बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमशतक १. ( १५ )
फिरिफिरिउझकतिफिरिदुरति, दुरिडरिउझकतिजाय
समान गुणवाले काम और संकोच (लाज) के वड़ासे
अवश हो ठीक नहीं ठहरती, फिर फिरकर झाँकतीहै, फिर
छिपतीहै फिर आके छिप २ कर झाँकतीहै, आशय यह कि,
प्रीतम मुझे न देखें न प्रीतमके देखतेमें कोई मुझे देखे। य-
मकालंकार लाटानुप्रास[दोहा-वहै शब्द फिरि फिरि परै, अर्थ
और ही और। सो यमकानुप्रासै, भेद अनेकन ठौर॥ १॥ एक
शब्द बहुवार जो, सो लाटानुप्रास। तात्पर्यते होत है, और
अर्थ प्रकास २॥ ] ॥ ३२ ॥
करे चाहसों चुटिकिकै, खरे उडौहैं मैन ॥
लाज नवाये तरफरत, करत खूंदसी नैन ॥३३॥
मैन अर्थात् कामदेवने चाहसे चुटकाकर उड़ते वा उठतेहु
येसे खडे किये, लज्जाके नवाये पर खुदीसी करतेहुए नेत्र
तडफडाते हैं । इसमें नेत्रोंको घोडेके समान निरूपित
कियाहै उन्हें कामरूपी चाबुककी चाहसे चाबुक मार उडौ हैं
परन्तु लाज झुकादेतीहै चुटकीके चाबुकका चटाका करके
खुदी खूँदनीहुई चाल अथवा पैरमें नख गढजानेकी चाल,
उपमान लुप्तालंकार [दोहा-नैन यहां उपमेय हैं, सो वाचक
परमान । खुंदधर्म हय ना कह्यो, लुप्ता यह उपमान] ॥ ३३ ॥