई-सटीक ।
सखीका कृष्णसे अन्य सखीका रूप कहना, वह सखी
तिथिहै तरुण अवस्था सूर्य है, पुण्यकाल समान दोनों अव-
स्था हैं, कोई किसी पुण्यसेही अवस्था और संक्रांतिकी संधि
पाताहै, अर्थात् ऐसे समय तियाका मिलना भाग्यसे होताहै
जब कि, बाल अवस्था छूटकर तरुणाई आती हो, सूर्य राशि
छोडकर दूसरीमें जाताहै यह संक्रान्तिका पुण्यकालहै सवि-
षय सावयव रूपकालंकार। [दोहा-रूपक सविषय सावयव,
सकल वस्तु जुवखाना रूप कीजिये ह्यां वयहि, अंग संक्रमण
जान ॥] ॥ १८ ॥
लालअलौकिक लरिकईं, लखिलाखिसखीसिहाँति
आज कालमें देखियत, उर उकसौहीं भांति १९
हे कृष्ण! उस सखीकी अलौकिक लोकोत्तर लरिकाई देखकर
सखी प्रसन्न होतीहै, कारण कि आज कलमेंही उरोज उकसे
से दीखनेवालेहैं। लोकोक्ति अलंकार [दोहा-लोक कहन वर्ण-
न जहां, लोकोक्ति कहि ताहि । आजकाल यह लोककी
कहन प्रसिद्ध चितचाहि॥] ॥ १९॥
अपने अंगके जानिक, यौवन नृपति प्रवीन ॥
स्तन नयन नितम्बको, बडो इजाफा कीन ॥२०॥
चतुर यौवन राजाने अपने (अंगके) सहायक जानकर