बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) सतसई-सटीक ।
रहीसुपनकीमिलनमिलि,पियहियसोंलिपटाय ४०
प्यारीको सोया देखकर पतिमानसे उसके निकट आ सोया
उससमय स्वामीको हृदयसे लगाकर प्यारी नींदकी मिलनसे
मिलरही पर्यायोक्ति ॥ ४० ॥
त्रिवलीनाभि दिखायके,शिरढकिसकुचिसमाहि।
गलीअलीकी ओटह्वै,चलीभलीविधि चाहि॥४१॥
उदरकी त्रिवली और नाभि दिखाके शिरढक सकुचमें
आके गलीमें आलीकी ओटमें प्यारी पियाको भलीप्रकार
देखकर चली स्वभावोक्ति अलंकार ॥ ४१ ॥
देखत कछु कौतुक इतै, देखो नेक निहारि ॥
कबकी इकटक डटिरही,टटियाअँगुरिनिफारि४२
सखी बोली प्यारे देखतेहो कुछ कौतुक तनक इधर
निहारके तो देखो तुम्हारी प्यारी अँगुरीसे टट्टीको फारकर
कबसे टकटकी लगाये अटकरही है स्वभावोक्ति ॥ ४२ ॥
भौंहनि त्रासति मुख नटति,आँखिनसोंलपटाति ।
ऐंच छुरावत कर इची, आगे आवति जाति॥४३॥
भौंहसे डरती है,मुखसे नाहीं करती है,अँखियासे लिपटती
है, खैंचकर छुडावती है परन्तु खिंचीहुई स्वामीके पास आती
जाती है, स्वभावोक्ति ॥ ४३ ॥