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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

प्रथमशतक १. ( ११ )
कुच, मन, नेत्र (नितम्ब) कटिपश्चाद्भाग इनकी अधिक-
तर वृद्धि की। हेतूत्प्रेक्षालंकार ॥ २० ॥
नवनागरि तनु मुलक लहि, यौवन आमिल जोर।
घटि बढिते बढिघटि रकम, करी औरकी और २१

  • यौवनरूपी (आमिल) हाकिमने नवनागरीका शरीररूपी
    देश पाकर, अपने बलसे घटी बढी वस्तुकी बढा घटाकर और
    की और ही करडाली, अर्थात् लरिकाईंको निकालदिया,
    कमरको घटादिया, आंखें, केश, स्तन, नितम्ब, चतुराईको
    बढादिया, स्वाभाविक चेष्टा चाल चलनको औरका और ही
    करादिया। सविषयसावयवरूपकालंकार ॥ २१ ॥
    ज्यों २ यौवन जेठदिन,कुचमितअतिअधिकाति
    त्यों २ क्षण२ कटिक्षपा,क्षीण परत नित जाति २२
    जैसे जेठके महीनेमें दिनका प्रमाण चढता है तैसे यौवनके
    आनेसे कुचोंका प्रमाण बढताहै, जैसे २ जेठके महीनेकी रात
    घटतीहै त्यों त्यों उसकी कमर घटती जातीहै, अति
    अधिकात का भाव यह कि, यौवनसे स्तन बढे और
    स्तनसे शोभा बढी। तद्रूपरूपकालंकार ॥ २२ ॥
    बाढत तो उर उरज भर, भर तरुणईं बिकाम ॥
    बोझनि सौंतनिके हिये, आवत रुंध उमाग २३