बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) सतसई-सटीक ।
समवाचक धरम, वर्ण चारि इक ठौर । शशिसों निर्मल मुख
यथा, पूरण उपमा गौर ॥ ] हँसी उपमेय, विष उपमान, बुरा
लगना धर्म ॥ १३ ॥
स्वेदसलिल रोमांच कुश, गहि दुलहिन असनाथ।
दियो हियो सँग नाथके, हाथलियेही हाथ ॥१४॥
गंधर्वविवाह सात्त्विकभाव हे सखि! विवाहके समय दूलह
और दुलहीने ( स्वेद ) पसीनारूपी जल और रोमांचरूपी
कुश ग्रहण कर हाथमें हाथ लियेही अपना हिया स्वामीके
संग कर दिया। विवाहमें पाणिग्रहण होतेही दोनोंने मन दि-
या [ आसीद्धरः कंटकितः प्रकोष्ठे स्विन्नाङ्गुलिः संववृते
कुमारी ] रूपक अलंकार ॥ १४ ॥
कहत न देवरकी कुवत, कुलतिय कलह डराति ॥
पंजरगत मंजार ढिग, शुकलौं सूखति जाति १५
( कुलतिय ) कुलवधू देवरकी कुटिल बातें नहीं कहती
क्लेशसे डरती है बिलावके ढिग बैठेहुए पींजरेमें पड़े तोतेके
समान सूखती जातीहै, दृष्टान्तालंकार [ दोहा-सम बिम्बनि
प्रतिबिम्ब गति, है दृष्टान्त सुढंग । पंजरगत मंजारढिग, शुक
वर्णन कविरंग ] ॥ १५ ॥
पारयो शोर सुहागको, इन बिनही पिय नेह ॥
उन दोही अँखियाँकि कै, कै अलसोंही देह॥१६॥