बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमशतक १. ( १७ )
संकोच कामकेलिके आरंभहीमें बिछुरगई जातीरही लाज
से लजित होके लुढ़कनेकी भाँति प्रसन्न होकर निर्लज्ज ढिठाई
मानो प्रियाके निकट आकर स्थितहुई, वृत्ति अनुप्रास
[ दोहा-कहूँ सरि वर्ण अनेककी, परै अनेकन बार। एकहिकी
आवृत्ति कहुं, वृत्ती दोइप्रकार ] ॥ ३७ ॥
सब अँग करि राखी सुघर, नायक नेह सिखाय ।
रसयुत लेति अनन्त गति, पुतरी पातुरराय॥३८॥
नायक (संगीतादि सब भेदके ज्ञाता) नेहने सिखाकर उसे
सब अंगसे चतुरकर रक्खी है अनुरागके साथ अनन्तगति
लेती है वह नृत्य करनेवालीयोंकी सरदारहै सविषय सावयव
रूपक ॥ ३८ ॥
विहँसि बुलाय विलोकउत, प्रौढतिया रसघूमि ।
पुलकि पसीजति पूतको, पियचूम्यो मुखचूमि ३९
सौतके बेटेका मुख पतिने चूमा तब प्रौढतिया रसमें घूमि
मत्त होकर उसे देख हँसकर बुलाय उस पियके चूमे पूतके
मुखको चूमकर पुलकितहो पसीजी सात्विकभाव असंगति
अलंकार [ दोहा-हियमें काम प्रकाशरो, चाहिये पियमुख
चूमि । संगति तज प्रौढा सुवन, मुख चूम्यो रसघूमि ] ॥३९॥
सोवत लखि मनमान धर, ढिग सोयो प्यों आय।