बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४ ) सतसई-सटीक ।
गोयेहू लोचन हँसति, विहँसत जात कपोल २९॥
सखियोंके समूहमें गौनेकी बातें सुनकर आंखें छिपाकर
भी हँसती है, और गाल हँसीसे मानों मुसकुराते जातेहैं। स्व-
भावोक्ति । छलिता कामामुग्धाहै ॥ २९ ॥
लखि दौरत पियकर कटक, वास छुडावनकाज॥
वरुनी वन दृगगढनिमैं, रही पैठिकरि लाज ३०
देखकर प्रीतमका हाथरूपी कटक जो वस्त्र और ठौर छु-
टानेके कामको दौडताहै, उस समय वरौनियोंके वन और
नेत्ररूपी दुर्गमें मानो भाजकर लाजने वास कियाहै। सुरतके
समय लाज मानों पलकोंके बालोंमें छिपी । सविषय सावयव
रूपक ॥ ३० ॥
दीप उजेरेहू पतिहि, हरत वसन रतिकाज ॥
रही लपटि छबिकी छटानि, नेकौ छूटी न लाज ३१
दीप उजेरेहीमें जब पतिने रतिके निमित्त वस्त्र हरणकिये,
तबभी वह छबिकी छटाकी ज्योतिसे लिपटीही रही नेकभी
लाज न छूटी इसकारण पतिका यत्न न पूरा हुआ । विशे-
षोक्ति [ दोहा-विशेषोक्ति कारज नहीं, कारणकी अधिकाय ।
निलज करनको यत्न किय, लाज न छूटन पाय ] ॥ ३१ ॥
समरस समर संकोचवश, विवसन ठिकुठहराय।