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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

प्रथमशतक १. (२१)
और छातीपर हाथ रक्खा. तात्पर्य यह कि, प्रणामकर कहा
तुम मेरे मनमें बसतेहो मैं तुमसे रातको मिलूँगी सूक्ष्मालंकार
[ दोहा-इंगित हावनसों जहां, मनको भाव बताय। सो सूक्ष्मा
लंकारहै, गुणियनको सुखदाय ] ॥ ४९ ॥
न्हायपहरिपट उठ कियो, बेंदी मिस परणाम ।
दृगचलायघरको चली, बिदाकिये घनश्याम॥५०.
प्रियाने स्नानकर वस्त्र पहर बेंदीके मिससे प्रणाम किया नेत्र
मटकाय अपने घरको कृष्णको विदाकर चली, पर्यायोक्ति५०
चितवत जितवत हितहिये, किये तिरीछे नैन ।
भीजे तनु दोऊ कँपे, क्यों हू जप नियरेन ॥५१॥
दोनों स्त्री पुरुष एक दूसरेको तिरछे देखकर हृदयका हित
जनाते हैं भीजे शरीरसे दोनों कांपते हैं परन्तु किसी भांति
जप संपूर्ण नहीं होता पूर्वार्द्धमें जाति उत्तरार्द्धमें विशेषोक्ति
अलंकार है ॥ ५१ ॥
मुखधोवत एँडीधसति, हँसति अनँगवति तीर ।
धसतिनइन्दीवरनयनि, कालिन्दीके नीर ॥५२॥
मुँह धोती और एँडी घिसती है किनारेपर वह कामवती
स्त्री खेलकरती है परन्तु वह नीलकमललोचना यमुनाके
जलमें प्रवेश नहीं करती जाति और पर्यायोक्ति ॥ ५२ ॥