बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२०) सतसई-सटीक ।
इहि काँटे मो पाय लगि, लीनी मरति जिवाय ॥
प्रीति जनावति भीतिसों, मीत जु काढ्यो आय ४७
सखी इस कांटे ने मेरे पांवमें लगकर मुझे मरतेसे जिवालिया
सखी सखीसे बोली देखो इसकी बातें इसके प्रीतमने जो
आनकर कांटा काढा इसकारण यह डरसे प्रीति जनाती है
विभावनालंकार [दोहा-कारज बनै विरुद्धते, विभावना
विस्तार। कांटेते जीवन भयो, यह विरुद्ध निरधार] ॥४७॥
घाम घरीक निवारिये, कलित ललित अलिपुंज।
यमुनातीर तमालतरु, मिलति मालती कुंज ४८
प्यारे यहां एक घरी ठहरकर घाम (धूप) निवारण करो
सुन्दर भौरोंके झुंड यहां गूँजरहे हैं, और तमालवृक्षोंमें
चमेलीकी कुंजैं मिलरही हैं. आशय यह कि, एकांत ठौर है
गूढोक्ति [दोहा-गूढवचन कहि भाव निज, प्रगट करत जो
तीय। गूढोक्ति सो जानिये, रसिकनको कमनीय] ॥४८॥
क्रिया विदग्धा।
हरषिन बोलीलखिललन, निरखिअमिलसँगसाथ
आंखनहीमें हँसिधस्यो, शीश हिये पर हाथ ४९॥
हे सखी प्यारी! अपने संगमें अनमिल समूह देखकर प्यारे
को देख प्रसन्न हुई और बोली नहीं आँखोंहीमें हँसकर शिर