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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

प्रथमशतक १. (१९)
देख्यो अनदेख्यो कियो, अँग अँग सबै दिखाय ।
पैठतिसी तनुमें सकुचि,बैठिचितहि लजाय॥४४॥
सखी तुमने देखा कि,प्यारीने अपना सब अंग अंग दिखा-
कर हमारा देखा अनदेखा किया, सकुचाकर शरीरमें पैठती
हुईसी अपने मनको लजाकर बैठी स्वभावोक्ति अलंकार
अप्राकृतगुप्ता ॥ ४४ ॥
कारे वर्ण डरावनो, कत आवत इहि गेह ॥
कै वा लख्यो सखी लखे, लगै थरहरी देह ॥४५॥
कृष्णको देख प्यारी बोली सखी कारावर्ण डरावनाहै इस
घरमें क्यों आवै है? सखी मैंने कईबार देखा कि इसके देखने
से मेरे शरीरमें कपकपी लगतीहै;व्याजोक्ति [दोहा-व्याजव-
चन कछु कह जहाँ, मनको भाव दुराय । व्याजोक्ति जैमे
यहां, श्याम वर्ण डर पाय ] ॥ ४५ ॥
देवर फूल हने जु शिशु, उठी हर्षि अँगफूल ॥
हँसी करत ओषधि सखिनि,देह ददोरनि भूल४६
सखी पडोसिनसे बोली कि,मेरे बालक देवरने जो मेरे फूल
मारे अथवा फूलोंकी कलीमारी सो में हर्षउठी और अंग
फलिआये सात्विक भाव हुआ सखियां देहके ददोरोंसे भूल
कर औषध और हँसी करतीहैं फूल लगनेमें अंग फूले और
ददोरे पडे ॥ ४६ ॥