बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) सतसई-सटीक ।
तेरा हृदय कुचोंके बोझ और युवावस्थाके खिलनेकी चम-
कसे बढताहै. इन बोझोंसे सौतोंके हियेमें घुटकर श्वास
आताहै । असंगतिअलंकार ॥ २३ ॥
भावक उभरोहों भयो,कछुक पन्यो भरु आय॥
सीपहराके मिस हियो, निशदिन हेरतजाय २४
हृदय थोडासा एक ऊँचासा हुआ और कुछेक बोझ आ-
कर पड़ा, सीपके हारके बहानेसे छाती रात दिन देखते जा-
यहै, भरु-बोझ । पर्यायोक्ति । [ दोहा-छलकर साधिय इष्ट
जहँ, पर्यायोक्ति विशिष्ट । सीपहराके मिस हियो, लखति
सुसाधति इष्ट ] ज्ञातयौवनामुग्धाहै ॥ २४ ॥
देह दुल्हैयाकी बढै; ज्यों ज्यों यौवनज्योति ॥
त्योंत्यों लखि सौतैं सबै,वदन मलिनद्युतिहोति २५
ज्यों ज्यों दुलहिनकी देह बढतीहै, त्यों२ यौवनकी ज्योति
बढती है, तैसे तैसेही देखकर सौतोंके मुखकी कांति मलीन
होतीहै । नवोढा मुग्धा । उल्लासालंकार [ दोहा-इकके गुणसे
होय जहँ, औरहि दोष उलास । दुलहीके गणते बढ्यो, सौ-
तिन दोष प्रकास ॥ ] ॥ २५ ॥
मानो मुख दिखरावनो, दुलहिन करि अनुराग ॥
साससदन मन ललनहूं, सौतिन दियो सुहाग २६