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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 62

प्रथमशतक १. ( ९ )
हे सखी! इसने पियाके स्नेह विनाही सुहागका शोर डाला,
अर्थात् प्रीति प्रसिद्ध की, उनींदी आँखों अथवा अलसानी
देहसे यह बात जानी जातीहै। यदि कहो कि प्रीतमके नेह
बिन सुहाग प्रसिद्ध नहीं होता, तो उत्तर यह कि, यह नाय-
काकी निज सखीकी वचन सौतकी सखीसे, है कि इसकी प्री-
तिको किसी सौतकी कुदृष्टि न लगे। पर्यायोक्ति। [ दोहा-
पर्यायोक्ति जहां नई, रचनासों कछु बात । साधै इष्ट
बनायकै, निज छल नहीं लखात ॥ ] ॥ १६ ॥
छुटी न शिशुताकी झलक, झलक्यो यौवन अंग।
दीपति देह दुहूँन मिलि, दिपति ताफता रंग १७
बालकपनकी झलक नहीं छुटी, कि अंगमें यौवन
छलका, दोनोंके मिलनेसे देहकी दीति ताफतारंगके
समान चमकतीहै, वयसन्धि वर्णन. ताफता-धूपछांहको
कहतेहैं जैसे इसमें ताने बानेके दोनों रंग चमकतेहैं इसप्रकार
उसके अंगमें बालपन और यौवन झलकताहै। वाचकलु-
प्तोपमा [दोहा-उपमे यरु उपमा धरमा, वाचक कह तहँ पाठ।
इकबिन द्वैबिन तीनबिन, सो लुप्तोपम पाठ ] ॥ यह जयपुरी
दृश्यहै ॥ १७ ॥
तिय तिथि तरणि किशोर वय, पुण्यकालसमदौन।
काहू पुण्यनि पाइयत, वय संधि संक्रॉन ॥१८॥