बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) सतसई-सटीक ।
छुटी न लाजन लालचौ, प्यौलखि नैहर गेह ॥
सटपटात लोचन खरे, भरे सकोच सनेह ॥ ३४ ॥
नैहरके घरमें पियाको देखकर न तो लाजही छुटी; और
न लालचही छूटा, संकोच और सनेहसे भरेहुए नेत्र आगे
सटपटाते रहे, पर्यायोक्तिअलंकार ॥ ३४ ॥
पिय बिछुरनको दुसह दुख, हरषजात प्यौसार ॥
दुर्योधनलौं देखियत, तजत प्राण इहिवार ॥३५॥
पियाके बिछुरनेका महादुःख है; और प्यौसार माके जानेका
महासुखहै, इस समय दुर्योधनके प्राण छूटनेकीसी दशा
होरहीहै दुर्योधनका मरण हर्ष शोकके मध्यमें था । अथवा
इहिवार नाम यह बाला दुर्योधनके समानहै, पहलेमें उपमेय
लुप्ता और दूसरेमें पूर्णोपमा ॥ ३५ ॥
पति रतिकी बतियां कहीं, सखी लखी मुसकाय॥
करिकै सबै टलाटली, अलींचलीं सुख पाय॥ ३६॥
पतिने जो रतिकी बातें कहीं, सो प्यारीने सखीको मुसका-
कर देखा, तब सब आली टालाटाली करके सुखपाय घर
चलीं पर्यायोक्ति ॥ ३६ ॥
सकुच सुरत आरंभही, बिछुरी लाज लजाय ।
ठरकि ढार ढुरि ढिगभई, ढीठ ढिठाई आय॥३७॥